'108' की सनातन शक्ति से Thalapathy का 'Vijay' तिलक, MK Stalin की नफरत से ही ढहा DMK का 60 साल पुराना किला
Thalapathy Vijay Tamil Nadu New CM: तमिलनाडु की राजनीति में 4 मई 2026 को जो हुआ, उसे सिर्फ चुनावी गणित नहीं, बल्कि भावनाओं और प्रतीकों का ज्वार कहा जा सकता है। थलापति जोसेफ विजय चंद्रशेखर की तमिलगा वेट्ट्री कझगम (टीवीके) ने महज दो साल की उम्र में 108 सीटें जीत लीं। डीएमके 59 पर सिमट गई, एआईएडीएमके 47 पर। कोई पार्टी बहुमत (118) के करीब नहीं पहुंची, लेकिन टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। एमजीआर को अपनी पार्टी बनाने के बाद पांच साल इंतजार करना पड़ा था, लेकिन विजय ने पार्टी बनाने के महज दो साल बाद सत्ता के द्वार पर दस्तक दे दी।
यह '108' सिर्फ एक संख्या नहीं। सनातन परंपरा में 108 का गहरा आध्यात्मिक महत्व है- जपमाला के 108 मनके, शरीर के 108 ऊर्जा केंद्र, 108 सूर्य नमस्कार। टीवीके की ठीक 108 सीटों ने राजनीतिक विश्लेषकों और समर्थकों दोनों में इस प्रतीकात्मक जीत की चर्चा छेड़ दी। वहीं, एमके स्टालिन की डीएमके लंबे समय से 'नास्तिक' और 'सनातन विरोधी' छवि से जूझ रही थी। क्या यही नफरत डीएमके के किले को ढहाने वाली सबसे बड़ी वजह बनी? आइए समझते हैं...

द्रविड़ राजनीति का 60 साल पुराना एकाधिकार टूटा
1967 से DMK-AIADMK का द्वंद्व तमिलनाडु की राजनीति का केंद्र रहा। पेरियार की विरासत, तमिल स्वाभिमान, ब्राह्मणवाद विरोध और तर्कवाद - यही धुरी रही। लेकिन एमजीआर, जयललिता और करुणानिधि के जाने के बाद यह राजनीति थकान का शिकार हो गई। युवा मतदाता रोजगार, विकास और नई सोच चाहता था। पुराने नारे और चेहरे अब आकर्षित नहीं कर रहे थे।

डीएमके पर 'सनातन विरोधी' होने का आरोप लंबे समय से लगा। 2023 में उदयनिधि स्टालिन के बयान ने इसे चरम पर पहुंचा दिया। उन्होंने सनातन धर्म की तुलना डेंगू-मलेरिया से करते हुए 'उन्मूलन' की बात कही। विपक्ष ने इसे हिंदू-विरोधी बताया। सरकार की तरफ से न माफी, न कार्रवाई। अय्यर-अय्यंगर समुदाय, मंदिर भक्त और सनातन परंपरा में आस्था रखने वाले बड़े तबके को यह आहत किया। ये मतदाता BJP को वोट नहीं दे सकते थे (तमिल पहचान की वजह से), लेकिन बदलाव जरूर चाहते थे। विजय उनके लिए स्वीकार्य मजबूत विकल्प बन गए।

ईसाई पृष्ठभूमि वाला विजय: मंदिरों की यात्रा और बहु-धर्मीय अपील
विजय का जन्म ईसाई परिवार में हुआ (पिता चंद्रशेखर, मां शोभा)। लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा में धार्मिक समावेश की तस्वीर साफ दिखी। चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कई प्रमुख धार्मिक स्थलों पर दर्शन किए:
- तिरुचेंदूर मुरुगन मंदिर (अप्रैल 2026): चुनाव नतीजों से एक दिन पहले 'सत्रु संहारा यज्ञम' कराया और भगवान मुरुगन को वेल (भाला) अर्पित किया।
- शिरडी साईं बाबा मंदिर (अप्रैल 2026): तिरुचेंदूर के तुरंत बाद शिरडी पहुंचे और प्रार्थना की।
- चेन्नई के कोराट्टूर साईं बाबा मंदिर: कई बार गुप्त रूप से दर्शन किए (मां की इच्छा पूरी करने के लिए मंदिर बनवाया)।
- चर्च और दरगाह की योजनाएं भी बनीं (वेलांकन्नी चर्च और नागोर दरगाह), हालांकि आखिरी समय में कुछ रद्द हुए।
यह पैटर्न साफ संदेश देता है कि विजय ने तमिल गर्व और सनातन आस्था दोनों को सम्मान दिया। मुस्लिम विधायकों का हिंदी में संवाद और उनकी ऑल-इंडिया पहचान ने टीवीके को सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा वाला चेहरा बना दिया।
108 की शक्ति: प्रतीक या संयोग?
सनातन परंपरा में 108 को पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। टीवीके की ठीक 108 सीटें इस प्रतीकात्मक जीत को और मजबूत करती हैं। समर्थक इसे 'धार्मिक शक्ति' का संकेत बता रहे हैं। वहीं आलोचक इसे संयोग कहते हैं। लेकिन तथ्य यह है कि DMK की 'सनातन नफरत' वाली छवि ने एक बड़ा वोट बैंक अलग किया, जिसे विजय ने भर दिया। ईसाई मतदाताओं ने भी 'C. Joseph Vijay' में 'अपने बीच का' नेता देखा।
नया तमिलनाडु: द्रविड़ अस्मिता रीलोड
तमिलनाडु की जनता ने साफ संदेश दिया कि हम द्रविड़ अस्मिता नहीं छोड़ेंगे, लेकिन उसे नई सदी की जरूरतों (रोजगार, शिक्षा, विकास) के साथ रीलोड करना चाहते हैं। विजय ने निर्माता-निर्देशक-नायक की तीनों भूमिकाएं एक साथ निभाईं। 108 सीटें सिर्फ चुनावी जीत नहीं, बल्कि 60 साल पुरानी थकान का हिसाब हैं।
अब विजय 7 मई को शपथ लेंगे। कांग्रेस का समर्थन मिल चुका है। DMK विपक्ष में है। सवाल यह है कि क्या यह '108' वाली जीत तमिलनाडु को नई दिशा देगी, या पुरानी राजनीति की छाया फिर लौटेगी? यह चुनाव साबित करता है कि राजनीति में प्रतीक भी ताकत रखते हैं। और जब कोई नेता जनता की भावनाओं को छू लेता है, तो पुराने किले ढह जाते हैं, चाहे वे 60 साल पुराने क्यों न हों।












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