चम्पाई सोरेन क्या भाजपा में बाबूलाल मरांडी की जगह ले लेंगे? कितने फायदेमंद साबित होंगे कोल्हन के टाइगर?
Champai Soren: झारखंड के दिग्गज आदिवासी नेता और 'कोल्हन के टाइगर' के नाम से मशहूर चम्पाई सोरेन के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने के बाद से कई सवाल उठ रहे हैं। सबसे पहला सवाल ये कि क्या चम्पाई सोरेन भाजपा को झारखंड की सत्ता तक पहुंचा पाएंगे?
दूसरा सवाल जो पार्टी खेमे के अंदर चर्चा का विषय है कि क्या चम्पाई सोरेन भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी की जगह ले लेंगे? तीसरा सवाल ये है कि चम्पाई सोरेन की सियासी पकड़ कितनी मजबूत है? चौथा सवाल ये है कि चम्पाई सोरेन भाजपा में क्यों शामिल हुए हैं? आइए इन पहलुओं को समझने की कोशिश करते हैं।

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क्या चम्पाई सोरेन बाबूलाल मरांडी की जगह ले सकते हैं?
जब बाबूलाल मरांडी से ये सवाल पूछा गया कि क्या चम्पाई सोरेन के भाजपा में आने से वह खफा हैं? तो उन्होंने इस बात से साप इनकार कर दिया। बाबूलाल मरांडी ने कहा कि चम्पाई सोरेन के आने से पार्टी राज्य में और मजबूत हुई है। उनके पार्टी में आने से कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन सूत्रों की मानें तो चम्पाई सोरेन भाजपा में नंबर दो के नेता बनने के इरादे से तो नहीं आए होंगे। ऐसा संभव हो सकता है कि चम्पाई सोरेन धीरे-धीरे बाबूलाल मरांडी की जगह ले लें।
भले ही बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बने थे। वह राज्य में भाजपा का अहम चेहरे थे लेकिन पार्टी में और जमीम पर उनकी पकड़ समय के साथ ढीली पड़ती गई है। मरांडी ने भाजपा छोड़कर झारखंड विकास मोर्चा नाम से नई पार्टी बनाई थी लेकिन 2019 के चुनावों में वह भाजपा में आ गए थे।

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अर्जुन मुंडा और मरांडी को झारखंड की जनता आजमा चुकी है
विधानसभा चुनाव (2019) और लोकसभा चुनावों में मरांडी भाजपा को फायदा नहीं करा पाए हैं। विधानसभा (2019) और लोकसभा चुनावों में अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व सीटों पर हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा को फायदा हुआ था। मरांडी को झारखंड की जनता आजमा चुकी है।
भाजपा के दूसरे बड़े नेता अर्जुन मुंडा लोकसभा चुनाव हार गए हैं। वह विधानसभा चुनाव को लेकर राज्य में सक्रिय तो हैं लेकिन भाजपा उनको लेकर बहुत आश्वस्त नहीं लग रही है। ऐसे में चम्पाई सोरेन का भाजपा में शामिल होना कोई इत्तेफाक नहीं है।

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क्या चम्पाई सोरेने भाजपा को सत्ता दिलवा सकते हैं?
क्या चम्पाई सोरेने भाजपा को सत्ता दिलवा सकते हैं? क्या चम्पाई सोरेन भाजपा के अतीत के नुकसान की भरपाई कर सकते हैं? इसका फैसला तो चुनावी नतीजों के बाद ही होगा। लेकिन ये इस बात पर भी निर्भर करेगा कि क्या भाजपा चम्पाई सोरेन के नाम पर चुनाव लड़ेगी।
भाजपा पिछले कुछ सालों में विधानसभा चुनाव लड़ने की रणनीति हमेशा बदल लेती है। कई बार ऐसा देखा गया है कि भाजपा किसी और के चेहरे पर चुनाव लड़ती है और चुनाव जीतने के बाद किसी और सीएम बना देती है, जैसा हाल ही में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किया गया। हालांकि सीएम कौन होगा? इस सवाल के जवाब में बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि अगर हम सत्ता में आते हैं तो ये एनडीए सरकार होगी और कोई भी सीएम बन सकता है।

झारखंड में विधानसभा की 81 सीटें हैं। पिछले विधानसभा चुनावों जेएमएम गठबंधन 47 सीटें जीती थी और भाजपा को सिर्फ 25 सीटें मिली थी। झारखंड में आदिवासी आबादी 26 फीसदी है। आदिवासी वोटों पर चम्पाई सोरेन की पकड़ भी मजबूत है, खासकर कोल्हन क्षेत्र की सीटों पर। चम्पाई सोरेन संथाल जनजाति बड़े नेता हैं। हालांकि हेमंत सोरेन भी इसी जनजाति से आते हैं।
कोल्हान क्षेत्र के टाइगर कहलाने वाले चम्पाई सोरेन के इलाके में सबसे ज्यादा आदिवासी आबादी है,जो 42 फीसदी है। 2019 विधानसभा चुनाव में जेएमएम ने कोल्हान क्षेत्र से 14 विधानसभा सीटों में से 13 जीती थीं। ऐसे में चम्पाई सोरेन का भाजपा की तरफ होना, उनके लिए फायदेमंद हो सकता है। चम्पाई सोरेन के भाजपा में आने से जेएमएम के आदिवासी वोट बैंक भी बंट जाएंगे। चम्पाई सोरेन आदिवासी मुद्दा और सहानुभूति भी बटोर सकते हैं।











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