न्यूक्लियर ब्लंडर! 26000 फीट से चीनी परमाणु बम पर रखनी थी नजर, हिमालय में लापता हुआ US का खतरनाक डिवाइस, कैसे?
Defence News: आज से करीब 60 साल पहले जब पश्चिमी मोर्चे पर भारत-पाकिस्तान युद्ध चल रहा था, उस वक्त अमेरिका और भारत के जासूसों ने चीन के खिलाफ गुप्त मिशन को अंजाम देने के लिए हाई कैटोगिरी के पर्वतारोहियों की मदद ली थी।
इस मिशन के तहत चीनी कब्जे वाले तिब्बत पर बिना किसी परेशानी के नजर रखने के लिए एक प्रमुख पर्वत शिखर पर परमाणु ऊर्जा से चलने वाला निगरानी डिवाइस को लगाया जाना था और यहां से तिब्बती पठार के उत्तर में चीन के झिंजियांग प्रांत, जहां नमक के रेगिस्तान थे, और जहां चीन का परमाणु हथियार कार्यक्रम के लिए परीक्षण रेंज थी, उसपर नजर रखना था। उस वक्त वो अपने निर्माण के शुरूआती चरण में था।

अमेरिका का मकसद हिमालय के एक खास प्रहार पर डिवाइस की तैनाती करना था, ताक इस परीक्षण फील्ड पर नजकर रखी जा सके और अमेरिका ने अपने इस प्लान को साल 1965 में जमीन पर उतारा था।
अमेरिका का ये मिशन कैसा था?
इस मिशन को लेकर तानाबाना वाशिंगटन में एक कॉकटेल पार्टी के दौरान बुना गया था। जब तत्कालीन अमेरिकी वायुसेना प्रमुख कर्टिस लेमे को चीन की तरफ से किए जा रहे परमाणु परीक्षणों पर नजर रखने की जिम्मेदारी दी गई थी। लिहाजा, तय ये किया गया, कि हिमालय पर्वत पर उस स्पेशल डिवाइस को तैनात किया जाए, ताकि बीजिंग के इस नवजात परमाणु कार्यक्रम के बारे में जानकारी हासिल किया जा सके।
भारत, जिसने 1962 में चीन के साथ एक खूनी युद्ध लड़ा था, उसे इस मिशन के लाभों के बारे में ज्यादा समझाने की जरूरत नहीं थी।
इस मिशन के लिए एक विशिष्ट भारतीय पर्वतारोही मनमोहन "मोहन" सिंह कोहली को भर्ती किया गया था। कोहली को 1962 के युद्ध के दौरान उच्च ऊंचाई वाले युद्ध के लिए सलाहकार सहायता देने के लिए नियुक्त किया गया था। 14 अमेरिकी और चार भारतीय पर्वतारोहियों का एक समूह इकट्ठा किया गया था। जिन्हें हिमालय की चोटी पर पहुंचना और उस डिवाइस को वहां लगाना था।
अमेरिका में अपने शुरुआती प्रशिक्षण के दौरान, कोहली को एहसास हुआ कि सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) चाहती थी, कि डिवाइस को कम से कम 27,500 फीट की ऊंचाई पर रखा जाए। और अमेरिका चाहता था, कि दुनिया का तीसरे सबसे ऊंचा पर्वत, कंचनजंगा, पर उस डिवाइस को सेट किया जाए।
यह नेपाल और भारतीय राज्य सिक्किम के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित है। राज्य के निवासी इसे पवित्र मानते हैं। साथ ही, डिवाइस लेकर उस पहाड़ पर चढ़ना हास्यास्पद था, क्योंकि डिवाइस की वजन ज्यादा थी और पर्वतारोही उतना ज्यादा वजन लेकर पर्वत पर चढ़ाई नहीं कर पाते। इसके अलावा, दूसरी दिक्कत ये थी, कि अगर डिवाइस को लेकर पर्वत पर चढ़ भी गये, तो उसे वहां असेंबल करने में 2 घंटे से ज्यादा का वक्त लगता।
कोहली ने रॉ अधिकारी काओ को बताई आशंका
अमेरिका के इस प्लान के बारे में कोहली ने तत्कालीन भारतीय जासूस आर एन काओ को अपनी शंकाएं बताईं। जिसपर काओ ने उनसे विकल्प मांगे और कोहली ने सुझाव दिया, कि त्रिशूल, नंदा कोट और कामेट।
त्रिशूल पर चढ़ना सबसे आसान था। हालांकि, यह सीआईए के लिए पर्याप्त ऊंचा नहीं था।
नंदा कोट के विचार को भी खारिज कर दिया गया, क्योंकि यह बहुत कम था और कामेट को भी नहीं चुना गया क्योंकि यह लगभग सीमा पर था और चीनी हमले के लिए असुरक्षित था।
फिर एक समझौता हुआ और सीआईए, नंदा देवी पर डिवाइस को फिट करने की बात पर तैयार हुआ।
लेकन हिंदू पौराणिक कथाओं में नंदा देवी को काफी पवित्र स्थान माना जाता है। 25,645 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर, तिब्बत से आने वाली ठंडी हवाओं और उपजाऊ गंगा के मैदान के बीच एक प्राकृतिक बफर का काम करता है। इस लिहाज से, "यह निचले इलाकों के किसानों के लिए किसी उद्धारकर्ता से कम नहीं है।"
यह मध्य हिमालय में एक किले के समान है। 70 मील की एक अवरोधक रिंग परिधि बनाती है, जिसके चारों ओर एक दर्जन प्रमुख चोटियां हैं। रिंग के केंद्र में प्रवेश पश्चिम से एक एकल, खड़ी घाटी तक सीमित है।
न्यूक्लियर मॉनिटरिंग डिवाइस कैसा था?
इस डिवाइस के सेंसर में चार मुख्य घटक थे, जो सभी तारों और केबलों से जुड़े हुए थे। दो टुकड़े धातु के बक्से थे जो उन्हें बर्फ और बर्बबारी से दूर रखते थे। इनमें ट्रांसीवर थे, जिन्हें B1 और B2 लेबल किया गया था, जो एकत्रित मिसाइल की जानकारी को भारत में कहीं बेस स्टेशन तक पहुंचाते थे।
तीसरा कंपोनेंट एंटीना था, जो चीनी मिसाइलों से टेलीमेट्री डेटा हासिल करता था। छह फुट लंबा एंटीना कई घरों में पाए जाने वाले मानक टेलीविजन एरियल जैसा दिखता था।
चौथे कंपोनेंट को SNAP 19C (परमाणु सहायक ऊर्जा के लिए सिस्टम का संक्षिप्त नाम) कहा जाता था। यह एक थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर था, जो दो साल तक चालीस वाट एनर्जी का लगातार उत्पादन करने में सक्षम था। यह ग्रेफाइट का एक षट्कोणीय ब्लॉक था, और सात छोटी छड़ें, जिन्हें ईंधन कैप्सूल भी कहा जाता है, ब्लॉक के चारों ओर छेद से कसा गया था।
सात कैप्सूल में कुल मिलाकर 1,734 ग्राम प्लूटोनियम था, मुख्य रूप से Pu-238 आइसोटोप। ब्लॉक को एक छोटे, बेलनाकार एल्यूमीनियम कंटेनर में रखा गया था। गर्मी को ज्यादा प्रभावी ढंग से फैलाने के लिए इसके चारों ओर पैंतालीस एल्यूमीनियम पंख लगाए गए थे। फिर SNAP को एक ही पोस्ट पर रखा गया, जिससे मशरूम का "स्टेम" बना।

