UNESCO से अमेरिका को बाहर क्यों निकाल रहे ट्रंप? यहूदियों पर क्या असर पड़ेगा
America and UNESCO: अमेरिका के राष्ट्रपति ने जब से अमेरिका में दोबार सत्ता संभाली हैं, वो अपने फैसलों और पॉलिसी से पूरी दुनिया को हैरान कर रहे हैं। अब डोनाल्ड ट्रम्प UNESCO से अमेरिका को बाहर निकालने का ऐलान कर दिया है। ट्रंप का ये फैसला 31 दिसंबर 2026 से प्रभावी होगा।
यह निर्णय अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के पहले कार्यकाल के दौरान 2018 में यूनेस्को छोड़ने के बाद, दो साल पहले फिर से शामिल होने के बाद आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका और इज़राइल विरोधी झुकाव, साथ ही यूनेस्को के 'वेक' एजेंडे को इसका कारण बताया है।

ट्रम्प प्रशासन ने UNESCO पर आरोप लगाया कि वह "woke" यानी सामाजिक-सांस्कृतिक एजेंडा-DEI (Diversity, Equity & Inclusion) नीति को बढ़ावा दे रहा है, जो अमेरिका की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के विपरीत है। साथ ही UNESCO पर प्रो-फिलिस्तीनी और प्रो-चीन झुकाव होने का आरोप लगाया गया है, जिसमें यह विशेष रूप से महिलाओं और लैंगिक समानता के कार्यक्रमों या "anti‑racism toolkit" जैसी पहलों को लक्ष्य बना रहा है।
यूनेस्को के इस फैसले को बताया अमेरिकी नीति के विरुद्ध
अमेरिका का मानना है कि यूनेस्को में उसकी भागीदारी देश के राष्ट्रीय हित में नहीं है और यह एजेंसी इजरायल विरोधी भाषणों को बढ़ावा देती है। विदेश विभाग की प्रवक्ता टैमी ब्रूस ने कहा कि यह निर्णय यूनेस्को के "विभाजनकारी सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों को आगे बढ़ाने" के एजेंडे से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि यूनेस्को का "फिलिस्तीन राज्य" को सदस्य के रूप में स्वीकार करने का निर्णय अमेरिकी नीति के विपरीत है और संगठन के भीतर इजरायल विरोधी बयानबाजी को बढ़ावा देता है, जो बेहद समस्याग्रस्त है।
ट्रम्प ने समीक्षा का दिया था आदेश
फरवरी में, ट्रम्प ने यूनेस्को में अमेरिका की उपस्थिति की 90-दिवसीय समीक्षा का आदेश दिया था। उन्होंने संगठन के भीतर किसी भी "यहूदी विरोधी या इज़राइल विरोधी भावना" की जांच पर विशेष जोर देने की मांग की थी। रिपोर्टों के अनुसार, समीक्षा के बाद, अधिकारियों ने यूनेस्को की विविधता, समानता और समावेश नीतियों और इसके फिलिस्तीनी समर्थक और चीन समर्थक पूर्वाग्रह पर आपत्ति जताई।
ट्रंप के अनुसार यूनेस्को का दोष क्या हैं?
व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने यह भी कहा कि यूनेस्को ने इजरायल विरोधी और यहूदी विरोधी कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए अपने कार्यकारी बोर्ड का इस्तेमाल किया, और इसने यहूदी पवित्र स्थलों को "फिलिस्तीनी विश्व धरोहर" स्थलों (Palestinian World Heritage Sites) के रूप में शामिल कर दिया। "occupied" जैसा शब्द इस्तेमाल करके इज़राइल की आलोचना की, लेकिन हमास की हिंसा की निंदा में चुप्पी बनी रही।
यहूदियों पर क्या असर पड़ेगा?
ट्रम्प प्रशासन का मुख्य तर्क यह रहा कि UNESCO की नीतियाँ अक्सर anti‑Israel और anti‑Jewish झुकाव को बढ़ावा देती हैं। इससे अमेरिकी यहूदी संगठनों में कुछ समूहों द्वारा इस निर्णय का स्वागत किया जा रहा है, क्योंकि वे इसे इज़राइल के प्रति उस कथित पूर्वाग्रह से दूरी बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम मानते हैं। लेकिन UNESCO की होलोकॉस्ट शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण पहल कमजोर हो सकती हैं, जिससे विश्व स्तर पर यहूदी विरासत पर असर हो सकता है।
यूनेस्को हमास के साथ इजरायल के युद्ध का आलोचक है
गौरतलब है कि यूनेस्को अक्सर हमास के साथ इजरायल के युद्ध की आलोचना करता है और कहता है कि फिलिस्तीन "यहूदी राज्य" द्वारा "कब्जा" किया गया है। हालांकि, रिपोर्टों के अनुसार, यह गाजा पर हमास के शासन को दोष नहीं देता है। इस बीच, बीजिंग यूनेस्को का दूसरा सबसे बड़ा फंड दाता है। अधिकारी ने कहा, "चीन ने बीजिंग के हितों के अनुकूल वैश्विक मानकों को आगे बढ़ाने के लिए यूनेस्को पर अपने प्रभाव का लाभ उठाया है।"
2017 में भी ट्रंप ने यूनेस्को से अमेरिका को निकालने का आदेश दिया था
अमेरिका ने पहली बार 1983 में पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के तहत यूनेस्को से वापसी की, यह कहते हुए कि संगठन ने "लगभग हर उस विषय को अनावश्यक रूप से राजनीतिक बना दिया है जिससे वह निपटता है।ट्रम्प ने पहले भी 2017 में संयुक्त राज्य अमेरिका को यूनेस्को से बाहर करने का आदेश दिया था। उस समय भी, उन्होंने इजराइल विरोधी पूर्वाग्रह का हवाला दिया था। 2023 में, जो बिडेन ने अमेरिका को फिर से यूनेस्को में शामिल किया। उस समय, पूर्व राष्ट्रपति ने कहा था कि संगठन पर चीन की बढ़ती पकड़ का मुकाबला करने के लिए एक अमेरिकी उपस्थिति महत्वपूर्ण है।












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