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श्रीलंका में तमिलों की दशकों पुरानी मांग पर आज बनेगी सहमति? भारत दौरे से पहले राष्ट्रपति का बड़ा बयान

Sri Lnakna President India Visit: श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे इस हफ्ते भारत की हली आधिकारिक यात्रा पर नई दिल्ली आ रहे हैं और अपनी भारत यात्रा से पहले, श्रीलंका के राष्ट्रपति ने तमिलों के सालों पुराने, सबसे बड़े मुद्दे पर बात करने की बात कही है।

श्रीलंका में रहने वाले अल्पसंख्यक तमिल, सालों से राजनीतिक स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं और उस मांग को निपटाने के लिए आज श्रीलंकन संसद में तमिल नेशनल अलायंस (टीएनए) के साथ बातचीत की जाएगी। आपको बता दें, कि टीएनए उन पार्टियों का गठबंधन है, जो उत्तर और पूर्वी क्षेत्रों के तमिलों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

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तमिलों के मुद्दे पर बात करेगा श्रीलंका

सूत्रों ने बताया, कि टीएनए-विक्रमसिंघे की बातचीत आज दोपहर संसद में होगी। विदेश कार्यालय के अधिकारियों ने बताया, कि विक्रमसिंघे 20 जुलाई को नई दिल्ली के लिए रवाना होंगे और 21 जुलाई को भारतीय राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे।

दिसंबर से, विक्रमसिंघे ने राजनीतिक स्वायत्तता की लंबे समय से चली आ रही तमिल अल्पसंख्यक मांग को निपटाने के लिए टीएनए के साथ बातचीत शुरू की थी।

विक्रमसिंघे ने भारत समर्थित 13वें संशोधन को पूर्ण रूप से लागू करने का विचार रखा था, जिसका इतिहास के खुद को दोहराने के मामले में शक्तिशाली बौद्ध पुजारियों द्वारा विरोध किया गया था। आपको बता दें, कि 13A श्रीलंका में तमिल समुदाय को सत्ता के हस्तांतरण का प्रावधान करता है। भारत 13ए को लागू करने के लिए श्रीलंका पर दबाव बना रहा है, जिसे 1987 के भारत-श्रीलंका समझौते के बाद लाया गया था।

तमिल पक्ष ने सैन्य उद्देश्यों के लिए रखी गई तमिलों की निजी भूमि को छोड़ने, तमिल राजनीतिक कैदियों की रिहाई और संघर्ष के दौरान हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति जैसे चिंता के तत्काल मुद्दों को हल करने पर जोर दे रहे हैं।

हालांकि, कुछ ज़मीनें मुक्त कर दी गईं हैं और कुछ कैदी भी रिहा कर दिए गए हैं, लेकिन तमिल पक्ष काफी हद तक असंतुष्ट रहा हैं। कुछ पूर्व उग्रवादी तमिल पार्टियां, जो टीएनए का हिस्सा नहीं हैं, उन्होंने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर 13वें संशोधन को पूर्ण रूप से लागू करने के लिए विक्रमसिंघे पर दबाव डालने का आग्रह किया है।

इस समूह में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) के पुनर्वासित पूर्व सदस्य की डेमोक्रेटिक फाइटर्स पार्टी भी शामिल है, जिसने एक अलग तमिल राज्य बनाने के लिए तीन दशक पुराना अलगाववादी युद्ध चलाया था।

उनकी मांग है, कि तमिल क्षेत्रों में जमीन और पुलिस को लेकर जो शक्तियां केन्द्र सरकार के पास हैं, उसे वापस प्रांतीय परिषद को दी जाए और 2018 के बाद स्थगित चुनावों को फिर से करवाया जाए।

इस बीच, मत्स्य पालन राज्य मंत्री पियाल निशांत ने कहा, कि नई दिल्ली यात्रा के दौरान भारतीय मछुआरों द्वारा श्रीलंकाई जलक्षेत्र में अवैध मछली पकड़ने के जटिल मुद्दे पर चर्चा की जाएगी।

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श्रीलंका में तमिलों का लंबा संघर्ष

श्रीलंका का तमिलों के साथ नाकाम बातचीत का एक लंबा इतिहास रहा है।

1987 में भारत की तरफ से श्रीलंका सरकार और तमिलों के बीच मध्यस्थता करवाने की नाकाम कोशिष भी की गई थी, हालांकि इसके जरिए तमिल-बहुल श्रीलंका के उत्तर और पूर्वी क्षेत्र के लिए एक संयुक्त प्रांतीय परिषद की प्रणाली बनाई थी, जो बाद में लड़खड़ा गई। तमिल अल्पसंख्यक समुदाय ने दावा किया, कि इस परिषद के पास पूर्ण स्वायत्तता नहीं है।

श्रीलंका में तमिलों के लिए एक अलग देश बनाने की मांग को लेकर LTTE ने करीब 30 सालों तक हिंसक आंदोलन चलाया था, लेकिन साल 2009 में श्रीलंका की सेना LTTE के सर्वोच्च नेता वेलुपिल्लई प्रभाकरण की हत्या कर दी और उसके बाद हिंसक आंदोलन खत्म हो गया। इसी हिंसक संघर्ष में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जान तक जा चुकी है।

श्रीलंकाई सरकार के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर और पूर्व में लंकाई तमिलों के साथ तीन दशक के क्रूर युद्ध सहित विभिन्न संघर्षों के कारण 20,000 से ज्यादा लोग लापता हैं। वहीं, श्रीलंका में चले तमिल संघर्ष में कम से कम 1 लाख लोग मारे गये हैं।

वहीं, अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का कहना है, कि कम से कम 40 हजार जातीय तमिल नागरिकों की हत्या की गई, जिसे श्रीलंका की सरकार नकारती रही है। लेकिन, इसको लेकर श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे हमेशा से आलोचना के केन्द्र में रहे हैं।

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