मिशन कैसे हो गया फेल?
नंदा देवी के कैंप-IV में खराब मौसम के कारण पर्वतारोहण दल को सावधानीपूर्वक प्लान किए गये इस मिशन में बाधा आई। जिसके बाद टीम ने डिवाइस को सुरक्षित रूप से एक एक पर्वत के गुफा को चुना और मिशन को खत्म करने का फैसला किया, और तय किया गया, कि अगले साल, यानि 1966 में मिशन को फिर से स्टार्ट किया जाएगा।
बक्सों को नायलॉन की रस्सी से लपेटा गया और पिटोन और कैरबिनर का उपयोग करके सुरक्षित किया गया और जनरेटर को काफी सुरक्षित तरीके से गुफा में रख दिया गया।
लेकिन, अगले साल जब टीम वहां गई तो उन्हें उस स्थान पर सिर्फ कुछ तार ही मिले।
सैटेलाइट फोन के जरिए नई दिल्ली को परमाणु जनरेटर के गायब होने की खबर भेजी गई और यह खबर बम की तरह फट गई। भारतीय खुफिया और सीआईए अधिकारियों के बीच एक आपातकालीन सत्र आयोजित किया गया। लेकिन, डिवाइस का कोई पता नहीं लगा।
इस डिवाइस की उम्र 100 वर्ष है और अभी भी इसका पता नहीं लगाया जा सका है। 2018 में एक इंटरव्यू में, कोहली ने कहा, कि "इस उपकरण की आयु लगभग 100 वर्ष है, और अभी भी लगभग 40 वर्ष इसकी उम्र बाकी है। यदि यह ऋषि गंगा में चला जाता है, तो पानी बहुत दूषित हो सकता है, और फिर भारी संख्या में लोग इससे प्रभावित होंगे। यहां तक कि लोगों की मौत भी हो सकती है।
लेकिन अगर यह मुख्य गंगा में चला जाता है, तो इसका प्रभाव काफी कम हो जाएगा, और सिर्फ कुछ लोगों को परेशानी हो सकती है, लेकिन इससे मृत्यु नहीं होगी। उन्होंने कहा, कि "मेरे अनुमान के मुताबिक, यह उपकरण बहुत गर्म है, और एक बार जब यह ग्लेशियर को छूता है, तो यह तब तक डूबना शुरू कर देगा, जब तक कि यह चट्टान को न छू ले। फिर यह हिल नहीं पाएगा।"
इसके बाद CIA ने इसी तरह के एक मिशन को 1967 में भी लांच किया और उपकरण को स्थापित भी कर दिया गया, लेकिन एक साल के बाद इस डिवाइस से भी संपर्क टूट गया।












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