China News: शी जिनपिंग के शासन काल में मानवाधिकार की मांग करने वालों का हश्र क्या हुआ ? जानिए
Chinese Communist Party congress:चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले मुल्क के बेताज बादशाह बन चुके हैं। चीन पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का राज है और पार्टी पर जिनपिंग की पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी है कि वह पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। क्योंकि, इच्छा या अनिच्छा से शी जिनपिंग की ताकत के पीछे पूरा चीन खड़ा है। चीन में जिनपिंग का प्रभुत्व कायम होने से एक बात यह हुई है कि वहां सिविल सोसाइटी और मानवाधिकार जैसे मुद्दे लगभग विलुप्त हो चुके हैं। जबकि, भारत जैसे देश में इन मसलों के पीछे साम्यवादी सोच की बहुत बड़ी भूमिका रही है। कम से कम इस सोच के लोग इस तरह के मसलों को प्रभावित करने की ताकत तो जरूर रखते हैं।

शी जिनपिंग के शासन काल में सिविल सोसाइट पर हथौड़ा -रिपोर्ट
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कार्यकाल का 10 साल हो चुका है। इस एक दशक में चीन की सिविल सोसाइट और मानवाधिकारों की उनकी मांगों को या तो बुरी तरह से कुचला जा चुका है या फिर ऐसी सोच वाले लोग जेलों में पड़े हैं या फिर उन्हें निर्वासन में दिन काटने पड़ रहे हैं। एक विदेशी न्यूज एजेंसी एएफपी से एक मानवाधिकार कार्यकर्ता चार्ल्स ने कहा है कि एक ऐसा भी वक्त था, जब चीन में सिविल सोसाइटी बहुतायत में थी। इसकी मदद से वह लोगों के जीवन बदलने में मदद कर सकते थे। आज की तारीख में उनके जैसे सामाजिक संगठनों को चीन में तबाह किया जा चुका है और अब उसके पुर्जन्म की उम्मीदें भी टूट चुकी हैं। चार्ल्स चीन छोड़कर भाग निकले थे और उनके जो दोस्त पकड़ लिए गए, वे जेलों में दिन काट रहे हैं। उन्होंने कहा, '2015 के बाद चीन में सिविल सोसाइटी खत्म होने लगी और अब पूरी तरह से खंडित हो चुकी हैं।'

सिविल सोसाइटी के जो लोग सामने हैं, वे हो रहे हैं प्रताड़ित-रिपोर्ट
चीन ने पिछले दशकों में कुछ सिविल सोसाइटी आंदोलन देखे हैं, उभरते हुए स्वतंत्र मीडिया की आहट भी सुनी है और वहां शैक्षिक आजादी की उम्मीदें भी कायम हुई थीं। लेकिन शी जिनपिंग के तीसरे कार्यकाल के साथ ही काफी आशाएं-आकांक्षाओं के और भी तबाही की ओर बढ़ने का अंदेशा है। शी की नीति काफी स्पष्ट है। कम्युनिस्ट पार्टी को जिससे खतरा होने की आशंका है, उसे कुचल डालो। ढेर सारे एनजीओ कार्यकर्ता, अधिकारियों की आवाजें उठाने वाले वकील और ऐक्टिविस्टों को या तो धमका कर रखा गयाे या फिर जेलों में डाल दिया गया, नहीं तो निर्वासित कर दिया गया। एजेंसी ने कई चीनी ऐक्टिविस्ट और बुद्धिजीवियो से बातचीत की है, जिनमें से कई ने बताया है कि वहां की सिविल सोसाइटी के साथ क्या हुआ है। लेकिन, बावजूद जिनपिंग की तानाशाही के कुछ लोग अभी भी हर विपरीत परिस्थियों में डटे हुए हैं। हालांकि, इससे उनपर काफी मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ रहा है। एक एलजीबीटीक्यू राइट्स एनजीओ कार्यकर्ता ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, 'मैं और मेरे सहयोगियों से अक्सर 24-24 घंटे पूछताछ होती है।' उनके मुताबिक, 'हम अधिक से अधिक असमर्थ हुए हैं, चाहे वित्तीय हो या काम-काज के नजरिए से या फिर निजी स्तर पर।'

