Guru Purnima 2023: दुनिया में करोड़ों फॉलोअर्स वाले Osho को जब जबलपुर में 'मग्गा बाबा' ने दी थी चेतावनी
Guru Purnima 2023: गुरू पूर्णिमा पर दुनिया में आचार्य रजनीश ओशो को उनके करोड़ों अनुयायी याद कर रहे हैं। दार्शनिक प्रवृत्ति के ओशो जब भौतिक रूप में थे, तो गुरु पूर्णिमा उत्सव दुनिया भर में खास अंदाज में मनाया जाता था। वह परंपरा आज भी चली आ रही है।
ओशो ने 1990 में भौतिक शरीर त्याग दिया, लेकिन उनके निधन के 33 साल बाद भी उनके शिष्य और भक्त उन्हें गुरू पूर्णिमा के दिन महसूस करते हैं। ओशो की ऊर्जा और ध्यान की घनघोर आभा में इस दिन उनके अनुयायी अलग नजर आते हैं।
लेकिन सवाल है कि दुनिया के करोड़ों लोग जिस हस्ती के मुरीद होते चले आए, उसका गुरु कौन था? ओशो के जीवन में घटित घटनाओं में वो कौन लोग थे, जिन्होंने रजनीश से बने ओशो को नई दिशा देने का काम किया था। इस आर्टिकल में आज ओशो की जिंदगी से जुड़ी ऐसी ही जबलपुर की याद शामिल हैं। 'मग्गा बाबा' नाम अटपटा लेकिन ये वो नाम है, जिनके बारे में दावा किया जाता हैं, कि ओशो को उन्होंने ही नई दिशा दी थी। बतौर अघोषित गुरु के तौर पर।

जबलपुर में 'मग्गा बाबा' कौन?
जबलपुर के लेखक और विचारक पंकज स्वामी बताते है कि 'मग्गा बाबा' जबलपुर के स्थायी वाशिन्दे नहीं थे। वे यहं 10-15 साल तक रहे और शहर की सड़कों में फटे-हाल घूमते रहते थे। बाबा हाथ में एक डिब्बा थामे रहते थे। यह डिब्बा मग की भांति था। उनका असली नाम कोई नहीं जानता था। हाथ में मग थामे रखने से लोग उन्हें मग्गा बाबा के नाम से पुकारने लगे थे। जब भी कोई उनका नाम पूछता तो वे मग चमका देते थे। उस समय जबलपुर में लोग मग्गा बाबा को घेरे रखते थे। हद तो यह हो जाती थी कि लोग अपने स्वार्थ में मग्गा बाबा को सोने तक नहीं देते थे।
बाबा से मिलने और घुमाने मचती थी होड़
बताया जाता है कि मग्गा बाबा निवाड़गंज में किराना बाजार की दुकानों के छप्पर पर सोते थे। बाबा जब आराम की मुद्रा में नीम के पेड़ के नीचे होते, तब असंख्य महिला-पुरूष उनके हाथ पैर दबाते और मालिश करते। रिक्शे वालों में उन्हें सड़क पर घुमाने की होड़ लगी रहती थी। बाबा के लब पर चार-चार बीड़ी खुसी हुई रहती थी। कई बार लोग उनसे बात करने की कोशिश करते तो वे मौन हो जाते या कुछ अज़ीब भाषा में बोलते। जिसे लोग उनकी बातों को समझ ही नहीं पाते थे। वे भाषा का प्रयोग बिल्कुल नहीं करते थे।
बाबा की अजीब आवाज और अजीब जबाव
बाबा सिर्फ आवाज लगाते थे। उदाहरण के लिए-"हिग्गलाल हू हू हू गुल्लू हिग्गा ही ही।" फिर वह प्रतीक्षा करते और फिर पूछते-"ही ही ही?" तब लोगों को ऐसा महसूस होता जैसे वे पूछ रहे हैं- "क्या आप समझ गए?" और लोग कहते-और "हाँ, बाबा, हाँ।" बाबा अपने मग्गे में जो मिलता जाता उसे सान कर खा लेते थे। बाबा को बिना मांगे लोग इकन्नी, दुअन्नी, पांच व दस पैसे देते थे। बाबा इनको हथेली में एक के ऊपर एक रखते और जो चिल्लर सरक जाती उसे वे हवा में उछाल दिया करते थे।
सिर्फ ओशो, जिनसे मग्गा बाबा करते थे बात
पंकज स्वामी ने बताया कि मग्गा बाबा ने केवल एक बार रजनीश से बात की थी। यह बात उस समय की गई थी, जब वे रजनीश से बात तो करना चाहते थे लेकिन कुछ लोग नहीं चाहते थे कि मग्गा बाबा और रजनीश के बीच में कोई बातचीत हो। जबलपुर में कई बार ऐसा भी हुआ कि भीड़ का एक ग्रुप मग्गा बाबा को जबरदस्ती अगवा कर अपने साथ ले जाता था। एक दिन में उनके न दिखने पर दूसरा समूह बाबा को दूंढ़ कर सामने ला देता था। लेकिन एक बार मग्गा बाबा जो गायब हुए उसके बाद जबलपुर में कभी नहीं दिखे।
ओशो से क्या कहा था?
