US Election Spl: लाल, नीला, बैंगनी, अमेरिकी राज्यों को अलग अलग रंगों में क्यों बांटा गया? कैसे बंट रहा है समाज
US Presidential Election 2024: अमेरिका में 5 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव में मतदान होने वाले हैं और उससे पहले स्विंग स्टेट्स में इलेक्टोरेल कॉलेज के तहत इलेक्टर्स को चुनने के लिए वोटिंग शुरू हो चुकी है, जिसके आधार पर ही तय किया जाता है, कि देश का नया राष्ट्रपति कौन बनेगा।
मगर, अमेरिका के चुनाव में कई दिलचस्प चीजें होती हैं, जिन्हें जानना और समझना काफी मजेदार होता है, जैसे अमेरिका के राज्यों को अलग अलग रंगों में बांटा गया होता है। जैसे, रिपब्लिकन राज्य लाल हैं, जबकि डेमोक्रेटिक राज्य नीले हैं। वहीं, स्विंग राज्य, जो रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक में किसी के भी हिस्से में जा सकते हैं, उनका रंग बैंगनी हैं।

अमेरिकी राजनीति के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी रखने वाला हर व्यक्ति यह जानता है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है? आइये जानते हैं।
आखिर ऐसा क्यों किया गया था?
रंगों का ये फेर, डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार अल गोर और रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉर्ज डब्ल्यू बुश के बीच 2000 के राष्ट्रपति चुनाव से जुड़ा है।
बुश बनाम गोर का मुक़ाबला चुनाव की रात को तय नहीं हुआ था। बल्कि, नतीजों पर बहस कई हफ्तों तक जारी रही और सुप्रीम कोर्ट के सामने जाकर खत्म हुई।
यही वह समय था जब मीडिया, मतदाताओं तक यह पहुंचाने का एक सरल लेकिन प्रभावी तरीका खोज रहा था, कि क्या हो रहा है, और यहीं से नियमित रूप से राज्यों को 'लाल' और 'नीला' के रूप में वर्णित करना शुरू कर दिया।
लाल रंग रिपब्लिकन पार्टी का प्रतीक बना, जबकि नीला रंग डेमोक्रेटिक पार्टी का और उसके बाद से ही, रिपब्लिकन राज्यों को लाल रंग से दिखाया जाने लगा और डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से जीते गये राज्यों को नीले रंग से दिखाया जाने लगा।
स्मिथसोनियन मैगजीन ने न्यूयॉर्क टाइम्स के वरिष्ठ ग्राफ़िक्स एडिटर आर्ची त्से के हवाले से तर्क को इस प्रकार समझाया है, कि "मैंने बस यह तय किया कि लाल रंग 'R' (Red) से शुरू होता है और रिपब्लिकन 'R' से शुरू होता है। यह एक स्वाभाविक जुड़ाव था। इस बारे में ज्यादा चर्चा नहीं हुई।"
यूएसए टुडे के लिए काम करने वाले डेटाबेस संपादक पॉल ओवरबर्ग ने कहा, कि जब उनके आउटलेट ने यह फैसला लिया, तब तक यह चलन पहले से ही चल रहा था।
उन्होंने कहा, कि "मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उस समय हर कोई पहले से ही ऐसा कर रहा था।"
ओवरबर्ग ने यह भी तर्क दिया, कि ग्राफिक्स अच्छा दिखा और ये लोगों को आकर्षित कर सके, इसके लिए भी ऐसा किया गया था।
ओवरबर्ग ने पत्रिका को बताया, "अगर इसे उस वक्त पलट दिया जाता, तो नक्शा बहुत गहरा हो जाता।" जैसे "नीला रंग लाल रंग को ढक लेता। लाल रंग हल्का होता है।"
रिपब्लिकन पार्टी के लिए लाल रंग और डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए नीले रंग का प्रयोग सिर्फ 2000 के राष्ट्रपति चुनाव में ही किया गया था, लेकिन 2004 में जब अगला चुनाव आया, तब तक लोगों के दिमाग में लाल और नीले रंग का विभाजन पूरी तरह से बैठ चुका था।
Vocabulary.com के मुताबिक, फिर साल 2004 में अमेरिकन डायलेक्ट सोसाइटी ने "लाल/नीला/बैंगनी राज्य" को अपना वर्ड ऑफ द ईयर चुन लिया और ये लोगों के मन में बस गया।
आर्ची त्से ने कहा, कि "उस चुनाव के बाद रंग राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन गए।" त्से ने कहा, कि "आप इसे किसी और तरीके से नहीं कर सकते थे।"
इस बीच, स्विंग राज्य, जो लाल से नीले रंग में बदल जाते हैं, उन्हें मीडिया में'बैंगनी राज्य' के रूप में दिखाया जाने लगा।
राजनीतिक दलों के पास खुद कोई आधिकारिक रंग नहीं है।
जब टेलीविजन की बात आती है, तो कुछ लोग दिवंगत पत्रकार टिम रसर्ट को इसका क्रेडिट देते हैं।
द वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, वह रसर्ट ही थे जिन्होंने 2000 के चुनाव से एक सप्ताह पहले टीवी पर पहली बार 'लाल राज्य' और 'नीले राज्य' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।
प्राइमरी कलर्स
हालांकि ऐतिहासिक रूप से, नीला रंग डेमोक्रेट्स की तुलना में रिपब्लिकन के साथ ज्यादा जुड़ा हुआ है
गृहयुद्ध के दिनों की बात करें तो यूनियन आर्मी के सैनिक गहरे नीले रंग की वर्दी पहनते थे, जिससे उन्हें पहचानना आसान होता था, जबकि कॉन्फेडेरेट्स ग्रे रंग की वर्दी पहनते थे।
उस समय, रिपब्लिकन पार्टी के अब्राहम लिंकन देश के राष्ट्रपति हुआ करते थे।
और उनके समय में रिपब्लिकन पार्टी ने खुद को नीले रंग से जोड़ने की कोशिश की थी।
CNN के अनुसार, 1970 के दशक से डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों के अधिकांश लोगो नीले रंग के ही रहे हैं।
1984 में, चुनाव की रात रिपब्लिकन पार्टी के पास देश का जो नक्शा था, उसमें हर राज्य को नीले रंग में दिखाया गया था जो रोनाल्ड रीगन के पक्ष में था। ऐसा शायद इसलिए भी है, क्योंकि लाल रंग पारंपरिक रूप से साम्यवाद, वामपंथी और फासीवादी आंदोलनों से जुड़ा रहा है, जिन्हें आम तौर पर अमेरिका विरोधी माना जाता था।
आधुनिक युग की बात करें तो मीडिया में रंगों का इस्तेमाल कई बार अलग अलग भी रहा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, 1976 में एनबीसी ने डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जिमी कार्टर की तरफ से जीते गए राज्यों को लाल रंग में और रिपब्लिकन गेराल्ड फोर्ड की तरफ से जीते गए राज्यों को नीले रंग में दिखाया था, जिसे अगर आज की तारीख में देखा जाए, तो लोग कनफ्यूज हो जाएंगे।
एनपीआर के मुताबिक, एनबीसी ने ऐसा इसलिए किया था, क्योंकि यह कलर ब्रॉडकास्ट करने वाला पहला चैनल था, उससे पहले तक चैनल्स ब्लैक एंड व्हाइट ही प्रसारण करते थे।
हालांकि इसके और भी कारण हैं। जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में मीडिया और पब्लिक अफेयर्स के प्रोफेसर स्टीफन हेस ने द वॉशिंगटन पोस्ट को बताया, कि मीडिया द्वारा लाल और नीले रंग का इस्तेमाल आंशिक रूप से अमेरिकी झंडे से जुड़े होने के कारण किया जाता है। उन्होंने कहा कि ये रंग टीवी पर भी अच्छे लगते हैं।
क्या रंगों का ये चुनाव देश को विभाजित करते हैं?
कुछ लोगों का मानना है, कि राज्यों को 'लाल' और 'नीला' के रूप में नामित करना अमेरिका में पहले से मौजूद विभाजन को और बढ़ा रहा है।
सीएनएन के मुताबिक, न्यूयॉर्क के सेंट बोनवेंचर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र और अपराध विज्ञान के प्रोफेसर बेंजामिन ग्रॉस ने एक शोध पत्र में उल्लेख किया है, कि "पाठक अपने साथी अमेरिकियों के बारे में नकारात्मक सोच विकसित कर सकते हैं, जैसे 'लाल राज्य' ऐसे व्यवहार करते हैं और 'नीला राज्य' किसी दूसरे तरह का व्यवहार करते हैं।
बेंजामिन ग्रॉस, जिन्होंने 2003 से 2007 तक विभिन्न समाचार पत्रों में रंगों को लेकर बनते इस विचारधारा का अध्ययन किया है, उन्होंने कहा, कि "अखबारों में रंगों के इस्तेमाल को लेकर राजनीति नहीं थी, बल्कि वो ग्राफिक्स की जरूरतों के मुताबिक था, लेकिन अब हकीकत ये है, कि रंगों ने दोनों ही पार्टियों के समर्थकों को विभाजित कर दिया है।"
ग्रॉस ने सीएनएन की एक रिपोर्ट में कहा है, कि "विश्लेषण करने के लिए सोशल मीडिया पोस्टिंग बहुत ज्यादा नहीं थी (जब मेरा शोध 2013 में सामने आया था) लेकिन अगर मैं ट्विटर हैशटैग पर 'रेड स्टेट' और 'ब्लू स्टेट' को देखूं, तो मुझे यह देखकर डर लगेगा, कि मुझे वहां क्या मिल सकता है... मुझे लगता है कि 'रेड स्टेट, ब्लू स्टेट' वास्तव में बहुत नकारात्मक स्थान पर पहुंच गया है, जहां राजनेता और पत्रकार इसके बारे में अब रंगों से हटकर समाज के बारे में बात करने लगे हैं।"
फिर भी, एक्सपर्ट्स का मानना है, फिलहाल रंगों का ये फेर जल्द खत्म होने वाला नहीं है और ये आम अमेरिकियों की जीवनशैली में पहचान के तौर पर बस गया है, जिसे अगर हटाने की कोशिश शुरू की गई, तो लोगों के मन से हटने में इसे कई साल लग जाएंगे।












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