बढ़ती रही जिनपिंग की ताकत, बढ़ता गया क्रैकडाउन
2015 से चीन में '709 क्रैकडाउन' के नाम से एक अभियान शुरू किया गया। कुछ ही समय में 300 से ज्यादा वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता जेल में डाल दिए गए। राइट्स ग्रुप के मुताबिक कई वकील तो वर्षों जेल के अंदर रहे या उन्हें सरकारी निगरानी में रखा गया। जबकि, कुछ पर तो पाबंदी ही लगा दी गई। 2016 से चीन में काम करने वाले एनजीओ के खिलाफ और भी सख्त कदम उठाए गए। एक पर्यावरन एनजीओ कार्यकर्ता ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, 'अब हमें कुछ भी करने से पहले पुलिस को हर हाल में बताना है। कोई भी प्रोजेक्ट निश्चित रूप से सरकारी विभागों के साथ तालमेल में चलेगा, जो कि सुपरवाइजरी कमेटी की तरह काम करती है।'

अब चीन में चल रही है जीरो-टॉलरेंस की नीति
पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ के जमाने में ऐसा नहीं था। उनके कार्यकाल में सिविल सोसाइटी के लिए काफी कुछ करने की गुंजाइश बची हुई थी। एलजीबीटीक्यू ग्रुप के युवा मेंबर कार्ल ने कहा कि '2015 के आसपास विश्वविद्यालयों में कई एलजीबीटीक्यू और लिंग-आधारित ग्रुप उभर आए थे।' हालांकि, उन्होंने तभी से 'दबाव बढ़ने का अनुभव' शुरू कर दिया था। लेकिन, 2018 तक तो चीन की सरकार ने इस तरह के राइट्स ऐक्टिविस्ट के खिलाफ जीरो-टॉलरेंस की नीति अपना ली। #मीटू नारीवादी आंदोलन हो या कोई दूसरी छात्र आंदोलन सबको सख्ती से कुचला जाने लगा। कार्ल ने बताया 'प्रतिबंध से पहले ऐक्टिविस्ट को चुपचाप इजाजत दी जाती थी, इस दौरान राजनीतिक शिक्षा जैसे वैचारिक वर्क भी बढ़ गए थे।' लेकिन, बाद में इस मोर्चे पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना की सरकार काफी सख्त हो गई थी और स्टूडेंट ग्रुपों पर कठोरता के साथ ही सोशल मीडिया पर भी डंडा चलाया जाने लगा।

जो डटे रहे उनके साथ क्या हुआ ?
बीजिंग के स्वतंत्र पत्रकार गाओ यू कहते हैं कि 'एक सामान्य समाज में बुद्धिजीवी सरकार की गलतियों पर सवाल उठा सकते हैं। नहीं तो.......यह वैसा ही नहीं है, जैसे कि माओ काल में हो?' साम्यवादी चीन के संस्थापक माओ जेडॉन्ग की चर्चा करने वाले गाओ कथित तौर पर एक दस्तावेज लीक करने के आरोप में 2014 से लेकर 2020 तक या तो जेल में थे या नजरबंद करके रखे गए थे। 78 वर्षीय गाओ को आज सोशल मीडिया सर्विलांस का सामना करना पड़ रहा है। उनके पास आय के लगभग कोई साधन नहीं बचे हैं और उन्हें विदेशी कॉल लेने या दोस्तों के साथ मिलने-बैठने से रोक दिया गया है।

'नहीं जीतने लायक लड़ाई'
बिल्कुल ही विपरीत वातावरण में कई ऐक्टिविस्ट ने या तो चीन छोड़ने में भलाई समझी है या फिर अपने काम को रोक दिया है। ऑनलाइन निशाना झेलने के बावजूद कुछ मुट्ठी भर ही बचे हैं, जो अभी भी डटे है। इक्विटी नाम के जेंडर राइट्स ग्रुप के संस्थापक फेंग यूआन ने कहा, 'शायद इस समय हम लोग घाटी के तल में हैं........लेकिन, लोग अभी भी बिना थके बोल रहे हैं। ' लेकिन, पर्यावरण से जुड़े संगठन के एक कार्यकर्ता जैसे लोगों के लिए यह राष्ट्रवादी ट्रोल, जो कि एजीओ के लोगों को 'चीन-विरोधी और पश्चिम के द्वारा ब्रेनवॉश किए गए' लोगों के खिलाफ 'नहीं जीतने लायक लड़ाई' है।












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