PM Modi In Israel: हिब्रू अखबार की हेडलाइन में 'हिंदी..., इजरायली न्यजूपेपर्स ने PM Modi को लेकर क्या-क्या छाप
PM Modi In Israel: पीएम मोदी बुधवार को अपनी दो दिन की यात्रा पर इज़रायल पर हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनका दूसरा इज़रायल दौरा है। इससे पहले वह 2017 में इज़रायल गए थे। वह दौरा ऐतिहासिक था, क्योंकि किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली इज़रायल यात्रा थी। इसके बाद 2018 में इज़रायल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू भारत आए थे। इसी बीच, पीएम मोदी की यात्रा को लेकर इजरायली अखबारों में क्या छप रहा है, और उसका मतलब क्या है जानेंगे इस खबर में।
हिब्रू अखबार की हेडलाइन में 'हिंदी'
इज़रायल के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार The Jerusalem Post ने अपने पहले पन्ने पर पीएम मोदी की तस्वीर छापी। खास बात यह रही कि अख़बार ने हिंदी और हिब्रू दोनों भाषाओं में "नमस्ते" लिखा। इसके नीचे संदेश था-"दो प्राचीन देश अपने संबंधों का नया अध्याय शुरू कर रहे हैं।" यह साफ दिखाता है कि इस यात्रा को कितना अहम माना जा रहा है।

'रणनीतिक टर्निंग पॉइंट' क्यों कहा जा रहा है?
24 फरवरी को प्रकाशित एक ओपिनियन आर्टिकल में द येरुशलम पोस्ट ने लिखा कि "मोदी का इज़रायल दौरा वैश्विक सुरक्षा (Global Security) के लिए एक रणनीतिक टर्निंग पॉइंट है।" लेख में कहा गया कि यह सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं है। पीएम मोदी केनेस्सेट (इजरायली संसद) को संबोधित करेंगे, यरूशलम में इनोवेशन मंच में हिस्सा लेंगे और Yad Vashem में श्रद्धांजलि भी अर्पित करेंगे। लेख के मुताबिक, ये सभी कार्यक्रम भारत-इज़रायल रिश्तों की गहराई दिखाते हैं-चाहे वह राजनीतिक विश्वास हो, तकनीकी सहयोग हो या सुरक्षा से जुड़ी साझा समझ।
सुरक्षा समझौते और डिफेंस टेक्नोलॉजी
हिब्रू चैनल N12 News से बात करते हुए भारत में इज़रायल के राजदूत रेउवेन एज़र ने कहा कि भारत को ऐसी संवेदनशील तकनीकों तक पहुंच मिल सकती है, जिन्हें अब तक साझा नहीं किया गया था।
उन्होंने कहा कि सबसे अहम मुद्दा सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करना है। एज़र ने यह भी कहा कि हाल के युद्धों और भारतीयों को मिली सुरक्षा चुनौतियों के बाद यह सहयोग और भी महत्वपूर्ण हो गया है। N12 न्यूज़ ने यह बात भी खुलकर लिखी कि भारत को इज़रायल समर्थक देश माना जाता है, जिसने 7 अक्तूबर को हमास के हमले के बाद समर्थन व्यक्त किया था।
Haaretz ने भारत-इजरायल के सुरक्षा + व्यापार पर किया फोकस
इज़रायल के प्रमुख अख़बार Haaretz ने लिखा कि 2017 में पीएम मोदी की पहली यात्रा के दौरान सैटेलाइट विकास, कृषि और जल क्षेत्र में 1.3 करोड़ डॉलर के समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे। लेकिन इस बार कहानी अलग है। अब फोकस "पीस टेक्नोलॉजी" से हटकर डिफेंस सिस्टम की खरीद पर है। कहा जा रहा है कि इनमें Rafael Advanced Defense Systems और Elbit Systems की लेजर बेस्ड सिस्टम, Israel Aerospace Industries का एरो सिस्टम, और राफेल द्वारा विकसित आयरन डोम के साथ डेविड्स स्लिंग शामिल हैं। भारत काउंटर-ड्रोन सिस्टम में भी गहरी रुचि दिखा रहा है।
भारत-इजरायल, एक दूसरे के पूरक
इजरायल की फेमस Bar-Ilan University के सेंटर फॉर स्ट्रैटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ से जुड़ी शोधकर्ता डॉ. लॉरेन डागन आमोस ने कहा कि इज़रायल को भारत के साथ टेक्नोलॉजी बेस्ड सपोर्ट को आगे रखना चाहिए। उनके मुताबिक, भारत AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), क्वांटम टेक्नोलॉजी और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में खास रुचि रखता है। भारत यह देख रहा है कि कौन सा देश उसे इस स्तर की क्षमता दे सकता है। आमोस के अनुसार, इज़रायल के पास अनुभव और तकनीकी क्षमता है, जबकि भारत के पास बड़ा बाजार और संसाधन हैं-यानी दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
The Times of Israel ने क्या लिखा?
