'40 हजार लो और कोख निकलवाओ', बीड की महिलाओं की दर्दनाक आपबीती, बांझ बनाने वाले कौन?
Maharashtra Beed Illegal Hysterectomy: डिलीवरी के महज 15 दिन बाद गन्ने के भारी गट्ठे सिर पर लादते हुए एक युवा मां का यूट्रस बाहर निकल आया। खून की धार थमने का नाम नहीं ले रही थी। आंखों में आंसू और चेहरे पर मजबूरी की थकान लिए उसने अपना दर्द बयां किया। 'बच्चा पैदा किया, फिर खेत में वापस आ गई। न डॉक्टर था, न दवा। नाल कोयते से काट दी।'
यह कहानी बीड जिले की किसी एक महिला की नहीं, बल्कि हजारों गन्ना मजदूर महिलाओं की सामूहिक त्रासदी है। महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त मराठवाड़ा में, जहां चीनी उद्योग की 'मिठास' की नींव इन महिलाओं के खून-पसीने और अब उनके शरीर के अंगों पर टिकी है। आइए आपको बीड के इस दर्द से रूबरू कराते हैं, जहां गन्ने की मिठास में महिलाओं का दर्द घुट रहा है...

खेतों में जन्म, खेतों में सर्जरी
बीड की एक महिला मजदूर ने आंखें नम करके बताया, 'मेरा सपना डॉक्टर या कलेक्टर बनने का था। 12 साल की उम्र में शादी हो गई। पति ने गन्ने के खेतों में लगा दिया। पीरियड्स हों या प्रसव के बाद दर्द, दवा खाकर काम पर जाना पड़ता। छुट्टी ली तो जुर्माना।'
दूसरी महिला ने नाम छुपाने की शर्त पर कहा, 'काम का दबाव इतना कि शरीर चाहे जितना टूटे, खेत जाना मजबूरी। परिवार ने कहा कि पीरियड्स और दर्द से छुटकारा चाहिए तो बच्चेदानी निकलवा लो। आसान रास्ता है।' ठेकेदार पैसे देते, डॉक्टर ऑपरेशन करते और महिलाएं बांझ होकर वापस खेत में लौट आतीं। 40 हजार रुपये कई मामलों में यही राशि मिलती थी ऑपरेशन के बदले, या फिर कर्ज चढ़ जाता जो पूरे परिवार को जीवन भर मजदूरी के चक्र में जकड़ लेता।
आंकड़े क्या चीख रहे हैं? नर्क की दास्तां...
बीड जिले और आसपास के पुलिस थानों से इस मुद्दे पर बात की, तो अधिकारियों ने ऐसे किसी मामले की जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया। पुलिस का कहना था कि उनके पास जबरन हिस्टेरेक्टॉमी या दबाव में बच्चेदानी निकलवाने से जुड़ी कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं हुई है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग द्वारा 2018 में बीड में 200 महिलाओं पर किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि उनमें से 36% महिलाओं ने गर्भाशय निकलवा लिया था। 2019 में हुए एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि 271 महिलाओं में से 21% की हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय निकालने की सर्जरी) की गई थी।
दोनों सर्वेक्षणों में यह भी पाया गया कि लगभग 85% सर्जरी निजी अस्पतालों में की गई थीं। विशेषज्ञों ने कहा कि आंकड़ों से पता चलता है कि बीड में हिस्टेरेक्टॉमी की दर राष्ट्रीय औसत 3.2% (2019 में) से 14 गुना अधिक थी। एक सप्ताह पहले, मीडिया में ऐसी और खबरें आई थीं जिनमें आरोप लगाया गया था कि 2024 में बड़ी संख्या में महिलाओं के गर्भाशय को सर्जरी करके निकाला गया था, ताकि गन्ना काटने वाली महिलाएं मासिक धर्म के दौरान छुट्टी न ले सकें। 2025 में भी 843 महिलाओं ने गन्ना कटाई से पहले ऑपरेशन करवाया। 2026 तक समस्या बनी हुई है। सरकार ने फिर से राज्य स्तरीय और जिला स्तरीय समितियां गठित की हैं, लेकिन जमीनी हकीकत बदलती नजर नहीं आ रही।
क्यों हो रहा है यह शोषण?
