Jabalpur में कंडम Bus बन रही कोहिनूर, क्रिएटिविटी में ढल रहा कबाड़, बनी रहेगी ग्रीन और क्लीन सिटी
मध्य प्रदेश के जबलपुर में नगर निगम ने पुरानी बसों का नवाचार शुरू किया हैं। इसकी शुरुआत ISBT, रेलवे स्टेशन जैसी जगहों से की जा रही है। कबाड़ में तब्दील हो रही बसों को नई शक्ल दी जा रही हैं।

Decaying buses creativity: कहने के लिए तो गुजरते वक्त के हिसाब से अनयूज्ड चीजे कबाड़ में तब्दील हो जाती हैं। लेकिन उस कबाड़ को क्रिएटिविटी में ढाल दिया जाए तो वह कीमती हो जाता हैं। कबाड़ में ऐसी ही क्रिएटीविटी का चलन हिन्दुस्तान में भी बढ़ रहा हैं।
हम बात कंडम बसों की कर रहे हैं। ऐसी प्राइवेट बसों को उनके मालिक अपने अनुसार उपयोगी बना रहे तो वहीं अब सरकारी महकमे भी पीछे नहीं। मध्य प्रदेश के जबलपुर में नगर निगम ने ऐसी ही बसों का पब्लिक फैसिलिटी में उपयोग करना शुरू कर दिया हैं।

सिटी ट्रांसपोर्ट की सरकारी बस जो सड़क पर दौड़ने लायक नहीं बची और कबाड़ हैं, उनके ढांचे का कई रूप में इस्तेमाल किया जा रहा हैं। हाल ही में नगर-निगम ने ऐसी कई बसों की शक्ल बदल दी। उनको रंग-रोगन कर रैन-बसेरा, चेंजिंग रूम, थैला बैंक या फिर बर्तन बैंक बना दिया गया।

नगर निगम कमिश्नर स्वनिल वानखेड़े बताते है कि यह नवाचार बस स्टेंड, रेलवे स्टेशन और सार्वजनिक जगहों पर पब्लिक के लिए फायदेमंद होगा। ऐसी जगहों पर कई बार यात्री रहने का ठिकाना ढूंढते हैं। उनको इससे बड़ा सहारा मिलेगा। वहीं अनुपयोगी सामान का बैंक भी बनाया जा रहा हैं।

जिसमें आम लोग ऐसी वस्तुएं जो उनके उपयोग की नहीं हैं, लेकिन किसी जरुरतमंद को उपयोगी है। इन बैंक में जमा की जा सकती हैं। पुरानी हो चुकी बसों के पुर्जों को भी उपयोग में लाने का प्लान किया गया है। इस नवाचार पर यदि ठीक ढंग से अमल हुआ तो कई फायदे होंगे।

इससे पहले मध्य प्रदेश में आनंदम नाम से 'नेकी की दीवार' योजना शुरू की गई थी। बड़े शहरों में जब इसकी शुरुआत हुई, खूब सराहा गया। आम लोगों ने गरीब बेसहारा तबके का ख्याल रखते हुए अपनी भागीदारी दिखाई। लेकिन बाद में इस पर ग्रहण लग गया। ऐसी जगह अब गायब ही हो गई हैं।

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