चीन में सऊदी अरब-ईरान के बीच हाईलेवल मीटिंग, मध्य-पूर्व में आज से नई वैश्विक व्यवस्था की शुरूआत?
ईरान और सऊदी के बीच डिप्लोमेटिक संबंध 2016 में उस वक्त खत्म हो गये थे, जब सऊदी ने शिया धर्मगुरु, निम्र अल-निम्र को फांसी दे दी थी। फिर, ईरान में स्थिति सऊदी मिशन पर हमला किया गया था।

Saudi Arabia-Iran Meeting In Beijing: एक तरफ सऊदी अरब के विदेश मंत्री, दूसरी तरफ ईरान के विदेश मंत्री और बीच में चीन के विदेश मंत्री। पहले तीनों मीडिया कैमरों के सामने फोटो खिंचवाते हैं और फिर चीन के विदेश मंत्री के एक हाथ में ईरान के विदेश मंत्री हाथ रखते हैं, दूसरे हाथ में सऊदी अरब के विदेश मंत्री रखते हैं और फिर तीनों देश के विदेश मंत्रियों के हाथ मिल जाते हैं।
सऊदी अरब के विदेश मंत्री के चेहरे पर थोड़ी सी हिचकिचाहट दिखाई देती है, लेकिन फिर वो भी अपना दूसरा हाथ, ईरान के विदेश मंत्री के हाथ में रख देते हैं। 6 हाथों के बीच की ये जुगलबंदी नये वैश्विक व्यवस्था बनने की शुरूआत के तौर पर देखी जा रही है और ये तस्वीर इस बात के संकेत हैं, कि मध्यपूर्व से अमेरिका की विदाई के रास्ते खुल गये हैं और चीन एक नये सुपरपावर की तरह खाड़ी देशों में आ गया है।
सात सालों में पहली मुलाकात
बीजिंग में चीनी विदेश मंत्री की मौजूदगी में सऊदी अरब और ईरान के विदेश मंत्रियों की ये मुलाकात, सात सालों के बाद हुई है। सऊदी अरब के सरकारी ब्रॉडकास्टर अल एखबारिया ने गुरुवार को ट्विटर पर बैठक का संक्षिप्त फुटेज जारी किया है, जिसमें सऊदी अरब के विदेश मंत्री राजकुमार फैसल बिन फरहान और उनके ईरानी समकक्ष, होसैन अमीर-अब्दुल्लाहियान को एक पारंपरिक चीनी पेंटिंग के सामने हाथ मिलाते और मुस्कुराते हुए दिखाया गया है। वीडियो में आगे दिखता है, कि मुलाकात के बाद दोनों मीटिंग रूम में चले गये, जहां दोनों नेताओं के बीच गपशप होने लगी।
ईरान और सऊदी अरब मार्च में संबंधों को बहाल करने और दो महीने के भीतर राजनयिक मिशनों को फिर से खोलने के लिए सहमत हुए थे, और इसके साथ ही एक साल की लंबी दरार के बाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम हो गया है, जो पिछले साल यमन से सीरिया तक संघर्ष में काफी गहरा गया था।

एएफपी समाचार एजेंसी ने ईरान की इस्लामिक रिपब्लिक न्यूज एजेंसी का हवाला देते हुए बताया है, कि दोनों विदेश मंत्रियों ने अपने दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों को फिर से खोलने की दिशा में कदमों पर चर्चा की है।
चीन ने दोनों पक्षों को एक साथ लाने में मदद की है और इस ऐतिहासिक समझौते का दरवाजा खोला है।
सालों से तनावपूर्ण चल रहे थे संबंध
दोनों देशों के बीच के संबंध वैसे तो हमेशा से ही अच्छे नहीं रहे हैं, लेकिन साल 2016 में उस वक्त कड़वाहट काफी बढ़ गई थी, जब सऊदी अरब ने शिया मुस्लिम धर्मगुरु निम्र अल-निम्र को फांसी दे दी थी। इसके बाद ईरान में भारी प्रदर्शन किए गये थे और प्रदर्शनकारियों ने ईरान में स्थिति सऊदी अरब के राजनियक मिशनों पर भी हमला कर दिया था, जिसके बाद सऊदी ने ईरान के साथ अपने औपचारिक संबंध खत्म कर लिए थे।
सऊदी अरब और ईरान को फारस की खाड़ी अलग करता है और दोनों देश, दशकों से लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा और सांप्रदायिक तनाव की वजह से विभाजित रहे हैं। इन दोनों ही देशों के बीच क्षेत्रीय प्रभुत्व के लिए भी गहरी प्रतिस्पर्धा रही है। लेकिन, इस बार चीन ने आश्चर्यजनक भूमिका निभाते हुए, दोनों देशों को करीब ला खड़ा किया है।
चीन की इस कोशिश ने निश्चित तौर पर मध्य पूर्व में एक नई भू-राजनीति का गठन किया है, और ऐसा पहली बार हुआ है, जब अमेरिका की शक्ति को मध्य पूर्व में काफी कमजोर माना जा रहा है और चीन अब मध्य पूर्व में अमेरिका की जगह एक नई ताकत के तौर पर देखा जा रहा है। लिहाजा, यह वाशिंगटन और बीजिंग के बीच प्रतिस्पर्धा में एक नए अध्याय के जुड़ने का भी संकेत देता है।