मग्गा बाबा ने गायब होने से पहले एक रात पूर्व रजनीश से कहा था- ''हो सकता है कि मैं आपको एक फूल के रूप में विकसित न देख सकूं, लेकिन मेरा आशीर्वाद आपके साथ रहेगा। यह संभव है कि मैं वापस नहीं आ पाऊंगा। मैं हिमालय की यात्रा की योजना बना रहा हूं। मेरे ठिकाने के बारे में किसी को कुछ मत बताना। रजनीश खुश हुए कि मग्गा बाबा हिमालय की ओर जा रहे हैं। मग्गा बाबा ने रजनीश को बताया कि हिमालय उनका घर है। रजनीश ने मग्गा बाबा को जीसस, बुद्ध, लाओत्से की श्रेणी में रखा था।
ओशो ने बाबा को इस रूप में देखा
रजनीश ने कहा कि मग्गा बाबा निःसंदेह मौन की भाषा सबसे अधिक जानते थे। वह लगभग जीवन भर चुप रहे। दिन में वह किसी से बात नहीं करते थे, लेकिन रात में वह मुझसे तभी बात करते थे जब मैं अकेला होता था। उनके कुछ शब्द सुनना एक ऐसा आशीर्वाद था, जिसे व्यक्त करना मुश्किल है। मग्गा बाबा ने रजनीश से कहा-"जीवन जितना दिखता है, उससे कहीं अधिक है। उसके रूप को देखकर न्याय न करो, लेकिन उन घाटियों की गहराई में उतरो, जहां जीवन की जड़ें हैं। मग्गा बाबा अचानक बोलते और अचानक वह चुप हो जाते थे। वह उनका तरीका था।
आधी रात में हुआ करती थी मुलाकात
रजनीश मग्गा बाबा के पास रात के अंधेरे में जाते थे। समय होता था रात के दो बजे। ठंड की रात में आग के पास वे अपने पुराने कम्बल में लिपटे रहते थे। रजनीश थोड़ी देर उनके पास बैठ जाते। रजनीश कहते थे कि उन्होंने मग्गा बाबा को कभी परेशान नहीं किया। यही एक कारण था कि मग्गा बाबा रजनीश को बहुत प्यार करते थे। बीच-बीच में ऐसा होता कि वे करवट बदलते, आंखें खोलकर रजनीश को वहां बैठा देखते और अपनी मर्जी से बातें करने लगते थे।
जब मग्गा बाबा ने ओशो को दी थी चेतावनी..
1981 और 1984 के बीच ओरेगॉन में ओशो ने 315 दिनों तक मौन की एक समान अवधि देखी, जो उनके ज्ञानोदय के बाद की अवधि में मौन दिनों की संख्या के समान थी। उस वक्त ओशो ने संकेत दिया था। जबकि मग्गा बाबा ने इस चीज को वास्तव में उन्हें पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया था। साथ ही उन्होंने इस दौरान ओशो को चेतावनी दी कि वे अपने ज्ञान की घोषणा न करें, क्योंकि इससे उनके श्रोताओं के बीच विरोध पैदा होगा। ओशो ने सार्वजनिक रूप से अपने ज्ञान को तब तक स्वीकार नहीं किया, जब तक उन्होंने नवंबर 1972 में क्रांति को नहीं बताया। करीब एक साल बाद उन्होंने अपना नाम 'भगवान श्री रजनीश' में बदल लिया फिर अपनी कठिन और जीवन को खतरे में डालने वाली यात्राओं को रोक दिया था।












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