दक्षिण अफ्रीका चुनाव में 30 सालों बाद कांग्रेस को झटका, बहुमत से क्यों पीछे रह गई नेल्सन मंडेला की पार्टी?
South Africa Election Result: दक्षिण अफ्रीका की सत्तारूढ़ अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस पार्टी (ANC), देश में 1994 में पहली बार हुए चुनाव के बाद ये पहली बार होगा, जब बहुमत का आंकड़ा हासिल करने से काफी दूर रह जाएगी, जो रंगभेद खत्म होने के बाद देश में सबसे बड़ा राजनीतिक बदलाव होगा।
अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस पार्टी, महान अश्वेत नेता नेल्सन मंडेला की पार्टी है और पहली बार ऐसा हुआ है, जब कांग्रेस 50 प्रतिशत जनता का समर्थन हासिल करने से दूर रह गई है।

दक्षिणी अफ्रीका के स्थानीय समय के मुताबिक, शाम 5 बजकर 10 मिनट तक 90 प्रतिशत वोटों की गिनती की जा चुकी थी, जिसमें ANC को 41.04% मत प्राप्त हुए हैं। जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी, मध्यमार्गी डेमोक्रेटिक अलायंस (DA) को 21.72% वोट मिले हैं।
दक्षिण अफ्रीका निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, तीसरे नंबर पर पूर्व राष्ट्रपति जैकब जूमा की नेतृत्व वाली नवगठित यूमखोंटो वेसिज़वे पार्टी (MK) है, जिसे 13.69% वोट मिले हैं और वामपंथी आर्थिक स्वतंत्रता सेनानी (EFF) को 9.46% वोट मिले हैं।
सबसे दिलचस्प बात ये है, कि जैकब जूमा यूमखोंटो वेसिज़वे पार्टी (MK) और वामपंथी आर्थिक स्वतंत्रता सेनानी (EFF), पहले अफ्रीकी कांग्रेस का ही हिस्सा थी, लेकिन इस चुनाव से पहले पूर्व राष्ट्रपति जैकब जुमा और मौजूदा राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा के बीच झगड़े तेज हो गये और जैकब जुमा ने अपनी पार्टी बना ली और कांग्रेस के बहुमत से दूर रहने की सबसे बड़ी वजह यही मानी जा रही है।
आपको बता दें, दक्षिण अफ्रीका चुनाव में जिस पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उस हिसाब से संसद में सीटों का बंटवारा होता है।
अफ्रीकी नेशनल असेंबली में 400 सीटें हैं और वोट प्रतिशत के हिसाब से जब एक बार नेशनल असेंबली के सदस्य चुन लिए जाते हैं, उसके बाद वो राष्ट्रपति को चुनने के लिए वोट डालते हैं, इसका मतलब ये है, कि जिस पार्टी के सबसे ज्यादा सदस्य होते हैं, उस पार्टी के नेता राष्ट्रपति बनते हैं।

नेल्सन मंडेला की पार्टी से क्यों टूटा लोगों का दिल?
पार्टी में टूट के अलावा अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस भ्रष्टाचार, भारी घोटालों में घिरने के साथ साथ देश को आर्थिक कुप्रबंधन में धकेलने के लिए भी विरोध का सामना कर रही है। सालों से तंग आ चुकी जनता ने इसीलिए नेल्सन मंडेला की पार्टी को चुनावों में करारा झटका दिया।
लिहाजा, अब अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस ने दक्षिण अफ्रीका में गठबंधन सरकार बनाने का फैसला किया है। लेकिन, दक्षिण अफ्रीका, जहां सबसे असमान हालात रहते हैं, वहां गठबंधन सरकार चलाना कतई आसान नहीं होगा।
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति और अफ्रीकी नेशनल कांग्रेंस के अध्यक्ष सिरिल रामफोसा - और कभी नेल्शन मंडेला के पसंदीदा थे, उन्होंने 2018 में भ्रष्टाचार के आरोपों में बदनाम पूर्व राष्ट्रपति जैकब जुमा से पदभार ग्रहण करते समय दक्षिण अफ्रीका में "नई सुबह" लाने का वादा किया था।
लेकिन कई लोगों को लगता है, कि वे वादे कभी पूरे नहीं हुए और चुनाव परिणाम देश की निराशा को दर्शाता है। दक्षिण अफ्रीका के लोग अब आने वाले कई हफ्तों तक राजनीतिक अनिश्चितता का सामना कर सकते हैं, क्योंकि अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस को अपने उन पार्टियों से ही गठबंधन करना होगा, जो कभी उसी का हिस्सा थीं। यानि, सिरिल रामफोसा को, जिन्होंने जैकब जुमा को पार्टी से निकलवाया था, अब उन्हीं की मदद से सरकार का गठबंधन करना होगा।
हालांकि, चुनाव से पहले ही माना जा रहा था, कि अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के प्रति भारी असंतोष है, लेकिन हार के पैमाने ने कुछ लोगों को चौंका दिया है।
सीएनएन से बात करते हुए कांग्रेस के पूर्व सांसद मेलानी वर्वर्ड ने कहा, कि "हमने जो देखा है, वह यह है, कि मतदाता ANC के हाल के इतिहास से नाखुश हैं। विशेष रूप से जुमा के कार्यकाल में जो हुआ और उसके बाद जो हुआ, उससे जनता में काफी नाराजगी है।"
वर्वर्ड ने कहा, "कांग्रेस के नेताओं में भारी अहंकार आ गया और उनके शब्दों में जनता का अपमान दिखने लगा था, उन्होंने जनता से जुड़ना बंद कर दिया, जिसका नुकसान हुआ है और MK और EFF जैसी पार्टियों ने उस असंतोष का फायदा उठाया है।"
एक्सपर्ट्स का मानना है, कि भले ही इस बार कांग्रेस गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब हो जाए, लेकिन जनता में इस चुनाव से एक संदेश चला गया है, कि कांग्रेस को हराया जा सकता है और ज्यादा उम्मीद है, कि अगले चुनाव में कांग्रेस पूरी तरह से सत्ता से बाहर हो जाए।
जैकब जुमा-सिरिल रामफोसा विवाद
जैकब जुमा 2018 तक दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति थे और उन्हें 2018 में भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद इस्तीफा देना पड़ा था और 2021 में उन्हें अदालत की अवमानना के लिए कुछ समय जेल में भी रहना पड़ा। जैकब जुमा और सिरिल रामफोसा एक दूसरे के कट्टर आलोचक हैं।
दक्षिण अफ्रीका के संवैधानिक न्यायालय ने 82 साल के जैकब जूमा को इस बार संसदीय चुनाव लड़ने से रोक दिया था, लेकिन उनका चेहरा एमके पार्टी के मतपत्र पर बना रहा और चुनावी नतीजे में वो वोट पाने में तीसरे नंबर पर है और बिना उसकी मदद के अब सरकार नहीं बन सकती है।