बीड सूखा प्रभावित क्षेत्र है। पानी की कमी, अनिश्चित खेती। हर साल सितंबर से मार्च तक लाखों लोग (अनुमान 5-8 लाख) गन्ना कटाई के लिए महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना आदि में पलायन करते हैं।
- काम: 12-14 घंटे रोज। पति-पत्नी मिलकर 1.5-2 टन गन्ना काटते हैं। कमाई 600-700 रुपये/दिन।
- महिलाओं का बोझ: 50 किलो तक के गट्ठे सिर पर उठाना, गर्भावस्था, मासिक धर्म, प्रसव के बावजूद।
- दबाव: छुट्टी पर मजदूरी कटौती, जुर्माना। ठेकेदार छुट्टी नहीं चाहते।
परिणाम ये है कि भारी रक्तस्राव, संक्रमण, कमजोरी। डॉक्टर 'खराब यूटर्स' बता देते, कैंसर का डर दिखाते। ठेकेदार ऑपरेशन के पैसे देते या कर्ज चढ़ाते। महिलाएं मजबूर हैं। सामाजिक कार्यकर्ता तत्वशील कांबले जैसे लोग आरोप लगाते हैं कि ठेकेदार और कुछ निजी क्लीनिक मिलकर यह सिलसिला चलाते हैं। ठेकेदार इनकार करते हैं और कहते हैं 'मेडिकल सुविधा देते हैं', लेकिन पीड़ित महिलाओं से संपर्क कराने से बचते हैं।
ठेकेदार कैसे निकलवा रहे महिलाओं को गर्भाशय?
स्वतंत्र पत्रकार रूचि कुमार की 31 मार्च 2025 की एक रिपोर्ट में बीड की एक मजबूर महिला गन्ना मजदूर की कहानी सामने रखी। उस समय महिला की उम्र मात्र 32 वर्ष थी। लगातार भारी मासिक धर्म रक्तस्राव और असहनीय दर्द की शिकायत के बाद वह स्थानीय क्लिनिक पहुंची, जहां शुरुआती जांच के बाद डॉक्टरों ने कहा कि उनका गर्भाशय 'खराब' हो चुका है और जान बचाने के लिए हिस्टेरेक्टॉमी यानी गर्भाशय निकालने की सर्जरी जरूरी है। महिला के पति मधुलकर शिंदे के अनुसार, परिवार को यह कहकर डराया गया कि अगर तुरंत ऑपरेशन नहीं कराया गया तो उन्हें कैंसर हो सकता है।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवार डर और मजबूरी के बीच इस फैसले के लिए तैयार हो गया। इस पूरी व्यवस्था में ठेकेदारों की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही है। आरोप हैं कि ठेकेदार महिलाओं को गर्भाशय निकलवाने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि मासिक धर्म या गर्भावस्था के दौरान काम रुकने से मजदूरी और उत्पादन प्रभावित होता है। कई मामलों में सर्जरी के लिए कर्ज भी दिया जाता है, जिसे बाद में वसूलने के नाम पर पूरे परिवार को कर्ज और मजदूरी के अंतहीन चक्र में फंसा दिया जाता है|
बीड में गन्ना किसानों और मजदूरों की स्थिति कैसी है?
बीड की स्थिति विरोधाभासी है। एक तरफ महाराष्ट्र का बड़ा चीनी उद्योग है, दूसरी तरफ किसानों और मजदूरों की हालत बेहद कठिन मानी जाती है। बीड और पूरे मराठवाड़ा में बार-बार सूखा पड़ता है। पानी की कमी के कारण किसान स्थायी खेती नहीं कर पाते। इससे बड़ी संख्या में परिवार मजदूरी के लिए पलायन करने को मजबूर होते हैं।
गन्ना मजदूरों का पलायन क्यों?

