जानिए छत्तीसगढ़ की बस्तर बियर के बारे में ,जिसका पेड़ बेटी को दिया जाता है दहेज में !
जगदलपुर, 19 मार्च।गर्मी का मौसम आ चुका है। अल्कोहल के शौकीन अक्सर इस मौसम में ठंडी बियर पीते हैं। हम आपको ऐसी बियर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो एक विशेष प्रकार के पेड़ के रस से बनती है और बस्तर के आदिवासियों की संस्कृति का हिस्सा है।

बस्तर बियर है कमाल की
छत्तीसगढ़ के बस्तर में ताड़ प्रजाति के कारयोटा यूरेंस यानि सल्फी का पेड़ पाया जाता है। इस पेड़ से निकलने वाले रस को आदिवासी बड़े चाव से पीते हैं। सल्फी के पेड़ से निकलने वाले रस से हल्का सा नशा भी होता है, इसलिए इसे लोग अब 'बस्तर बीयर' के नाम से जानने लगे हैं। शराब के शौकीन व्यक्ति जब भी बस्तर प्रवास पर जाते हैं, तो सल्फी का स्वाद चखना नही भूलते।

औषधीय गुणों से भरपूर होता है सल्फी का रस
सल्फी अन्य बियर की तरह कड़वी या कसैली नही होती, इसका स्वाद खट्टा होता है। सल्फी के रस में औषधीय गुण होते हैं। ताजी सल्फी का एक निश्चित मात्रा में सेवन करने पर वह पाचन तंत्र को दुरुस्त करने में सहायक सिद्ध होती है। इससे पथरी रोग का इलाज भी किया जाता है। इसका रस बासी होने के कारण इसमे खमीर उठने से इसका नशा बढ़ जाता है। इसलिए लोग इसको बस्तर बियर कहते हैं।
अगर आपको सल्फी का स्वाद लेना है तो ठंड के मौसम में बस्तर जाना पड़ेगा। क्योंकि ठंड का मौसम आने पर ही सल्फी पेड़ से रस निकलता है। आपको बड़ी आसानी से बस्तर के आदिवासियों के आंगन और खेतों के किनारे ताड़ के पेड़ जैसा दिखने वाला सल्फी का पेड़ दिखाई दे जाएगा। लगभग चालीस फिट की ऊंचाई वाले सल्फी के पेड़ की आयु जब 8 साल से अधिक हो जाती है, तब उससे रस निकलना शुरू होता है। आदिवासी पेड़ पर मटकी बांधकर उसका रस इकट्ठा करते हैं। गांव के हाट बाजार में सल्फी का रस बेचकर अच्छी खासी कमाई कर लेते हैं। बाहर से आने वाले पर्यटकों में इसकी डिमांड अधिक होने की वजह से सल्फी का रस 40 से 50 रुपये लीटर बिक जाता है।

बेटी को दहेज में दिया जाता है सल्फी का पौधा
घर की जरूरतों को पूरा करने की वजह से इसे धन का पेड़ भी कहा जाने लगा है। आदिवासियों के जीवन में इस पेड़ का इतना महत्त्व है कि जिसके घर में सल्फी का पेड़ है, उसे समृद्ध माना जाता है। भारतीय संस्कृति में शादी में बेटी को दहेज के तौर पर जरूरत की वस्तुएं देने का रिवाज है। सल्फी का पेड़ इतना उपयोगी माना गया है कि बस्तर के आदिवासी इसके पौधे को अपनी बेटियों को दहेज के तौर पर देते हैं।
आदिवासी इसको अपने परिवार के सदस्य की तरह मनाते हैं।मान्यता है कि जिसके घर संतान नही, वह सल्फी का वृक्ष लगाकर उसे बच्चे की तरह बड़ा करते हैं, जब यह बच्चा बड़ा हो जाता है, तो आमदनी का जरिया बनता है।
सल्फी के पेड़ से रस निकालने के भी नियम हैं। रस निकालने का काम किसी खास व्यक्ति को ही दिया जाता है। रस निकालने से पहले वह देवी देवता की पूजा करता है, फिर देवताओं की अनुमति से रस निकालता है।

सूख रहे हैं सल्फी के पेड़ !
छत्तीसगढ़ के अब बस्तर की सल्फी इतनी लोकप्रिय है कि एक समय में चर्चा थी कि छत्तीसगढ़ सरकार गोवा की फेनी की तरफ इसकी ब्रांडिंग करके बाजार में उतारेगी। लेकिन हमेशा सरकार इसको लेकर उदासीन दिखाई दी और चर्चाएं केवल चर्चा बनकर ही रह गईं। अगर समय रहते इसको लेकर कोई ठोस योजना नही बनाई गई, तो बस्तर की संस्कृति का हिस्सा माने जाने वाले सल्फी पेड़ विलुप्त भी हो सकते हैं। मिली जानकारी के मुताबिक अब बस्तर में सल्फी के पेड़ सूखने लगे हैं। बस्तर कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों की तरफ से किये गए एक शोध में पता चला है कि ऑक्सीस्पोरम फिजियोरियम नाम के एक फंगस की वजह से बस्तर में अब सल्फी के पेड़ तेजी से सूख रहे हैं। इसपर विशेष कार्ययोजना बनकर काम करने की जरूरत है। तभी सल्फी के पेड़ बचाये जा सकेंगे।
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