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MP News: खिवनी में आदिवासियों के घरों पर बुलडोजर, वन विभाग की कार्रवाई से बेघर हुए 50 परिवार

मध्य प्रदेश के देवास जिले के खातेगांव विधानसभा क्षेत्र के खिवनी गांव में 23 जून 2025 को वन विभाग ने 50 से अधिक आदिवासी परिवारों के घरों पर बुलडोजर चला दिया, जिससे सैकड़ों लोग बारिश के मौसम में खुले आसमान के नीचे बेघर हो गए। इस घटना ने न केवल स्थानीय स्तर पर हंगामा मचाया, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक हलकों में भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।

आदिवासी समुदाय की शिकायतों को सुनने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सक्रियता दिखाई, जबकि वन मंत्री विजय शाह खुद कीचड़ भरे रास्तों पर पैदल चलकर पीड़ितों से मिलने पहुंचे। इस घटना ने मध्य प्रदेश में वन अधिकारों और आदिवासी समुदाय के हितों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

50 families became homeless due to the action of the forest department Shivraj and Vijay Shah

क्या है पूरा मामला?

23 जून 2025 को देवास जिले के खातेगांव विधानसभा क्षेत्र के खिवनी गांव में वन विभाग ने अतिक्रमण हटाने के नाम पर एक बड़ी कार्रवाई की। विभाग ने बिना किसी पूर्व सूचना या सुनवाई के 50 से अधिक आदिवासी परिवारों के घरों को जेसीबी और बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया। पीड़ित परिवारों का दावा है कि वे पीढ़ियों से इस जमीन पर रह रहे थे और उनके पास वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत दावे भी थे, लेकिन विभाग ने कोई कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। बारिश के मौसम में यह कार्रवाई आदिवासियों के लिए किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं थी, क्योंकि उनके घर, सामान और आजीविका के साधन नष्ट हो गए।

शिवराज सिंह चौहान और सीएम मोहन यादव की सक्रियता

घटना के बाद आदिवासी समुदाय ने अपनी शिकायतें लेकर केंद्रीय कृषि मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाकात की। सीहोर में हुई इस मुलाकात में पीड़ित परिवारों ने अपनी आपबीती सुनाई और वन विभाग की कार्रवाई को अन्यायपूर्ण बताया। शिवराज ने इस मामले को गंभीरता से लिया और रविवार, 29 जून 2025 को पीड़ित आदिवासियों को साथ लेकर भोपाल में मुख्यमंत्री निवास पहुंचे।

मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के साथ इस बैठक में खातेगांव और इछावर क्षेत्र के आदिवासी समाज के लोग और बुधनी विधायक रमाकांत भार्गव भी मौजूद थे। शिवराज ने पीड़ितों की समस्याओं को सीएम के सामने रखा और इस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच की मांग की। सीएम मोहन यादव ने तत्काल जांच के निर्देश दिए और कहा, "हमारी सरकार गरीबों की सरकार है, गरीबों के साथ है। खिवनी अभयारण्य के लिए वन विभाग की कार्रवाई से प्रभावित जनजातीय समुदाय की शिकायतों को गंभीरता से लिया गया है।"

विजय शाह का खिवनी दौरा: कीचड़ में पैदल पहुंचे

मुख्यमंत्री के निर्देश पर वन मंत्री विजय शाह ने खिवनी गांव का दौरा किया। बारिश और कीचड़ भरे रास्तों के कारण वे तीन-चार किलोमीटर पैदल चलकर पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने ट्रैक्टर की ट्रॉली में बैठकर गांव से वापसी की, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। शाह ने पीड़ितों से उनकी समस्याएं सुनीं और उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी शिकायतों का समाधान किया जाएगा।

हालांकि, विजय शाह हाल ही में कर्नल सोफिया पर दिए गए एक आपत्तिजनक बयान के कारण विवादों में हैं, जिसने उनके इस दौरे को और चर्चा में ला दिया। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने उनके दौरे को "दिखावटी" करार दिया, जबकि अन्य ने इसे सरकार की संवेदनशीलता का प्रतीक बताया। @DilipBamaniya15 ने अपने पोस्ट में लिखा, "मध्य प्रदेश देवास के खिवनी गांव में आदिवासियों पर बुलडोज़र चला, वो भी बिना वैध प्रक्रिया। @PMOIndia क्या यही 'सबका साथ, सबका विकास' है?"

