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मिस्र में राष्ट्रपति चुनाव आज से शुरू, क्यों PM मोदी के दोस्त अल-सीसी का जीतना तय माना जा रहा है?

मिस्त्र में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान रविवार से शुरू हो गया। यह चुनाव तीन दिनों तक चलेगा। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी लगातार तीसरी बार ये चुनाव लड़ रहे हैं। देश की ढहती अर्थव्यवस्था के बावजूद ऐसा माना जा रहा है कि अल-सीसी ही अगली बार फिर से राष्ट्रपति बनेंगे।

दरअसल मौजूदा राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी के सामने कोई भी कद्दावर प्रतिद्विंदी उम्मीदवार नहीं होने से उनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। अल-सीसी पहली बार 2014 में राष्ट्रपति बने थे।

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अपने इस्लामी पूर्ववर्ती, मोहम्मद मुर्सी को सेना द्वारा उखाड़ फेंकने के एक साल बाद राष्ट्रपति बने अल-सीसी ने देश में विशाल बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर भारी रकम खर्च किया। देश में सड़कों का विस्तार किया गया और फ्लाईओवर बनाए गए हैं।

अल-सीसी ने काहिरा के पास अरबों डॉलर की लागत से एक नई राजधानी का निर्माण भी किया है। हालांकि राष्ट्रपति के इस फैसले का खूब विरोध भी हुआ है। विरोधियों का कहना है कि इस "वित्तीय नासमझी" की वजह से देश के अधिकांश आर्थिक संसाधन खत्म हो गए देश की अर्थव्यवस्था पंगु बन गई और मिस्र अभूतपूर्व कर्ज में डूब गया है।

हालांकि राष्ट्रपति अल-सीसी के समर्थकों का मानना है कि राष्ट्रपति की परियोजनाओं से देश में विकास के अवसर बढ़ेंगे। उनका मानना है कि आने वाले समय में लोगों का जीवन आसान बनेगा और इससे आवश्यक विदेशी निवेश को आकर्षित करने में मदद मिलेगी, जिससे अंततः अधिक समृद्ध समय की शुरुआत होगी।

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक अर्थशास्त्री और इजिप्टियन सोसाइटी फॉर पॉलिटिकल इकोनॉमी, स्टैटिस्टिक्स एंड लेजिस्लेशन के सदस्य वालिद गबल्लाह का मानना है कि राष्ट्रपति की इन परियोजनाओं ने नौकरियां पैदा की हैं और मिस्र की बेरोजगारी की समस्या को दूर करने में महत्वपूर्ण प्रभाव डालने में सफल रहे हैं।

उनका यह भी मानना है कि मौजूदा आर्थिक मंदी के लिए कुछ हद तक दोष वैश्विक ताकतों का है। वह कहते हैं, "सरकार के सुधार कार्यक्रमों से हुई सारी बचत कोरोना वायरस महामारी ने खा ली। फिर यूक्रेन युद्ध आया, जिसके कारण कई विदेशी निवेशकों को मिस्र के बैंकों से अपना पैसा निकालने के लिए मजबूर होना पड़ा।"

गाजा में इजराइल-हमास युद्ध के कारण इस चुनाव को लेकर कोई खासा उत्साह नहीं देखा जा रहा है। इसका एक कारण यह भी है कि इन दिनों मिस्रवासियों का ध्यान अपने देश की पूर्वी सीमाओं पर चल रहे संघर्ष पर है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 10.5 करोड़ आबादी वाले इस देश में लगभग एक तिहाई लोग गरीब हैं।

अल-सिसी के खिलाफ तीन उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें विपक्षी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रमुख फरीद जहरान, वफद पार्टी के अध्यक्ष अब्देल-सनद यामामा और रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी के प्रमुख हेजेम उमर हैं।

चुनावी प्रक्रिया आयोजित करने वाले न्यायिक-अध्यक्षता वाली संस्था, राष्ट्रीय चुनाव प्राधिकरण के अनुसार, मतदान रविवार से शुरू होकर तीन दिन तक होंगे, यदि कोई भी उम्मीदवार 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल नहीं कर पाता है तो आठ से 10 जनवरी तक फिर से मतदान होंगे।

मिस्र के प्रवासियों ने एक से तीन दिसंबर को मतदान किया था। मतदान प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए देशभर में हजारों सैनिकों को तैनात किया गया है। इस चुनाव में छह करोड़ से अधिक लोग मतदान करने के पात्र हैं और अधिकारियों को उम्मीद है कि इस बार भारी संख्या में मतदान होगा।

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