मिस्र की ममी को क्यों खाने लगे थे यूरोप के लोग? तूतनखामेन के ‘शाप’ ने ममियों को कैसे बचाया?
सभी डॉक्टरों को इस बात की जानकारी नहीं थी, कि बूढ़ी ममियों से ही सबसे अच्छी दवा बनाई जा सकती है। कुछ डॉक्टरों का मानना था, कि ताजे मांस और रक्त में जो जीवन शक्ति है, वो भी कमाल का है।
नई दिल्ली, जून 12: आखिरकार ऐसा क्या हुआ, कि लोग सोचने लगे, कि नरभक्षण उनके स्वास्थ्य के लिए अच्छा है? इस सवाल का जवाब उत्तर यूरोपीय इतिहास के सबसे पुराने वास्तविक कहानियों में एक झलक पेश करता है, उस समय जब यूरोपीय लोग मिस्र की ममियों के प्रति आसक्त थे और उन्हें खाने लगे थे। आखिर यूरोप के लोगों के मन में इतना भयानक विचार कहां से आया और फिर ये विचार कैसे खत्म हो गया?

ममी खाने से ठीक होती थी बीमारी?
यूरोप के लोगों के मन में अज्ञात स्रोतों से ये बात आई, कि मर जाने के बाद जमीन में दफना दिए गये टिंचर मानवों के अवशेष खाने से बुबोनिक प्लेग से सिरदर्द तक कुछ भी ठीक कर सकते हैं और फिर इस भयानक विचार के आने के बाद से विक्टोरियन लोगों के पास रात के खाने के ममी पड़ोसा जाने लगा। यूरोप के लोगों के लिए प्राचीन मिस्र में जमीन के अंदर दफना दी गई लांशें आकर्षण का विषय बन गई और मध्य युग से 19वीं शताब्दी तक करीब 500 सालों तक ऐसा चलता रहा।

लोगों का ममी मेनिया
लोगों के मन में आया यह विश्वास, कि ममियां बीमारी का इलाज कर सकती हैं, सदियों से लोगों को कुछ ऐसा खाने के लिए प्रेरित किया जो भयानक था। मुमिया, ममीकृत पिंडों से निर्मित उत्पाद, एक औषधीय पदार्थ था जो सदियों से अमीर और गरीब, एपोथेकरी की दुकानों में उपलब्ध होने लगा, और मिस्र के कब्रों से लाए गए ममियों के अवशेषों से दवाई बनाकर फिर इसे यूरोप भेजा जाने लगा। लाइव साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक, 12वीं शताब्दी तक औषधालय अपने अन्य औषधीय गुणों के लिए ग्राउंड अप ममियों का उपयोग कर रहे थे। अगले 500 वर्षों के लिए ममी एक निर्धारित दवा बन चुकी थी।

ममी की हड्डियों से बनी दवाईयां
लाइव साइंस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, उस वक्त दुनिया में एंटी बायोटिक दवाओं का आविष्कार नहीं हउआ था और उस वक्त वैद्यों ने सिर दर्द, या शरीर में लगे किसी चोट से बने सूजन को कम करने के लिए, या प्लेग का इलाज करने के लिए, या किसी और बीमारी का इलाज करने के लिए ममी की खोपड़ी, हड्डियों और मांस से दवाओं का निर्माण शुरू कर लोगों को देना शुरू कर दिया। इसके साथ ही धीरे धीरे नकली ममी से भी दवाओं का निर्माण होने लगा। लाइव साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक, गाइ डे ला फोंटेन नाम के एक शाही डॉक्टर को इस बात को लेकर शक था, कि ममी से किसी तरह की दवा बन सकती है और उन्होंने साल 1564 में अलेक्जेंड्रिया में मृत किसानों से बनाई गई जाली ममी दवाओं को देखा। और फिर उन्होंने महसूस किया, कि लोगों को ठगा जा सकता है। वे हमेशा असली प्राचीन ममी का सेवन नहीं करते थे।

असली ममी की आपूर्ति बेहद कम
हालांकि, जालसाजी के बाद भी दवाओं में इस्तेमाल होने के लिए मृत मांस की काफी ज्यादा डिमांड थी और मिस्र की असली ममी की आपूर्ति इसे पूरा नहीं कर सकती थी। लेकिन, औषधालय और औषधिविद अभी भी 18वीं शताब्दी में दवा बनाने के लिए असली ममी की मांस की तलाश कर रहे थे।

ममी से कैसे बनती थी दवाई
लाइव साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक, सभी डॉक्टरों को इस बात की जानकारी नहीं थी, कि बूढ़ी ममियों से ही सबसे अच्छी दवा बनाई जा सकती है। कुछ डॉक्टरों का मानना था, कि ताजे मांस और रक्त में जो जीवन शक्ति है, वो काफी पहले मर चुके लोगों में नहीं है। यह दावा कि ताजा मांस अच्छा है, रईसों के लिए काफी अच्छी खबर थी और इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय ने मिर्गी बीमारी से पीड़ित होने के बाद मानव खोपड़ी से दवा ली, और 1909 तक, चिकित्सकों ने आमतौर पर मानव खोपड़ी का उपयोग तंत्रिका संबंधी स्थितियों के इलाज के लिए किया। शाही और सामाजिक अभिजात वर्ग के लिए, ममी खाना एक रॉयल रूप से उपयुक्त दवा थी, जैसा कि डॉक्टरों ने दावा किया था कि मुमिया फिरौन से बनाया गया था।

डिनर, ड्रिंक और कार्यक्रम
19वीं शताब्दी तक लोगों ने बीमारी ठीक करने के लिए ममी का सेवन करना लगभग लगभग बंद कर दिया, लेकिन विक्टोरियन "अनरैपिंग पार्टियों" की मेजबानी में अभी भी ममी को शान के साथ पड़ोसा जा रहा था। और इन पार्टियों में मिस्र की लाशों को मनोरंजन और खाने-पीने के लिए खोल दिया जाता था। 1798 में नेपोलियन के मिस्र में पहले अभियान ने यूरोपीय उत्सुकता को बढ़ाया और 19वीं शताब्दी के यात्रियों को मिस्र में पूरी ममियों को यूरोप में वापस लाने की अनुमति दी और इस दौरान मिस्र में ममी की तलाश के लिए उन्हें जमीन से निकालने के लिए सड़कें भी खरीदी गईं। विक्टोरियन लोगों ने प्राचीन मिस्र की ममियों के अवशेषों को खाने के लिए निजी पार्टियों का आयोजन किया।

तूतनखामेन का ‘शाप’
20वीं सदी के शुरू होते ही ममी की अलिखित पार्टियां समाप्त हो गईं। भयानक रोमांच के लिए ममी खाने का खेल आखिरकार खत्म हो गया। लेकिन, उसके बाद ममियों पर रिसर्च शुरू हो गया। इसी समय तूतनखामेन के मकबरे की खोज हुई, लेकिन इसी समय ममी को लेकर एक अपशकुन भी शुरू हो गया। ममी को लेकर लोग डरने लगे। 1923 में तूतनखामेन ममी की खोज करने वाले लॉर्ड कार्नारवोन की अचानक मृत्यु, जो प्राकृतिक कारणों से हुई थी, उसे लोगों ने अंधविश्वास से जोड़ दिया और फिर "मम्मी का अभिशाप।" नाम से कई नई कहानियां बनने लगीं। लेकिन, अब ममी पर अलग तरह से रिसर्च होने लगे हैं और मिस्र से मिली ममी इतिहास के कई राज खोल रहे हैं।












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