आदिवासियों के दावे और वन विभाग का पक्ष

पीड़ित आदिवासी परिवारों का कहना है कि वे 40-50 वर्षों से खिवनी के जंगल में रह रहे थे और उनकी आजीविका वन उपज पर निर्भर थी। कई परिवारों ने वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 के तहत जमीन के लिए दावे भी दायर किए थे, लेकिन वन विभाग ने इन दावों को नजरअंदाज कर बिना नोटिस के कार्रवाई की। @riyabheel ने अपने पोस्ट में लिखा, "मध्यप्रदेश में देवास जिले के ग्राम खिवनी में वन अधिकारियों ने बड़ी बेरहमी से आदिवासियों के मकानों पर बुलडोजर चलाकर पुरे परिवार को खुले आसमान के नीचे कर दिया गया।"

दूसरी ओर, वन विभाग का दावा है कि खिवनी क्षेत्र को सरदार पटेल अभयारण्य के लिए प्रस्तावित किया गया है, और इस कार्रवाई का मकसद अवैध अतिक्रमण हटाना था। विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि कुछ परिवारों ने वन भूमि पर अवैध रूप से निर्माण किया था, जिसे हटाने के लिए यह कार्रवाई जरूरी थी। हालांकि, पीड़ितों का कहना है कि उन्हें कोई वैकल्पिक व्यवस्था या पुनर्वास का प्रस्ताव नहीं दिया गया।

सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

इस घटना ने मध्य प्रदेश में आदिवासी अधिकारों और वन विभाग की कार्रवाइयों को लेकर तीखी बहस छेड़ दी है। विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे सरकार की "आदिवासी विरोधी" नीति का उदाहरण बताया। आदिवासी संगठनों जैसे ट्राइबल आर्मी और जय आदिवासी युवा शक्ति (JAYS) ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की और पीड़ितों के लिए न्याय की मांग की। संगठनों ने मांग की है कि प्रभावित परिवारों को तत्काल पुनर्वास और मुआवजा दिया जाए। साथ ही, वन अधिकार अधिनियम के तहत उनके दावों की निष्पक्ष जांच हो।

सरदार पटेल अभयारण्य का विवाद

खिवनी में वन विभाग की कार्रवाई को सरदार पटेल अभयारण्य परियोजना से जोड़ा जा रहा है। @HIRA_ALAWA ने अपने पोस्ट में लिखा, "देवास-सीहोर में आदिवासियों की पुश्तैनी ज़मीन पर 'सरदार पटेल अभयारण्य' बनाने की तैयारी चल रही है - और इसके लिए आदिवासियों को बेदखल किया जा रहा है।" यह परियोजना मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है, जिसका उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा देना है। हालांकि, आदिवासियों का कहना है कि उनकी आजीविका और आवास के अधिकारों को नजरअंदाज किया जा रहा है।

सरकार के सामने चुनौती

यह घटना मध्य प्रदेश में आदिवासी अधिकारों और वन संरक्षण नीतियों के बीच टकराव को उजागर करती है। वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत आदिवासियों को जंगल में अपनी पुश्तैनी जमीन पर अधिकार दिए गए हैं, लेकिन इस कानून का कार्यान्वयन कई बार विवादों में रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को वन संरक्षण और आदिवासी हितों के बीच संतुलन बनाना होगा।

मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने इस मामले में जांच के आदेश देकर सकारात्मक संकेत दिए हैं, लेकिन पीड़ित परिवारों को तत्काल राहत और पुनर्वास की जरूरत है। शिवराज सिंह चौहान की सक्रियता और विजय शाह के दौरे से यह स्पष्ट है कि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही है, लेकिन इसका अंतिम परिणाम जांच और कार्रवाई की पारदर्शिता पर निर्भर करेगा।

आगे क्या?

खिवनी की इस घटना ने मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय के प्रति सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए हैं। सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है, और कई संगठन इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ले जाने की बात कर रहे हैं।

पुलिस और प्रशासन इस मामले में शांति बनाए रखने के लिए सतर्क हैं, और जांच की प्रगति पर सभी की नजर है। यदि सरकार पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा और पुनर्वास प्रदान करती है, तो यह आदिवासी समुदाय के प्रति विश्वास बहाली का एक कदम हो सकता है। दूसरी ओर, यदि इस मामले को ठंडे बस्ते में डाला गया, तो यह सामाजिक और राजनीतिक तनाव को और बढ़ा सकता है।

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