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श्रीलंका के महाबोधि वृक्ष को जहरीली गैस से खतरा, चीनी पावर प्लांट एसिड से संकट में दुनिया का सबसे पुराना पेड़

भगवान बुद्ध को ईसा पूर्व 531 में बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर में स्थित एक पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसे बोधि वृक्ष कहा जाता है। इसी की एक शाखा श्रीलंका में भी है।

Oldest Living Tree Maha Bodhi At Risk

दुनिया का सबसे पुराना जीवित पेड़ कहा जाने वाला महाबोधि पर जहरीली गैस का खतरा मंडराने लगा है। चीन की फंडिंग वाले नोरोचचोलाई कोल पावर प्लांट से निकलने वाला जहरीला धुआं इस वृक्ष के अस्तित्व के लिए खतरनाक बनता जा रहा है।

इलाके में सर्वे करने के बाद इकोलॉजिस्ट ने बताया कि पावर प्लांट से निकलने वाले जहरीला धुआं अनुराधापुरा की तरफ बढ़ सकते हैं, जहां महाबोधि पेड़ स्थित है। इस वृक्ष के बारे में कहा जाता है कि इसे भारत के गया में स्थित बोधि वृक्ष की एक शाखा से उगाया गया है।

कोलंबो गजट की रिपोर्ट के मुताबिक बिजली संयंत्र से निकलने वाले उत्सर्जन के कारण आसपास के क्षेत्र में मौजूद पेड़ों की पत्तियां पीले रंग की हो गई हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि जहरीले उत्सर्जन का श्री महाबोधि वृक्ष पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक नोरोचचोलाई प्लांट श्रीलंका का सबसे बड़ा थर्मल पावर प्लांट है। 900MW के इस प्लांट से तय मानक से ज्यादा इमिशन दर्ज किया गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि श्रीलंका में जरूरी ईंधन की कमी के कारण प्लांट में अक्सर ब्रेकडाउन की दिक्कत रहती है।

प्लांट से निकलने वाले अवशेष फ्लाई ऐश और बॉटम ऐश को एक खुले गड्ढे में स्टोर किया जाता है। ये पावर प्लांट से निकलने वाले बाय-प्रोडक्ट्स हैं। खुले गड्ढों में रखे जाने के चलते ये हवा के साथ आसपास के इलाकों में पहुंच जाते हैं, जिससे कई बच्चों में स्किन संबंधी बीमारियां हो चुकी हैं।

श्रीलंका के उत्तर पश्चिमी प्रांत में स्थित बिजली संयंत्र, अनुराधापुरा में पवित्र श्री महाबोधि वृक्ष से लगभग एक घंटे की दूरी पर है। बौद्ध धर्म मानने वाले लोगों के लिए ये वृक्ष विशेष सम्मान रखता है। श्रीलंका में यह स्थान महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व रखता है। इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

ऐसी किवदंती है कि गौतम बुद्ध ने भारत के बोधगया में स्थित जिस पवित्र बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर ज्ञान प्राप्त किया था, उसकी एक शाखा को सम्राट अशोक की पुत्री राजकुमारी संघमित्रा 288 ईसा पूर्व यहां लेकर आई थीं। इस वृक्ष को अनुराधापुरा में रोपा गया था।

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