भारतीय कश्मीर में सुलह की संभावना कितनी

नई दिल्ली, 28 सितंबर। भारत प्रशासित कश्मीर के श्रीनगर में 58 वर्षीय नाविक शब्बीर कहते हैं, "कश्मीर में हर चीज की तरह, मैं भी अपने पिछले दिनों की छायामात्र हूं."

Provided by Deutsche Welle

शब्बीर (बदला हुआ नाम), डल झील पर एक पारंपरिक पीली शिकारा नाव के मालिक हुआ करते थे. झील का तैरता बाजार शब्बीर की आजीविका का मुख्य साधन था. यह तब तक था जब तक भारत सरकार ने 5 अगस्त 2019 को भारत प्रशासित कश्मीर की अर्ध-स्वायत्त स्थिति को समाप्त करने का निर्णय नहीं लिया था.

जब इस क्षेत्र ने अपना विशेष दर्जा खो दिया और एक कड़ी सुरक्षा बंद हो गई तो शब्बीर ने अपनी आजीविका के साथ-साथ अपनी पीली नाव भी खो दी.

डीडब्ल्यू से बातचीत में शब्बीर कहते हैं, "मेरे पास एक रिश्तेदार के साथ उसकी नाव पर काम पर जाने के अलावा कोई चारा नहीं था. मेरी दो बेटियां हैं जिनकी शादी करनी है. सरकारी हुक्मरान कहते हैं कि चीजें वापस सामान्य हो रही हैं, लेकिन मुझे यह दिखाई नहीं दे रहा है. कोई उम्मीद भी नहीं है और न कोई भरोसा है. जो हुआ, उसे मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा."

कश्मीर का 'अलगाव'

1947 के बाद से ही यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र भारत और पाकिस्तान जैसे परमाणु हथियारों से लैस दो देशों के बीच विवाद का विषय रहा है.

कश्मीर ने पिछले कुछ दशकों में एक खौफनाक विद्रोह देखा है, साथ ही साथ हजारों हिंदुओं या कश्मीरी पंडितों का सामूहिक पलायन, भारी सैन्यीकरण और सुरक्षा लॉकडाउन के साथ ही मानवाधिकार हनन की तमाम घटनाओं का भी गवाह रहा है.

कश्मीर वाला के संस्थापक और संपादक फहाद शाह कहते हैं कि कश्मीरी अलग-थलग पड़ गए हैं. "अलगाव को समझने के लिए आपको यह समझने की जरूरत है कि एक छोटा कश्मीरी बच्चा कैसे बड़ा होता है."

शाह कहते हैं, "साल 1996 के चुनाव के दौरान मैं एक छोटा लड़का था और मुझे याद है कि सेना मेरे घर के अंदर आ रही थी और वहां के लोगों को वोट देने के लिए ले जा रही थी. मुझे याद है कि मैं अपनी मां के साथ आंगन में बैठकर घर को बर्बाद न करने के लिए कह रहा था. आप कश्मीर में बढ़ती हुई कार्रवाई की एक पूरी श्रृंखला को देखिए, आप हमलों और हत्याओं को देखिए. कश्मीर में एक युवा दिमाग शुरू से ही क्यूरेट हो जाता है. आप यह जानने लगते हैं कि सामान्य लोग ऐसा नहीं करते हैं और सामान्य स्थिति में ऐसा नहीं होता है."

'सुलह का सवाल नहीं'

उत्तरी कॉलराडो विश्वविद्यालय में राजनीतिक मानवविज्ञानी अतहर जिया को नहीं लगता कि भारत सरकार के साथ सुलह संभव है. डीडब्ल्यू से बातचीत में वह कहती हैं, "यदि किसी के गले पर कोई चाकू रखे हो, तो मुझे नहीं लगता कि यह सुलह की स्थिति है. मुझे नहीं लगता कि कश्मीर में निरस्तीकरण के बाद की कोई दुनिया है. यह लगातार अपमान की स्थिति है. यदि हम सोचते हैं कि कश्मीरी लोग अपने जख्मों को भूलकर उनके साथ सामंजस्य बिठाएंगे, तो यह भूल होगी. लोग ऐसे जख्मों को नहीं भूलते."