The Times of Israel में प्रकाशित एडिटोरियल में एलाइज़र अवराहम ने लिखा कि यह दौरा जटिल जियोपॉलिटिकल माहौल में हो रहा है। क्षेत्रीय तनाव, बदलते वैश्विक समीकरण और घरेलू राजनीतिक दबाव दोनों नेताओं को प्रभावित कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भारत-इज़रायल संबंध अब मजबूत हो चुके हैं और झटकों को सहने की क्षमता रखते हैं। मोदी और नेतन्याहू के बीच संबंध औपचारिकता से आगे बढ़कर साझा राष्ट्रीय नजरिए पर आधारित हैं-सुरक्षा, आधुनिकीकरण और वैश्विक भूमिका को मजबूत करना।
लोकतंत्र, क्षेत्रीय संतुलन और बदलते समीकरण
'The Times Of Israel' में रफी ग्लिक ने लिखा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इज़रायल मध्य-पूर्व का एकमात्र लोकतंत्र। दोनों देश व्यापक रणनीतिक संतुलन की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जबकि पाकिस्तान तुर्की और कतर के साथ संबंध मजबूत कर रहा है।
रिपोर्ट में यूएई की इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ नीति, इथियोपिया के साथ अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र में बंदरगाह और बुनियादी ढांचे का विकास, और नील नदी को लेकर इथियोपिया-मिस्र तनाव जैसी क्षेत्रीय जटिलताओं पर भी निशाना साधा गया है। तुर्की को एशिया और यूरोप के बीच सेतु के रूप में देखा जाता है, लेकिन उसे साइप्रस और ग्रीस के साथ तनाव का सामना है।
ईरान का मुद्दा साइडलाइन?
इज़रायली मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस यात्रा के दौरान ईरान का मुद्दा सार्वजनिक एजेंडे से दूर रखा गया। Haaretz ने लिखा कि पिछले आठ सालों से नेतन्याहू की विदेश नीति में ईरान का मुद्दा टॉप पर रहा है, लेकिन इस बार इज़रायल के विदेश मंत्रालय ने इसे सार्वजनिक चर्चा से बाहर रखने की कोशिश की।
बताया गया कि नेतन्याहू की टीम किसी भी सार्वजनिक विवाद से बचना चाहती थी, ताकि भारत के साथ आर्थिक सहयोग पर फोकस रखा जा सके। अगर बंद कमरे की बैठक में यह मुद्दा उठा भी हो, तो उस पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई।
इजरायल को भारत का सपोर्ट
'The Jerusalem Post' ने यह भी लिखा कि भारत में राजनीतिक बदलाव के बाद उसकी इज़रायल नीति में भी बदलाव आया। 2014 में गाजा में हुए Operation Protective Edge के दौरान भारत ने इज़रायल की खुलकर आलोचना नहीं की। जुलाई 2014 में यूनाइटेड नेशन्स की उस रिपोर्ट पर भारत मतदान के समय अनुपस्थित रहा, जिसमें इज़रायल की निंदा की गई थी। ये बताता है कि भारत इजरायल को कितना सपोर्ट करता है।
2012: दिल्ली में इजरायली डिप्लोमेट्स पर हमला और दूसरे विवाद भी
रिपोर्टों में 2012 में नई दिल्ली में इज़रायली राजनयिकों पर हुए हमले का भी जिक्र किया गया। उस हमले में इज़रायल के रक्षा मंत्रालय के अताशे की पत्नी ताली येहोशुआ-कोरेन घायल हो गई थीं। इज़रायल ने उस समय ईरान पर आरोप लगाए थे।
हालांकि, भारत ने किसी पर मुकदमा नहीं चलाया। रिपोर्ट मुताबिक भारत ईरान से अपने द्विपक्षीय संबंधों की वजह से नाम लेने से बचता है। इसके अलावा, क्नेस्सेट (इजरायली संसद) में पीएम मोदी के भाषण के दौरान सुप्रीम कोर्ट को न्योता न दिए जाने के विवाद को भी इन खबरों में जगह मिली है।
पीएम मोदी की ये यात्रा औपचारिक बिल्कुल नहीं ककही जा सकती। इसमें डिफेंस से लेकर AI तक वो सबकुछ शामिल है, जिसकी दोनों देशों को जरूरत हो। इसीलिए इजरायल के ज्यादातर अखबारों ने पीएम मोदी की यात्रा को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया है।
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