संवेदनशील मुद्दों पर भी बनती सहमति
ईरान और सऊदी अरब, कई संवेदनशील मुद्दों को लेकर आमने सामने रहे हैं, लेकिन इस बार संवेदनशील मुद्दों को भी सुलझाने की कोशिश की गई है, जिसमें यमन में हौथी विद्रोहियों के लिए ईरानी समर्थन भी शामिल है, जो अकसर सऊदी अरब पर रॉकेट हमला करते रहे हैं। लिहाजा, सऊदी अरब ने सीरिया के साथ राजनयिक संबंधों को बहाल करने के लिए एक समझौते को भी पास कर लिया है, जो पिछले एक दशक के गृहयुद्ध के दौरान ईरान के खेमे में शामिल था। यानि, अब सऊदी अरब को हूती विद्रोहियों से डर नहीं रहा है और ये समझौता, रूस के माध्यम से हुआ है, जो सीरिया की सरकार के काफी करीब है।
अमेरिका ने जताई निराशा
सऊदी अरब-ईरान संबंध की पुनर्वहाली और खाड़ी देशों में चीन-रूस के बढ़ते प्रभाव ने अमेरिका को चिंतित कर दिया है और पिछले हफ्ते अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के डायरेक्टर विलियम बर्न्स ने अचानक सऊदी अरब का दौरा भी किया। वाल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सीआईए डायरेक्टकर विलियम बर्न्स ने इस दौरान सऊदी अरब के अधिकारियों से कहा, कि सऊदी अरब ने जिस तरह से ईरान और सीरिया के साथ संबंध जोड़े हैं, सऊदी अरब के इस अप्रोच ने अमेरिका को 'अंधेपन' के हालात में ला खड़ा किया है। इसके अलावा उन्होंने खाड़ी देशों में अमेरिका के हितों को लेकर भी बात की है। जो यह दर्शाता है, कि खाड़ी देशों में बदलने राजनीतिक परिदृश्य ने अमेरिका को किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया है।
साल के अंत तक दिखेगा परिणाम
सऊदी अरब और ईरान के विदेश मंत्रियों की ये मुलाकात बीजिंग में हुई है और वाल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि इस साल के अंत में मध्य पूर्व की राजनीति उस वक्त पूरी तरह से बदल जाएगी, जब बीजिंग में सऊदी अरब और ईरान के राष्ट्राध्यक्ष, शी जिनपिंग के साथ एक शिखर सम्मेलन में शिरकत करेंगे। शी जिनपिंग ने इस बैठक का प्रस्ताव दिया है।
वहीं, ईरानी राज्य द्वारा संचालित समाचार एजेंसी IRNA ने कहा है, कि तेहरान ने सात वर्षों में पहली बार संयुक्त अरब अमीरात में एक राजदूत नियुक्त किया है। मामले से परिचित अधिकारियों का कहना है, कि अन्य उच्च स्तरीय वार्ताओं पर भी काम चल रहा है।
वहीं, मामले से परिचित लोगों ने ये भी कहा, कि ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी ने सऊदी अरब का दौरा करने के लिए सऊदी राज परिवार का निमंत्रण भी स्वीकार कर लिया है। हालांकि, फिलहाल यात्रा की कोई तारीख घोषित नहीं की गई है।

सऊदी से संबंध, ईरान को कई फायदे
सऊदी अरब से संबंध सुधरना, ईरान के लिए काफी फायदेमंद माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका ने उसपर गंभीर आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं, जिससे ईरान की करेंसी, डॉलर के मुकाबले लगातार लुढ़कती जा रही है। वहीं, सऊदी से संबंध ने ईरान के उस अंतरराष्ट्रीय अलगाव को भी कम कर दिया है, जिसका सामना पिछले साल सितंबर के बाद से सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बाद से हुआ है।
रियाद के साथ ईरान का मेल-मिलाप, तेहरान को मध्य पूर्व में अमेरिकी प्रभाव को कम करने, वाशिंगटन के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक को अपने पाले में करने, और चीन को इस क्षेत्र में अधिक सक्रिय राजनयिक भूमिका में लाने के अपने दीर्घकालिक लक्ष्य के साथ मदद करता है।
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अमेरिका के ईरान के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं, जबकि चीन के सऊदी अरब और ईरान, दोनों के साथ घनिष्ठ राजनयिक संबंध हैं। ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार चीन ही है और सऊदी अरब से सबसे ज्यादा तेल चीन ही खरीदता है, लिहाजा सऊदी और ईरान के बीच मध्यस्थता करवाने के लिए सबसे फिट चीन था और चीन के लिए इस समझौते का मतलब मध्य पूर्व में अपने वर्चस्व का विस्तार है।
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