PM Modi Russia Visit: 8 जुलाई को रूस के दौरे पर जाएंगे प्रधानमंत्री मोदी, अमेरिका को संदेश दे रहा भारत?

PM Modi to visit Moscow on July 8: लगातार तीसरी बार भारकत के प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी 8 जुलाई को मॉस्को की एक दिवसीय यात्रा पर जाएंगे, जिसमें भारत और रूस के बीच संबंधों को नया आकार देने की उम्मीद की जा रही है।

फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी का ये पहला रूस का दौरा होगा और ये दौरा उस वक्त हो रहा है, जब अमेरिका के साथ खालिस्तान विवाद के बाद दोनों देशों के बीच के संबंध में थोड़ी खटास आई है। भारत और रूस, ऐतिहासिक साझेदार रहे हैं और तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में नई साझेदारी की तलाश कर रहे हैं।

PM Modi Russia Visit

रूस के दौरे पर जाएंगे प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह न सिर्फ यह एक स्वतंत्र यात्रा है, बल्कि उनकी ये यात्रा अक्टूबर महीने में रूसी शहर कजान में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन से पहले हो रही है, बल्कि ये यात्रा उस वक्त हो रही है, जब व्लादिमीर पुतिन पांचवी बार रूस के राष्ट्रपति बने हैं और उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को मॉस्को आने का निमंत्रण दिया था।

प्रधानमंत्री मोदी की रूस की यात्रा की ये रिपोर्ट द ट्रिब्यून ने दी है और ये दौरा इसलिए भी खास है, क्योंकि भारत और रूस के बीच होने वाले सालाना शिखर सम्मेलन में भी दोनों नेताओं ने पिछले दो सालों से भाग नहीं लिया है।

प्रधानमंत्री मोदी आखिरी बार साल 2015 में मॉस्को गये थे, जबकि उन्होंने आखिरी रूस का दौरा साल 2019 में किया था, जब उन्होंने व्लादिवोस्तोक की यात्रा की थी और इसके बाद से दोनों देशों के बीच के संबंध में ना सिर्फ काफी कुछ बदलाव आया है, बल्कि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से माना जा रहा है, कि रूस काफी हद तक चीन के खेमे में चला गया है। हालांकि, रूस ने बार बार कहा है, कि भारत के साथ उसके संबंध ऐतिहासिक हैं और उसमें कोई बदलाव नहीं आया है।

हालांकि, इस दौरान यूक्रेन युद्ध ने दोनों देशों के बीच के कारोबारी रिश्ते को भी बदल दिया है और अब रूस, भारत को सबसे ज्यादा कच्चा तेल बेचने वाला देश बन गया है। अमेरिका और यूरोपीय देशों से रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत के खिलाफ लगातार आवाजें उठती रही हैं, लेकिन भारत ने हमेशा कहा है, कि उसके लिए देश हित सबसे ऊपर है।

रूस से सबसे ज्यादा तेल खरीदता है भारत

भारत ने रूस पर लगे अमेरिका-यूरोपीय प्रतिबंधों की कोई परवाह नहीं की है और कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म केप्लर के मुताबिक, भारत को तेल की बिक्री हर महीने बढ़ी है। इस साल मार्च में डिलीवर की गई मात्रा फरवरी के मुकाबले 6 प्रतिशत बढ़कर 1.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन हो गई है, जो चार महीने का उच्चतम स्तर है।

पता चला कि अप्रैल महीना और भी बेहतर रहा और भारत ने रूस के सरकारी स्वामित्व वाले तेल शिपिंग सिंडिकेट सोवकॉमफ्लोट के खिलाफ पश्चिमी प्रतिबंधों को नजरअंदाज करते हुए प्रति दिन 1.96 मिलियन बैरल खरीदे, जो पिछले साल जुलाई के बाद से सबसे ज्यादा है। रूस से आयातित कच्चे तेल ने भारत में आयात किए गए सभी कच्चे तेल का 40 प्रतिशत पार कर लिया है।

सबसे दिलचस्प बात ये है, कि रूस से खरीदे गये कच्चे तेल को भारत बड़ी मात्रा को रिफाइन करता है और इसे यूरोप को बेचता है, जबकि यूक्रेन पर आक्रमण के बाद से यूरोपीय रिफाइनरियों को सीधे रूसी तेल खरीदने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

रूसी हथियार पर निर्भरता कम कर रहा भारत

ऐतिहासिक तौर पर भारत की रूसी हथियारों पर काफी ज्यादा निर्भरता रही है और भारत करीब 65 प्रतिशत हथियार और दूसरे उपकरणों का आयात रूस से करता था, लेकिन मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में रूसी हथियारों पर भारत की निर्भरता को काफी कम कर दिया है।

हालांकि, अभी भी भारत के लिए रूसी हथियारों पर अपनी निर्भरता पूरी तरह से खत्म करना संभव नहीं है, क्योंकि एक तो रूसी हथियार काफी सस्ते होते हैं और दूसरी बात ये, कि पश्चिमी देशों के हथियार कई शर्तों के साथ आते हैं। लेकिन, पिछले कुछ सालों में भारत ने अमेरिका, इजराइल, जर्मनी और फ्रांसीसी हथियारों की तरफ रूख किया है।

क्या अमेरिका को संदेश देना है मकसद?

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, कि भारत पिछले दो वर्षों से रूस के साथ अपने संबंधों को लेकर बहुत ही सावधानी बरत रहा है और भारत को इस बात का पूरा अहसास है, कि अमेरिका इस बात पर करीब से नजर रख रहा है, कि यह रिश्ता किस तरह आगे बढ़ता है।

भारत ने यूक्रेन पर रूस के आक्रमण की आलोचना करने से इनकार कर दिया है, केवल सामान्य शब्दों में कहा है कि सभी आक्रमण और सभी युद्ध बुरे हैं, और हाल ही में स्विट्जरलैंड में शिखर सम्मेलन के अंत में जारी यूक्रेन समर्थक रिलीज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया है।

इस बीच, रूस और चीन के बीच संबंध भी मजबूत हो रहे हैं और यह एक ऐसा तथ्य है, जो नई दिल्ली की चौकस नजर से कभी नहीं बचता। पर्यवेक्षकों का कहना है, कि जुलाई की शुरुआत में जब पुतिन क्रेमलिन में पीएम मोदी का स्वागत करेंगे, तो दिल्ली के रणनीतिक हित हावी रहेंगे।

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