आत्मनिर्भर गांव रायमलवाड़ा : जो काम सरकार ना कर सकी वो ग्रामीणों ने 50 ट्रैक्टरों से कर दिखाया, Video
केस स्टडी है गांव रायमलवाड़ा, जानिए कैसे बना आत्मनिर्भर, 50 ट्रैक्टर लेकर क्यों पहुंचे ग्रामीण, Video
जोधपुर। आत्मनिर्भर गांव देखना है तो सीधे चले आइए राजस्थान। यहां के जोधपुर जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर एक गांव है रायमलवाड़ा। जोधपुर जिले लोहावट उपखंड का यह गांव केस स्टडी है कि किस तरह खुद के दम पर वो करके दिखाया जा सकता है जो सरकार भी नहीं कर पाई। राजस्थान के पिछड़े इलाके में से एक गांव रायमलवाड़ा के लोगों ने यहां पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता की समस्या खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। सफलता भी मिलने लगी है। इस बात का सबूत है गांव की 20 बीघा गोचर भूमि में खड़ी सेवण घास।

क्या है गांव रायमलवाड़ा के आत्मनिर्भर बनने की कहानी
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 5 हजार 819 घरों की आबादी वाले गांव रायमलवाड़ा के आत्मनिर्भर बनने की कहानी की शुरुआत वर्ष 2019 से होती है। गांव के अधिकांश परिवार खेती व पशुपालन पर निर्भर हैं, मगर समस्या यह थी कि बारिश कम होने के कारण ग्रामीणों को हर साल पशुओं के लिए चारे की किल्लत से जूझना पड़ता था। कई आवारा पशु तो चारे के अभाव में दम तक तोड़ देते थे। ऐसे में ग्रामीणों ने गांव में स्थित गोचर भूमि का सही इस्तेमाल कर समस्या से स्थायी निजात पाने की ठानी।

गांव रायमलवाड़ा में है 2000 बीघा गोचर भूमि
गांव के सरकारी शिक्षक गोपाल जांदू ने वन इंडिया हिंदी से बातचीत में बताया कि राजस्थान के अन्य गांवों की तरह हमारे गांव में भी 2000 बीघा गोचर भूमि छोड़ी हुई है। राजस्थान के गांवों में गोचर भूमि छोड़ने की परम्परा के पीछे मकसद यह है कि गांव के पशुओं के लिए उस भूमि में चारा पनप सके। इस भूमि पर किसी निर्माण कार्य की इजाजत नहीं होती है। रायमलवाड़ा की गोचर भूमि में दिक्कत यह थी कि इस पर घास की बजाय बबूल के पेड़ों (कांटेदार कीकर) व कांटेदार झाड़ियों का घना जंगल बन गया था। बबूल के पेड़ों को पशु खाते नहीं हैं।
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20 बीघा में सफल रहा पायलट प्रोजेक्ट
बबूल के पेड़ों व झाड़ियों के कारण रायमलवाड़ा में गोचर भूमि कोई काम नहीं आ रही थी। जुलाई 2019 में ग्रामीणों ने बबूल के पेड़ों को हटाकर उनकी जगह बतौर चारा सेवण घास उगाने का काम पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर हाथ में लिया। गांव के ग्रामवासियों ने आर्थिक मदद की। करीब डेढ़ लाख रुपए जुटे और महज 20 बीघा जमीन को तैयार करके उसमें सेवण घास लगाई गई। आवारा पशुओं से सुरक्षा के लिए प्रशासन से इजाजत लेकर तारबंदी भी की गई। बारिश होने के बाद घास देखते ही देखते दो से तीन फीट लम्बी हो गई। पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा। फरवरी 2020 में चारे की किल्लत आई तो इसमें से घास काटकर आवारा पशुओं को भी खिलाई गई।

अब 1000 बीघा जमीन में उगाएंगे सेवण घास
गांव रायमलवाड़ा में बीस बीघा का पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा तो ग्रामीणों का उत्साह बढ़ा और इस बार 300 बीघा जमीन चारे के लिए तैयार करने की योजना बनाई। जिसमें ग्रामीणों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सात लाख रुपए एकत्रित हो गए। ग्रामीणों की सोच और पैसा अधिक एकत्रित होने पर लक्ष्य 300 से बढ़ाकर 1000 बीघा किया गया। 45 दिन तक जेसीबी चली, जिसने बबूल के पेड़ को जड़ से खत्म किया। बाकी जमीन समतल करने और कटे हुए पेड़ों को हटाने का काम ग्रामीणों ने किया।

जब एक साथ 50 ट्रैक्टर लेकर पहुंचे ग्रामीण
गांव के बजरंग जोशी ने बताया कि रायमलवाड़ा में एक हजार बीघा गोचर भूमि से बबूल के पेड़ हटाने के बाद बारी थी जमीन में सेवण घास बोने की। इसके लिए पड़ोसी गांव के सरपंच प्रकाश व्यास जाखण ने सेवण घास का तीन क्विंटल बीज निशुल्क उपलब्ध करवाया। फिर गांव में सोशल मीडिया से मैसेज किया गया कि 14 जुलाई को 1000 बीघा गोचर भूमि में सेवण घास के बीज की बुवाई (स्थानीय भाषा में खड़ाई) होगी। मैसेज वायरल हुआ और निर्धारित समय पर गांव के 50 लोग अपना-अपना ट्रैक्टर लेकर रायमलवाड़ा की गोचर भूमि में पहुंचे गए। बिना किसी खर्चे के सेवण घास की बुवाई कर डाली। खुशी की बात यह है कि अगले ही दिन जोरदार बारिश भी हो गई।

रायमलवाड़ा के ये लोग कर रहे नेतृत्व
युवा टीम के संयोजक प्रकाश गोदारा ने बताया कि यूं तो गांव रायमलवाड़ा की तस्वीर बदलने में एक-एक घर अपने आप योगदान दे रहा है। कोई आर्थिक सहयोग तो कोई श्रमदान कर रहा है मगर पूरी मुहिम को युवाओं की टीम टीम लीड कर रही है। खास बात यह है कि गांव रायमलवाड़ा में कोई सरपंच नहीं है। राजस्थान पंचायती राज चुनाव में स्टे के चलते यहां सरपंच का पद खाली पड़ा है।

क्या होती है सेवण घास
राजस्थान में पाई जाने वाली सेवण घास को रेगिस्तान में घासों का राजा (किंग ऑफ डेजर्ट) कहा जाता है। खास बात है कि यह कम पानी और अधिक तापमान में भी आसानी से पनप सकती है। दो से तीन फीट तक लंबी होती है। पशु इसे बड़े चाव से खोते हैं। सेवण घास की जड़ें गहरी होती हैं। यह काट लेने या फिर लंबे समय तक बारिश नहीं होने के बाद भी खत्म नहीं होती है। गांव रायमलवाड़ा में एक हजार बीघा में घास तैयार होने के बाद पूरे गांव के आवारा व पालतू पशुओं को सालभर तक चारा उपलब्ध हो सकेगा।
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