PM Modi In Israel: कौन थे 'जाम साहेब'? जिनका पीएम मोदी ने किया जिक्र, इजरायल में लगी है मूर्ति
PM Modi In Israel: पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने इज़रायल दौरे के दौरान इज़रायल की संसद Knesset को संबोधित करते हुए सिर्फ रणनीतिक साझेदारियों, रक्षा समझौतों और आधुनिक रिश्तों की बात नहीं की। उन्होंने इतिहास का एक ऐसा अध्याय याद किया, जो भारत और यहूदी समुदाय के बीच गहरे मानवीय संबंधों को दिखाता है। यह कहानी है नवानगर (आज का जामनगर) के जाम साहेब Digvijay Singh Ranjitsinhji Jadeja (दिग्विजय सिंह रणजीत सिंह जडेजा) की, जिन्होंने होलोकॉस्ट से जान बचाकर भाग रहे यहूदी बच्चों को न सिर्फ शरण दी थी बल्कि उनका ध्यान अपने बच्चों की तरह रखा था।
1942: जब दुनिया में युद्ध और तबाही थी
साल 1942, दूसरा विश युद्ध अपने चरम पर था। यूरोप के यहूदी समुदाय पर नाज़ी अत्याचार हो रहे थे। लाखों लोग मारे जा रहे थे और हजारों परिवार उजड़ रहे थे। उसी समय लगभग 1,000 पोलिश बच्चे, जिनमें ज्यादातर यहूदी थे, अपनी जान बचाने के लिए यूरोप से निकले। दरअसल उस वक्त तक इजरायल का अस्तित्व नहीं था। इसलिए ज्यादातर यहूदी पोलैंड और यूक्रेन जैसे देशों में रहा करते थे।

इन बच्चों ने सोवियत क्षेत्रों और मिडिल ईस्ट से होते हुए बेहद कठिन और लंबी यात्रा की। कई जगहों पर उन्हें असुरक्षा, भूख और मौसम की मार का सामना करना पड़ा। एक जगह से बच्चे दुत्कारे जाते, तो अगले ठिकाने की ओर बढ़ते। ऐसी दुत्कार, भूख-प्यास, अपनों को खोने का गम और लाचार हालात में वे आखिरकार वे भारतीय तटों तक पहुंचे। यह सफर आसान नहीं था, बल्कि जीवन और मौत के बीच की लड़ाई जैसा था।
जामनगर के बालाचड़ी में मिला सुरक्षित ठिकाना
जब कई देशों ने यहूदी शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए थे, तब पश्चिम भारत की एक छोटी रियासत ने उन्हें अपनाया। महाराजा दिग्विजय सिंह ने इन बच्चों को जामनगर के पास बालाचड़ी में एक विशेष बस्ती में बसाया।
यहां बच्चों के लिए रहने की व्यवस्था की गई। उन्हें भोजन दिया गया, शिक्षा की सुविधा दी गई और चिकित्सा सेवाएं भी उपलब्ध करवाई गईं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्हें गरिमा और सम्मान के साथ जीने का मौका मिला। उनका भविष्य भी अंधेरे में था, लेकिन जाम साहेब उनके जीवन के वो प्रकाश बने जिसकी किसी को कल्पना नहीं थी। आज की भाषा में कहें तो- जब दुनिया 'रिफ्यूजी क्राइसिस' से जूझ रही थी, तब एक भारतीय शासक ने मानवीय जिम्मेदारी निभाई।
"तुम अब अनाथ नहीं हो"
जीवित बचे लोगों के मुताबिक, महाराजा ने बच्चों से कहा था, "तुम अब अनाथ नहीं हो। तुम अब नवानगर के नागरिक हो।" यह सिर्फ सांत्वना नहीं थी, बल्कि एक आधिकारिक स्वीकार था। अपनों को खो चुके इन बच्चों के सिर पर न पिता का साया था और न ही मां की देखभाल। ऐसे में जाम साहेब ने उनके सिर पर हाथ रखा। उन्होंने इन बच्चों को अपने राज्य का नागरिक माना। यह कदम उस समय बेहद साहसी और संवेदनशील था, क्योंकि कई बड़े देश भी यह जिम्मेदारी लेने से पीछे हट रहे थे। उस समय यहूदियों की मदद करना, मतलब सीधा हिटलर को चुनौती देने जैसा था। लेकिन जाम साहेब ने इसकी परवाह नहीं की।
युद्ध खत्म होने तक नवानगर बना घर