सरकार बनाने के लिए सौदेबाजी!
माना जा रहा है, कि अंतिम परिणाम घोषित होने के बाद महत्वपूर्ण सौदेबाजी शुरू होने की संभावना है। देश के राष्ट्रपति का चुनाव करने के लिए, नई संसद के गठन से पहले राजनीतिक दलों के पास गठबंधन सरकार बनाने के लिए दो हफ्ते का समय होगा। और यदि इन दो हफ्तों में राजनीतिक पार्टियां गठबंधन करने में असमर्थ रहते हैं, तो फिर देश में नये चुनाव कराने की आवश्यकता होगी।
डीए नेता जॉन स्टीनहुइसन ने चुनाव के राष्ट्रीय परिणाम केंद्र में एक साक्षात्कार के दौरान सीएनएन से कहा, कि "मुझे रामफोसा और उनकी पार्टी से कोई सहानुभूति नहीं है।"
उन्होंने कहा, कि "जैकब जुमा के भ्रष्टाचार से निपटने में रामफोसा रीढविहीन साबित हुए और दक्षिण अफ्रीका में कमीशन का खेल शुरू हो गया, जो उनका सबसे बड़ा पाप है और इसीलिए वो अभी तक सबसे बड़ी राजनीतितक शक्ति थे, लेकिन क्वाज़ुलु-नताल और देश के अन्य हिस्सों ने उनके पापों की उन्हें सजा दी है।"
आपको बता दें, कि क्वाज़ुलु-नताल, दक्षिण अफ्रीका की आबादी वाला तटीय पूर्वी प्रांत है, जहां प्रमुख शहर डरबन स्थित है और ये पारंपरिक रूप से रूढ़िवादी इंकाथा फ्रीडम पार्टी (IFP) का गढ़ रहा है।
जूमा पर पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और घोटालों के सैकड़ों आरोप लगे हैं। उन्होंने हमेशा इन सभी आरोपों से इनकार किया है और उन्हें "टेफ्लॉन राष्ट्रपति" के रूप में जाना जाता है क्योंकि बहुत कम राजनेता उन घोटालों से बच पाए हैं, जिनका उन्होंने सामना किया है और जिन्हें झेला है।
CNN ने कुछ राजनीतिक विश्लेषकों से बातचीत के आधार पर संभावना जताई है, कि सबसे संभावित गठबंधन ANC और DA के बीच हो है।
1994 में लोकतंत्र की शुरुआत के बाद से दक्षिण अफ्रीका का राजनीतिक परिदृश्य इतना अस्पष्ट कभी वनहीं रहा है, लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है - अनिश्चितता के बावजूद - कि इस चुनाव के परिणाम लोकतंत्र के लिए जीत हो सकते हैं।

क्या पीछे जा रहा है दक्षिण अफ्रीका?
अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस ने 1994 में "सभी के लिए बेहतर जीवन बनाने" के वादे पर सत्ता हासिल की थी और देश के पहले लोकतांत्रिक चुनाव में उसे लगभग 63% वोट मिले थे। लेकिन तीन दशक बाद, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, बढ़ती बेरोजगारी, बिजली कटौती और कमजोर आर्थिक विकास ने दक्षिण अफ्रीका के लोगों को बुरी तरह से प्रभावित किया है।
पिछले एक दशक में अर्थव्यवस्था पीछे की ओर चली गई है, जिसका सबूत जीवन स्तर में तेज गिरावट है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण अफ्रीका की प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 2011 के टॉप से गिर गया है, और दक्षिण अफ्रीका में गरीबी 23 प्रतिशत और बढ़ गई है।
विश्व बैंक के मुताबिक, दक्षिण अफ्रीका में दुनिया में सबसे ज्यादा बेरोजगारी दर है। असमानता भी दुनिया में सबसे खराब है।
81% आबादी वाले अश्वेत दक्षिण अफ्रीकी इस भयावह स्थिति के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। बेरोजगारी और गरीबी अभी भी अश्वेत बहुसंख्यकों में केंद्रित है, जिसका एक बड़ा कारण सार्वजनिक स्कूली शिक्षा की नाकामी है, जबकि अधिकांश श्वेत दक्षिण अफ्रीकी लोगों के पास नौकरी है और उन्हें काफी ज्यादा वेतन मिलता है।












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