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बीड से हर साल लगभग 5 लाख से लेकर 8 लाख तक मजदूर गन्ना कटाई के लिए बाहर जाते हैं। ये लोग सितंबर से मार्च तक महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और पड़ोसी इलाकों की फैक्ट्रियों और खेतों में काम करते हैं। दीवाली के बाद बीड और आसपास के कई इलाकों में काम के अवसर कम हो जाते हैं। आर्थिक तंगी बढ़ने पर हजारों मजदूर परिवार गन्ना कटाई के लिए पलायन करते हैं। खेतों और फैक्ट्रियों के आसपास बने अस्थायी डेरों में उनका जीवन गुजरता है। जहां न सुरक्षित छत होती है, न चारदीवारी और न ही बुनियादी सुविधाएं। कई परिवार पतली साड़ियों और प्लास्टिक से बनी झोपड़ियों में महीनों बिता देते हैं।
मेडिकल एक्सपर्ट्स ने क्या कहा? मानसिक प्रभाव को भी समझें...
गायनेकोलॉजिस्ट्स डॉक्टर सौम्या कहते हैं कि 40 साल से कम उम्र में हिस्टेरेक्टॉमी अंतिम विकल्प होना चाहिए। बिना जरूरत के सर्जरी से हड्डियां कमजोर, हार्मोनल असंतुलन, पेल्विक दर्द, मानसिक तनाव, डिप्रेशन जैसी दिक्कतें सामने आती हैं। मनोवैज्ञानिक Samir Kalra बताते हैं कि इससे गहरे आघात, भरोसे की कमी, मातृत्व खोने का शोक, परिवार में रिश्तों पर असर पड़ता है। कई महिलाएं कभी पूरी तरह उबर नहीं पातीं।
चीनी उद्योग की कड़वी सच्चाई क्या है?
महाराष्ट्र में सैकड़ों चीनी मिलें हैं। मराठवाड़ा उनका बड़ा केंद्र है, लेकिन मजदूरों की हालत करुणामयी बनी हुई है। अस्थायी झोपड़ियां, कोई बुनियादी सुविधा नहीं, न शौचालय, न स्वच्छ पानी, न प्रसव सुविधा। महिलाएं कहती हैं कि हम गन्ने की मिठास पैदा करते हैं, लेकिन हमारी जिंदगी कड़वी हो गई।'
प्रशासन और सरकार का रुख क्या है?
पुलिस कहती है कि कोई औपचारिक शिकायत नहीं। लेकिन आंकड़े और रिपोर्ट्स चीख रहे हैं। सरकार ने 2019 में समिति बनाई, 2025-26 में फिर विजिलेंस समितियां और 15 सदस्यीय राज्य समिति गठित की और Bombay Nursing Homes Act के तहत कार्रवाई का वादा दिया। लेकिन सवाल भी वही है कि इतने सालों में बड़े दोषी क्यों नहीं पकड़े गए? निजी अस्पतालों पर सख्ती क्यों नहीं? पीड़ित क्यों डरती हैं आगे आने से?
अंत में...
बीड की ये महिलाएं सिर्फ मजदूर नहीं, मां हैं, बेटियां हैं, सपने देखने वाली इंसान हैं। 40 हजार रुपये लेकर उनकी कोख छीन ली जाती है ताकि गन्ना कटाई न रुके, चीनी मिलें चलती रहें। यह शोषण नहीं तो और क्या है? जब तक समाज और व्यवस्था इन आवाजों को नहीं सुनेगी, चीनी की मिठास इन महिलाओं के दर्द से बनी रहेगी। समय आ गया है कि हम पूछें, बांझ बनाने वाले कौन हैं? और उन्हें जवाबदेह ठहराएं।













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