ना नोटबंदी और ना नोटबदली, अरबों भारतीय रुपए इकट्ठे कर क्यों परेशान हैं व्लादिमीर पुतिन?
यूक्रेन युद्ध से पहले भारत को तेल बेचने के मामले में रूस दसवें नंबर पर था, लेकिन अब रूस भारत को तेल बेचने के मामले में पहले नंबर पर है। भारतीय रुपये में रूस भारत को तेल बेच रहा है।

Russia-India Tie: यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत रूसी तेल के शीर्ष खरीदारों में से एक के रूप में उभरा है। भारत के रूस के साथ संबंध ऐतिहासिक रहे हैं और रूस ने भारत को भारी डिस्कॉउंट पर तेल बेचने का ऑफर दिया था।
रूस के ऑफर को भारत ने दोनों हाथों से लपका और 15 महीने पहले जो रूस भारत को तेल बेचने के मामले में 10वें नंबर पर था, वो अब पहले नंबर पर आ चुका है।
लेकिन, यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस को अमेरिकी डॉलर-वर्चस्व वाली वैश्विक भुगतान प्रणालियों से बाहर निकाल दिया, जिसके बाद रूस के लिए अमेरिकी डॉलर में ट्रांजेक्शन करना बंद हो गया, लिहाजा भारत और रूस, दोनों देश राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार का एक बड़ा हिस्सा तय कर रहे हैं।
हालांकि यह हर किसी के लिए फायदे की स्थिति जैसा लगता है, फिर भी रूस के लिए ये एक बड़ी समस्या है। रूस नहीं जानता है, कि वो इस व्यापार का लाभ कैसे उठाए।
147 अरब डॉलर के भारतीय करेंसी
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है, कि मॉस्को के पास अभी भारत से व्यापार के कारण हर महीने एक अरब डॉलर के भारतीय रुपये जमा हो रहे हैं, जो मुख्य तौर पर एकतरफा व्यापारिक संबंधों की वजह से हो रहे हैं।
दोनों देशों के बीच के व्यापारिक असंतुलन की वजह से हर तिमाही में 2 से 3 अरब डॉलर की भारतीय करेंसी रूस के पास जमा हो रहा है, लेकिन रूस इन रुपयों का कोई इस्तेमाल नहीं कर सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है, रूस के पास अब 147 अरब डॉलर के भारतीय रुपये का पहाड़ जमा हो गया है, लेकिन वो भारतीय रुपयों को कहां खर्च करे, उसे समझ नहीं आ रहा है।
रूस के पास कितना भारतीय रुपया अटका पड़ा है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, कि रूस ने 2022 में रक्षा पर 5.51 खरब रूबल यानि 68 अरब डॉलर खर्च किए।
विकल्प तलाशने में हो रहे हैं फेल
भारत और रूस के अधिकारियों ने इस समस्या का समधान करने की कोशिश कई बार की है, लेकिन हर विकल्प असफल साबित हुए हैं। कई एक्सपर्ट्स का कहना है, कि सबसे अच्छा तरीका यही है, कि रूस के संस्थान भारत में भारतीय रुपयों में निवेश करना शुरू करें या अलग अलग भुगतान तंत्र की स्थापना करें।
हालांकि, ये समाधान अभी संभव नहीं है, क्योंकि रूस पूरी किश्त का उपयोग नहीं कर सकता है क्योंकि भारत में विदेशी निवेशकों द्वारा पूंजी प्रवाह पर प्रतिबंध है।
दूसरा विकल्प, किसी तीसरे देश की मुद्राओं जैसे चीन के युआन या संयुक्त अरब अमीरात के दिरहम का उपयोग करना है। हालांकि इस तरह के समाधान पर सहमति की संभावना बेहद कम है।
ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स में रूस के अर्थशास्त्री अलेक्जेंडर इसाकोव ने कहा, कि "भारत के साथ रूस का व्यापार तेजी से असंतुलित हो रहा है। रूस को भारत का निर्यात, अपने बढ़ते आयात के साथ नहीं पकड़ पा रहा है, लेकिन रूस में अपने चालू खाते के अधिशेष को रुपये में बचाने की भी एक सीमा है।"
उन्होंने कहा, कि "रूस के लिए भारत की ताकत का कोई वैकल्पिक तेल आयातक नहीं हैं, इसलिए निर्यातक और बैंक, धीरे-धीरे रुपये में निपटान स्वीकार करेंगे।"
वहीं, कई रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि चीन अब धीरे धीरे रूसी तेल खरीदना कम कर रहा है, जिससे रूस परेशान है और उसके पास भारत के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है।
क्या भारत तेल आयात बढ़ाएगा?
भले ही भारत अपने तेल आयात में वृद्धि करना चाहता हो, मास्को ने तेल की कीमतों पर छूट को कम करके उस भावना को मजबूत करने का कोई काम नहीं किया है।
मिंट की एक रिपोर्ट में हाल ही में दावा किया गया है, कि चीनी मांग और तेल उत्पादकों के अंत में कटौती के कारण नई दिल्ली को वित्तीय वर्ष 2023 के दौरान भारी छूट मिली है।
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वित्तीय वर्ष 2023 के दौरान, यूक्रेन संघर्ष के बीच छूट प्रदान करके, रूस पहली बार भारतीय रिफाइनरों को तेल का एक महत्वपूर्ण प्रदाता बन गया। परिणामस्वरूप, पिछले वित्त वर्ष के फरवरी तक के 11 महीनों में, भारत ने अपने रणनीतिक साझेदार से 27 अरब डॉलर मूल्य के कच्चे तेल का आयात किया है, वहीं अब रूस, भारत को सबसे ज्यादा तेल बेचने के मामले में पहले नंबर पर आ गया है।
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