रूस की दबंगई के सामने बेबस यूरोप-अमेरिका, पश्चिमी देशों को अब सता रहा है इससे भी बड़ा डर
मास्को, 24 फरवरी। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन पर युद्ध का ऐलान किया है। एक तरफ जहां पश्चिम के देश रूस के इस कदम की आलोचना कर रहे हैं तो दूसरी तरफ रूस को चीन का समर्थन मिला है। ऐसे में जिस तरह से चीन ने रूस का यूक्रेन के खिलाफ कार्रवाई का समर्थन किया है उसने पश्चिमी देशों के लिए अलग तरह की मुश्किल खड़ी कर दी है। जिस तरह से चीन के राष्ट्रपति ने शी जिनपिंग के बयान का समर्थन किया जिसमे पुतिन ने यूक्रेन को लेकर कहा था कि कभी भी वास्तविक राज्य की परंपरा नहीं थी। रूस ने यूक्रेन में सेना भेजने का ऐलान किया उसके बाद चीन का रुख अभी भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। एक तरफ जहां चीन सीमा पर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थन कर रहा है तो दूसरी तरफ व्लादिमीर पुतिन के रुख का भी समर्थन कर रहा है।

पश्चिमी देशों के प्रभाव को कम करने में जुटे
बीजिंग में विंटर ओलंपिक के दौरान शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन ने एक साझा बयान जारी किया था और यूरोप व एशिया पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका के प्रभाव को नकारात्मक करार दिया था। उन्होंने कहा था कि हम रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। यही नहीं दोनों ने यूक्रेन के नाटो का हिस्सा बनने के विचार का भी विरोध किया था। लंदन मे सोआस चाइना इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर प्रोफेसर स्टीव सैंग ने कहा कि अगर आप ताकतवर हैं तो आप लोगों के साथ गठबंधन कर सकते हैं। जबकि चीन की मीडिया ने कहा कि दो देश एक साथ कंधे से कंधा मिलकर दुनिया में न्याय को कामय कर रहे हैं।

रूस की मदद में पहले भी आगे आ चुका है चीन
सोमवार को यूएन की सिक्योरिटी काउंसिल की बैठक के दौरान चीन के प्रतिनिधि ने कहा कि सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि यूक्रेन और रूस को शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत करके समस्या का हल निकालना चाहिए। साथ ही चीन ने एक बार फिर से इस बात को दोहराया कि पश्चिम के बार-बार हस्तक्षेप और प्रभाव को खारिज किया। पश्चिमी देशों के रूस पर प्रतिबंध के बाद रूस का द्वीपक्षीय तेल कारोबार भी प्रभावित होगा। 2014 के प्रतिबंध के बाद चीन के स्टेट बैंक ने रूस को लोन मुहैया कराया था, जिससे कि पश्चिम के प्रतिबंध के प्रभाव को कम किया जा सके।

खुलकर चीन नहीं कर रहा रूस का विरोध
हालांकि इसके बाद भी चीन के रुख को लेकर विरोधाभास बना हुआ है कि वह रूस के साथ किस तरह के संबंध रखना चाहता है। 19 फरवरी को चीन के विदेश मंत्री वैंग यी ने मिन्स समझौते का हवाला दिया और युद्धविराम की बात की लेकिन इसके कुछ दिन बाद ही रूस ने यूक्रेन के दो क्षेत्र डोनेंस्क और लुंहास्क को अलग देश की मान्यता दे दी और इस समझौते को तोड़ दिया। अहम बात यह है कि चीन सीमाओं के बदलाव को नहीं मानता है, जबतक कि यह उसके व्यक्तिगत लाभ में ना हो। चीन ने 2014 में क्रीमिया को अलग देश के तौर पर मान्यता नहीं दी। लेकिन अब इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि चीन अपने रुख में बदलाव करेगा। पिछले महीने यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में चीन एकमात्र ऐसा देश था जिसने रूस का समर्थन किया।

चीन के लिए यह काफी अहम समय
दरअसल चीन खुद भी विस्तारवादी नीति का पालन करता आया है और साउथ चायना सी, तिबत, ताइवान और भारत को लेकर चीन का रुख दुनिया के सामने है। ऐसे में चीन इस समय यूक्रेन में चल रही उठापटक में चीन का अपरोक्ष रूप से साथ दे रहा है। ऐसे में यूक्रेन में तनाव की स्थिति में पश्चिमी देशों का इसी पर ध्यान रहेगा जिससे चीन को खुद के एजेंडे को इन क्षेत्रों में आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। अगर यूरोप में कोई बड़ा युद्ध होता है तो दुनिया का ध्यान उसी तरफ होगा चीन की ओर नहीं और दुनिया चीन की चुनौती से विमुख होगी।

रूस-चीन एक बड़ी ताकत
लेकिन पश्चिमी देश इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि जिस मुश्किल से उन्होंने सोवियत यूनियन का सामना किया था उसके बाद अगर चीन और रूस एक साथ आते हैं तो उनके सामने एक नई मुसीबत खड़ी हो सकती है। खुद नाटो के के जनरल सेक्रेटरी जेंस स्टॉलटेनबर्ग ने 15 फरवरी कहा था कि मूल रूप से हम जो देखते हैं वह यह है कि दो सत्तावादी शक्तियां, रूस और चीन, एक साथ काम कर रहे हैं। फिलहाल चीन के अंतरिम उद्देश्य की बात करें तो उसका मुख्य लक्ष्य फिर से ताइवान को अपने नियंत्रण में लेना है।

क्या चाहता है चीन
जिस तरह से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सामने दुनिया की ताकतें कमजोर नजर आ रही हैं और यूक्रेन पर हमले के बाद भी अमेरिका, फ्रांस, यूके जर्मनी जैसे बड़े देश कोई बड़ी कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं उससे स्पष्ट है कि दुनिया के सामने यह संदेश जा रहा है कि पश्चिमी देशों के लिए रूस सबसे बड़ी ताकत है। अहम बात यह है कि रूस की अर्थव्यवस्था चीन की तुलना 10 गुना छोटी है। लिहाजा जब रूस के सामने पश्चिमी देशों को इस चुनौती का सामना करना पड़ रहा है तो दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक के सामने यह लड़ाई और भी मुश्किल हो सकती है। ऐसे में अगर चीन इस समय रूस का साथ देता है तो निसंदेह ताइवान पर जब कभी चीन कार्रवाई करेगा तो रूस का उसे साथ मिलेगा।












Click it and Unblock the Notifications