TPIVF: दो महिला और एक पुरुष मिलकर दे सकेंगे बच्चे को जन्म, तीन मां-बाप के गुण वाला होगा नवजात
दिल्ली, 7 मई। आज के समय में जब महिला प्रेग्नेंट होती है उसके बाद ज्यादातर कपल डॉक्टर की शरण में जाते हैं। गर्भ में पल रहे बच्चे की मेडिकल जांच लगातार होती रहती है। इसी में एक तरफ तो अंग सही से विकसित हो रहे हैं कि नहीं, उसकी जांच होती है तो दूसरी तरफ बच्चे में कोई जेनेटिक डिसऑर्डर या अनुवांशिक विकृति तो नहीं है, इसके लिए भी टेस्ट किए जाते हैं। नवजात में जेनेटिक डिसऑर्डर होने से वह कमजोर होता है और कई मामलों में जान भी नहीं बच पाती है। नवजात में आए ज्यादातर जेनेटिक डिसऑर्डर फिलहाल लाइलाज हैं। नवजात में जेनेटिक डिफेक्ट न आए, इसके लिए मेडिकल साइंस में रिसर्च चल रहे हैं। थ्री पैरेंट आईवीएफ एक ऐसा ही तरीका खोजा गया है जिसमें डिफेक्टिव माइटोकोंड्रिया वाली महिला, दूसरी महिला और पुरुष की मदद से स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है। इसको यूनाइटेड किंगडम और ऑस्ट्रेलिया ने कानूनी मान्यता दे दी है। आइए पहले जानते हैं कि आईवीएफ क्या है, इसके बाद थ्री पैरेंट आईवीएफ के बारे में विस्तार से जानेंगे।

जिनको मां बनने में परेशानी, उनके लिए वरदान है आईवीएफ
कई महिलाओं को मां बनने में परेशानी होती है। उन महिलाओं के लिए इन विट्रो फर्टिलाइजेशन या आईवीएफ वरदान की तरह है। नवजात में आने वाली जेनेटिक समस्या के निदान के लिए भी आईवीएफ तकनीक अपनाई जाती है। इसमें महिला के मैच्योर एग को निकालकर लैब में पुरुष के स्पर्म से फर्टिलाइज किया जाता है। इसके बाद जो भ्रूण बनता है उसको महिला के गर्भाशय में डाला जाता है। आईवीएफ की इस पूरी प्रक्रिया में तीन सप्ताह या इससे ज्यादा का समय लगता है। यह मेडिकल साइंस की एक जटिल प्रक्रिया है। आईवीएफ तकनीक के विकास से थ्री पैरेंट आईवीएफ की खोज मेडिकल साइंस में हुई है। इसके जरिए वो महिलाएं मां बन सकती हैं जिनके सेल का माइटोकॉन्ड्रिया डिफेक्टिव होता है।

डिफेक्टिव माइटोकॉन्ड्रिया से कमजोर होता है नवजात
माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका (सेल) का एनर्जी सेंटर माना जाता है। जिन महिलाओं में डिफेक्टिव माइटोकॉन्ड्रिया होता है उनके डीएनए के जरिए यह पेट में पल रहे बच्चे में भी चला जाता है। डिफेक्टिव माइटोकॉन्ड्रिया होने की वजह से बेबी का डेवलपमेंट ठीक से नहीं हो पाता है। जब माइटोकॉन्ड्रिया बेबी के सेल को एनर्जी नहीं दे पाता है तो नॉर्मल ग्रोथ नहीं होने की वजह से जेनेटिक डिसऑर्डर होता है। इसका परिणाम बहुत बुरा होता है। इससे नवजात गंभीर बीमारी और अपंगता का शिकार हो सकता है। बच्चे का माइटोकॉन्ड्रिया डिफेक्टिव होने से बचाने के लिए थ्री पैरेंट आईवीएफ में दो मां और एक पिता का उपयोग कर गर्भाधान कराया जाता है।

थ्री पैरेंट आईवीएफ क्या है?
थ्री पैरेंट आईवीएफ को माइकॉन्ड्रियल डोनेशन भी नाम दिया गया है। इस प्रक्रिया को आसानी से समझने के लिए यह जानिए कि किसी भी महिला के एग (अंडाणु) में न्यूक्लियस होता है जिसमें मां का ज्यादातर डीएनए होता है। जो महिला मां बनना चाहती है लेकिन जांच में उनके माइटोकॉन्ड्रिया में डिफेक्ट पाया जाता है, तो ऐसी महिला के एग से न्यूक्लियस लिया जाता है। फिर एक स्वस्थ महिला का डोनेट किया हुआ एग लिया जाता है जिसमें हेल्दी माइटोकॉन्ड्रिया है। इस दूसरी महिला के एग में मां बनने वाली महिला के एग का न्यूक्लियस डाला जाता है। फिर इस एग को पिता बनने वाले पुरुष के स्पर्म से फर्टिलाइज किया जाता है। बाकी प्रकिया आईवीएफ की ही तरह होती है। इससे जो भ्रूण बनता है उसमें तीन लोगों के जेनेटिक मैटेरियल होते हैं।

यूके और ऑस्ट्रेलिया ने किया इसको वैध
तीन लोगों के जेनेटिक मैटेरियल को मिक्स करने की थ्री पैरेंट आईवीएफ तकनीक को यूके और ऑस्ट्रेलिया में कानूनी मान्यता दे दी गई है। 30 मार्च को ऑस्ट्रेलिया की सीनेट ने इस पर एक बिल को पास किया जिसमें इस तकनीक के वैध उपयोग के लिए कुछ शर्तें भी जोड़ी गई हैं। यह कहा जा रहा है कि इस तकनीक का मकसद भ्रूण को बेहतर बनाना नहीं बल्कि भ्रूण में पैदा होने वाली अनुवांशिक बीमारियों का इलाज करना है। अभी यह तकनीक नई है इसलिए इसमें कितनी सफलता मिल पाती है, इसका कोई लंबा रिकॉर्ड नहीं है। इस तकनीक से पैदा हुए बच्चे की उम्र बढ़ने पर उनके हेल्थ पर क्या असर होगा, इस बारे में अभी कोई जानकारी नहीं है। लेकिन माइटोकॉन्ड्रियल डिफेक्ट वाले कपल के लिए यह तकनीक एक विकल्प बनकर आया है।
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