भारत की नाराजगी दूर करने के लिए श्रीलंका की पहल, एक महीने के अंदर पेश की नई पोर्ट डील

कोलंबो। पिछले महीने भारत को झटका देकर चीन को तरजीह देने और भारत की नाराजगी को महसूस करने के बाद अब श्रीलंका क्षेत्र में संतुलन बनाने की कोशिश में लग गया है। श्रीलंका अब भारत और जापान को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पोर्ट देने की पेशकश करेगा। श्रीलंका सरकार के एक अधिकारी ने इसकी जानकारी दी है।

पिछले महीने रद्द कर दी थी डील

पिछले महीने रद्द कर दी थी डील

श्रीलंका ने पिछले महीने कोलंबो के पास स्थित महत्वपूर्ण बंदरगाह पर भारत और जापान के साथ मिलकर निर्माण होने वाले ईस्ट कंटेनर सेंटर के समझौते से अपने हाथ पीछे खीच लिए थे। ये ट्रांसशिपमेंट भारत के नजदीक होने के चलते इसका सामरिक महत्व भी बहुत है। इस कंटेनर को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत बनाया जाना था जिसमें 51 प्रतिशत हिस्सेदारी श्रीलंका की होनी थी जबकि 49 प्रतिशत हिस्सा भारत और जापान का होना था।

इस फैसले को पलटते हुए श्रीलंका ने कहा था कि इस पोर्ट की पूरी हिस्सेदारी श्रीलंका के पास होगी। लगभग एक महीने बाद अब श्रीलंका ने उसकी जगह वेस्ट कंटेनर टर्मिनल बनाने का प्रस्ताव भारत और जापान को दिया है। इसे चीन द्वारा निर्मित 50 करोड़ डॉलर के कोलंबो इंटरनेशनल कंटेनर टर्मिनल (सीआईसीटी) के दूसरी तरफ बनाया जाना है।

श्रीलंका सरकार के प्रवक्ता कहेलिया रामबुकवेला ने पत्रकारों को बताया कि "वेस्ट कंटेनर टर्मिनल को विकसित करने पर चर्चा केवल भारत और जापान के साथ ही चल रही है।"

चीन के बराबर ही हिस्सेदारी देने का प्रस्ताव

चीन के बराबर ही हिस्सेदारी देने का प्रस्ताव

रामबुकवेला ने कहा कि श्रीलंका की कैबिनेट ने सोमवार को निर्णय लिया है कि वेस्ट कंटेनर टर्मिनल की 85 प्रतिशत हिस्सेदारी भारत और जापान को देने की अनुमति दी जाएगी। श्रीलंका ने चीन को भी सीआईसीटी के निर्माण के लिए भी 85 प्रतिशत की हिस्सेदारी देने की शर्त रखी थी। हालांकि यह अभी साफ नहीं है कि 85 प्रतिशत में भारत और जापान किस तरह से बंटवारा करेंगे।

श्रीलंका की सरकार के मुताबिक कोलंबो स्थित भारतीय उच्चायोग ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है जबकि सरकार के एक प्रवक्ता ने बताया है कि इस प्रस्ताव पर अभी जापान की प्रतिक्रिया आनी बाकी है।

श्रीलंका की सरकार ने पिछले महीने ईस्ट कंटेनर टर्मिनल का करार रद्द करने के पीछे ट्रेड यूनियनों की मांग को बताया था। श्रीलंका में ट्रेड यूनियन पोर्ट पर विदेशी निवेश का विरोध कर रही हैं। विरोध को देखते हुए श्रीलंका सरकार ने अब ईस्ट कंटेनर को श्रीलंका पोर्ट अथॉरिटी से विकसित कराने का फैसला लिया है। इसका महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि हिंदा महासागर में स्थित यह टर्मिनल मलेशिया और सिंगापुर के बीच एक बड़ा केंद्र है और इससे होकर इस इलाके का 70 फीसदी व्यापार होता है।

चीन के कर्ज में फंसा है श्रीलंका

चीन के कर्ज में फंसा है श्रीलंका

श्रीलंका ने सीआईसीटी को बनाने के लिए चीन के साथ करार किया था जिस पर 2013 में काम शुरू हुआ। इसके बाद से श्रीलंका ने किसी को भी अनुमति देने से इनकार करता रहा लेकिन 2017 में चीन का कर्ज न लौटा पाने के चलते उसे दो चीनी शिपिंग कंपनियों को दक्षिणी हंबनटोटा पोर्ट को 99 साल की लीज पर देने के लिए मजबूर होना पड़ा। लेकिन इस घटना ने श्रीलंका में बीजिंग की कर्ज देकर फंसाने की चाल को लेकर चिंता शुरू हो गई। इसके साथ ही भारत और अमेरिका ने इस बात पर भी चिंता जताई कि हंबनटोटा में चीन अगर कदम जमाता है तो उसे हिंद महासागर में बढ़त हासिल होगी। हालांकि श्रीलंका ने कहा है कि वह किसी को अपने क्षेत्र का सैन्य इस्तेमाल नहीं करने देगा।

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