नेपाल की सियासत में हिंदुत्व की आहट! सीमा पार बढ़ रहे एकल विद्यालय, RSS-HSS पर क्यों टिकी नजर?
भारत के साथ खुली सीमा साझा करने वाला नेपाल (Nepal) अब एक नए राजनीतिक दौर से गुजर रहा है। पड़ोसी देश में अब हिंदुत्व की राजनीति तेजी से जड़ें जमा रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से प्रेरित हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS) के नेतृत्व में एकल विद्यालयों (Ekal Vidyalaya) और पशुपति शिक्षा मंदिरों (Pashupati Shiksha Mandir) के जरिए हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को मजबूती मिल रही है।
BBC की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल के बीरगंज जैसे इलाकों में एकल विद्यालय 1992 से चल रहे हैं। इन विद्यालयों में ज्यादातर दलित समुदाय के बच्चे पढ़ते हैं। यहां केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि हिंदुत्व के विचारों को भी बढ़ावा दिया जाता है।

नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने जैसे मुद्दों पर संकल्प
इन स्कूलों में बच्चों को गोहत्या रोकने, धर्मांतरण के खिलाफ जागरूकता और नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने जैसे मुद्दों पर संकल्प दिलाया जाता है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, बीरगंज के सोनरनिया गांव में सुरेश पासवान के घर चलने वाले एकल विद्यालय के प्रमुख सोहनलाल प्रसाद साह खुलकर कहते हैं कि ये विद्यालय आरएसएस से जुड़े हैं। साह ने खुद गोरखपुर में आरएसएस की 21 दिनों की ट्रेनिंग वर्कशॉप में हिस्सा लिया था।
एचएसएस (HSS) और आरएसएस (RSS) का संबंध
हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS) नेपाल सहित अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में सक्रिय है। हालांकि, आरएसएस और एचएसएस अपनी वेबसाइटों पर आपसी संबंधों का जिक्र नहीं करते, लेकिन दोनों के बीच गहरा जुड़ाव स्पष्ट है। नेपाल में एचएसएस के 1048 एकल विद्यालय और 35 पशुपति शिक्षा मंदिर चल रहे हैं।
बीरगंज के पशुपति शिक्षा मंदिर में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में आरएसएस की शाखाओं जैसा माहौल, गणवेश और प्रार्थनाएं देखने को मिलती हैं। यहां तक कि स्कूलों में आरएसएस के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार और पूर्व सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर की तस्वीरें प्रमुखता से लगी हैं।
नेपाल में हिंदुत्व के नेतृत्व और प्रशिक्षण
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में हिंदुत्व के अभियान में रवित कुमार और वेद प्रकाश जैसे लोग सक्रिय हैं, जो आरएसएस से प्रशिक्षित हैं। स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण नागपुर में आरएसएस के मुख्यालय में भी होता है। एचएसएस के राष्ट्रीय संघचालक कल्याण कुमार तिम्सिना, जो पूर्व पुलिस अधिकारी हैं, हिंदुत्व को बढ़ावा देने की बात स्वीकार करते हैं, लेकिन आरएसएस से संबंधों पर स्पष्ट जवाब देने से बचते हैं।
नेपाल में हिंदुत्व की राजनीति का इतिहास
नेपाल में हिंदुत्व की राजनीति का इतिहास पुराना है। आधुनिक नेपाल के निर्माता पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल को 'असली हिंदुस्थान' माना था। 19वीं सदी में मराठी ब्राह्मणों के प्रभाव और 1925 में आरएसएस के गठन के साथ नेपाल में हिंदुत्व के विचारों को बल मिला। 1960 के दशक में राजा महेंद्र के शासनकाल में आरएसएस के साथ निकटता बढ़ी, और 2008 में राजशाही खत्म होने के बाद भी हिंदुत्व की राजनीति ने जोर पकड़ा। 2014 में भारत में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल में हिंदुत्व को और प्रोत्साहन मिला।
विरोध और चिंताएं
नेपाल में हिंदुत्व की बढ़ती सक्रियता को लेकर कई लोग चिंतित भी हैं। पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली और सांसद अमरेश सिंह जैसे लोग मानते हैं कि हिंदुत्व की राजनीति नेपाल की संप्रभुता के लिए खतरा बन सकती है। मधेस में सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं, जैसे हनुमान जयंती और रामनवमी के दौरान हुई झड़पें, इस चिंता को और गहरा रही हैं। नेपाली कांग्रेस की सांसद जावेदा खातून का कहना है कि भारत की राजनीति का असर नेपाल में धार्मिक सौहार्द को प्रभावित कर रहा है।
नेपाल में हिंदुत्व की राजनीति का उभार
नेपाल में हिंदुत्व की राजनीति का उभार, एचएसएस और आरएसएस की सक्रियता के साथ, एक जटिल सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को दर्शाता है। एकल विद्यालयों और पशुपति शिक्षा मंदिरों के जरिए हिंदुत्व के विचारों का प्रसार हो रहा है, लेकिन यह नेपाल की संप्रभुता और सामाजिक सौहार्द पर सवाल भी उठा रहा है। जहां हिंदुत्व समर्थक इसे जन जागरण का दौर मानते हैं, वहीं कई लोग इसे देश की विविधता और एकता के लिए चुनौती के रूप में देखते हैं।












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