रेजांगला का युद्ध : भारत-चीन जंग 1962 में शेर की तरह लड़े थे PVC मेजर शैतान सिंह, लद्दाख में चटाई धूल
जोधपुर, 18 नवंबर। भारत-चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध में जहां भारत के बहादुर सैनिकों ने वीरता की नई कहानी लिख दी वहीं चीनी फौज को भी सबका मिला है। यही वजह है कि 59 साल बाद भी चीन रेजांग-ला दर्रे के रास्ते लद्दाख में घुसने की हिम्मत आज तक नहीं जुटा पाया।

हम बात कर रहे हैं कि जोधाणा के सपूत मेजर शैतान सिंह की शौर्य गाथा की। मेजर शैतान सिंह का बलिदान दिवस 18 नवंबर 2021 को जोधपुर में उल्लास के साथ मनाया गया।
भारत-चीन 1962 की जंग में अदम्य साहस और कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह का बलिदान दिवस गुरुवार सुबह पावटा स्थित परमवीर सर्कल पर मनाया गया।
इस मौके पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन भी किया गया। जोधपुर जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कर्नल दिलीप सिंह खंगारोत ने बताया कि श्रद्धांजलि सभा में सैन्य अधिकारी प्रशासनिक अधिकारी सेवानिवृत्त सेना अधिकारी गौरव सेनानी और आम नागरिकों द्वारा मेजर को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
वहीं, आपको बता देंगे मेजर शैतान सिंह की शौर्य गाथा आज भी युवाओं के दिल में है। चंगुल सेक्टर की लड़ाई में 18 नवंबर 1962 को परमवीर मेजर शैतान सिंह भाटी के नेतृत्व वाली भारतीय सेना की तरह कुमाऊ रेजिमेंट की चार्ली कंपनी के 114 सैनिकों ने शहादत देकर ना सिर्फ चीन की सेना को लद्दाख से घुसने को रोक दिया। बल्कि दुश्मन के लगभग दो हजार सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।
मेजर शैतान सिंह और उनकी कंपनी के जवानों के शव लगभग 3 महीने बाद मिले। तब भी उनके हाथों में मौजूद हथियार अदम्य साहस की कहानी कर रही थी। उस लड़ाई की कहानी आज भी भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों की दमक रही है।












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