इतिहासकारों के मुताबिक, महाराजा दिग्विजय सिंह ने राहत कार्यों का अधिकांश खर्च खुद उठाया। यह सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि उनका निजी मानवीय संकल्प था। ये बच्चे 1945 तक, यानी दूसरा विश युद्ध खत्म होने तक, बालाचड़ी में रहे। 1945 में युद्ध समाप्त होने के बाद कई बच्चे पोलैंड, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में फिर से बस गए। लेकिन वे भारत और जामनगर को कभी नहीं भूले।
भारत में पले बच्चे बने प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री
भारत में पले-बड़े और पढ़े इन यहूदी बच्चों ने आगे चलकर दुनिया की बागडोर संभाली। इन बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर न रहे, इसलिए जाम साहेब इनके लिए यूरोप से शिक्षक भी लेकर आए थे। इनमें से दो बच्चे बड़े होकर पोलैंड के प्रधानमंत्री बने, जबकि एक बच्चा बड़ा होकर इजरायल का विदेश मंत्री बना।
भारत-इज़रायल रिश्ते 1992 से भी पहले
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि भारत और यहूदी समुदाय का रिश्ता 1992 में स्थापित औपचारिक राजनयिक संबंधों से भी पुराना है। 1992 में भारत और इज़रायल के बीच आधिकारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए थे। लेकिन यह घटना दिखाती है कि दोनों समाजों के बीच मानवीय जुड़ाव उससे कई दशक पहले से मौजूद था।
भारत में यहूदियों का अनुभव
भारत उन देशों में शामिल है जहां यहूदी समुदाय ऐतिहासिक रूप से बिना यहूदी-विरोधी भावना (Anti-Semitism) के रहा है। दुनिया के कई हिस्सों में जहां यहूदियों को भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ा, वहीं भारत में उन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण मिला।जामनगर की यह कहानी उसी परंपरा का प्रतीक है।
इजरायल में लगी आदमकद मूर्ति
महाराजा दिग्विजय सिंह को इजरायल में आज भी "गुड महाराजा" के नाम से याद किया जाता है। Moshav Nevatim में उनके सम्मान में "गुड महाराजा" नाम का स्मारक मौजूद है। वहां स्कूलों और अन्य स्मारकों में भी उनके योगदान को सम्मान दिया जाता है। यहां जाम साहेब की आदमकद प्रतिमा है, जिसके उद्घाटन में कई बच्चों को भी बुलाया गया था। साथ ही एक स्मारक पोलैंड में भी बना हुआ है। जिन बच्चों को उन्होंने बचाया था, उनके वंशज भी श्रद्धांजलि देने जामनगर आ चुके हैं। यह दिखाता है कि एक सही फैसला पीढ़ियों तक असर छोड़ता है।
1942 का फैसला, जो आज भी गूंज रहा है
युद्धग्रस्त 1942 में, जब दुनिया के कई हिस्सों में दरवाजे बंद हो रहे थे, तब एक भारतीय राजा ने मानवता को चुना। दशकों बाद भी, उनका यह फैसला जामनगर से लेकर यरुशलम तक याद किया जाता है। यह कहानी सिर्फ इतिहास नहीं है, बल्कि एक सीख भी है कि कठिन समय में लिया गया मानवीय फैसला समय की सीमाओं को पार कर जाता है। आज जब दुनिया फिर से कई तरह के संघर्षों से जूझ रही है, तब यह अध्याय याद दिलाता है कि दया और साहस हमेशा राजनीति से बड़े होते हैं।
मानवता का रिश्ता, सिर्फ कूटनीति नहीं
नेसेट में इस कहानी को याद करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने यह संदेश दिया कि भारत और इज़रायल का रिश्ता सिर्फ आधुनिक रक्षा साझेदारी या रणनीतिक समझौतों पर आधारित नहीं है।यह रिश्ता मानवता, करुणा और साझा नैतिक मूल्यों पर टिका है।
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