कश्मीर में जो कुछ हो रहा है जिया उसे "लोगों का धीमा नरसंहार" और "युवा लड़कों की हत्या" कहती हैं. वह कहती हैं, "ये युद्ध अपराध हैं. वे यानी भारत सरकार, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की इन सड़कों का निर्माण कर रहे हैं. कश्मीरियों को भारत से अपने लिए उम्मीद नहीं दिखती, इसलिए सुलह का सवाल ही नहीं है."

सुलह की कोशिशें ?

एक हिंसक विद्रोह और उत्पीड़न के डर ने साल 1990 के दशक की शुरुआत में हजारों कश्मीरी हिंदुओं को उनके घरों से निकाल दिया. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद करीब 520 कश्मीरी प्रवासी इस क्षेत्र में लौट आए हैं.

मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि जम्मू और कश्मीर में प्रशासन कश्मीरी हिंदुओं की वापसी की सुविधा के लिए जरूरी चीजों पर काम तेज कर रहा है. लेखक राहुल पंडिता, उस वक्त 14 साल के थे जब वो अपने परिवार के साथ कश्मीर से भाग गए थे. डीडब्ल्यू से बातचीत में राहुल पंडिता कहते हैं, "मैं सुलह और कश्मीरी पंडितों की वापसी के बारे में भी निराशावादी हूं. हम सुलह या कश्मीरी पंडितों की तथाकथित वापसी की बात करते हैं, लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि आज की कश्मीर घाटी 1990 की कश्मीर घाटी की तुलना में 10 गुना अधिक कट्टरपंथी है."

उनके मुताबिक, "कश्मीरी पंडितों से यह उम्मीद करना कि वे शेष भारत या बाकी दुनिया में बहुत सावधानी से अपनी बेहतर जीवनशैली छोड़कर इस कट्टरपंथी घाटी में वापस चले जाएंगे, जहां उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. उनसे यह पूछना ही उनके प्रति अत्याचार है."

दक्षिण अफ्रीका और रवांडा में सच्चाई और सुलह आयोगों का हवाला देते हुए राहुल पंडिता कहते हैं कि किसी भी सुलह की पहली आवश्यकता इतिहास की स्वीकृति होती है. वह कहते हैं, "बहुसंख्यक कश्मीरी मुसलमान उन परिस्थितियों से पूरी तरह इनकार करते हैं जिनके कारण कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ. पलायन के तीस साल बाद भी ऐसी कोई स्वीकारोक्ति नहीं हुई, यहां तक कि निजी बातचीत में भी नहीं."

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1990 के दशक में मारे गए कश्मीरी हिंदुओं की संख्या 219 थी, लेकिन पंडिता कहते हैं कि हिंसा में कम से कम 700 लोग मारे गए थे. पंडिता यह भी कहते हैं कि अभी तक एक भी दोष सिद्ध नहीं हुआ है.

वह कहते हैं, "दुर्भाग्य से यह सरकार भी कश्मीरी पंडितों को किसी भी प्रकार का न्याय देने के प्रति गंभीर नहीं है. उनसे किसी भी सुलह का हिस्सा बनने की उम्मीद करना व्यर्थ है."

जिया के अनुसार, भारत के राजनीतिक ढांचे ने "इन दो स्वदेशी समुदायों के दर्द को हथियार बना दिया है."

उनके मुताबिक, "मुझे लगता है कि यह इन दोनों समुदायों को सोचना है कि वे एक दूसरे को कितनी दूर तक हथियार बनाना चाहते हैं. क्या कश्मीरी पंडित एक साथ आना चाहते हैं और सेना के घेरे वाले कस्बों में रहना चाहते हैं, या क्या वे ऐसे लोगों के रूप में वापस आना चाहते हैं जो बहुसंख्यक समुदाय वाले पड़ोस के बीच रहना चाहते हैं?"

जिया कहती हैं, "लोगों को इन्हीं मैकियावेलियन नीतियों की इन साजिशों से ऊपर उठना होगा जिन्हें इन सरकारों ने लागू किया है."

Source: DW

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