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Pakistan: जाने वाली है शरीफ मियां की कुर्सी! मुशर्रफ की राह पर आसिम मुनीर, जल्द बनेंगे अगले तानाशाह!

Pakistan: फील्ड मार्शल असीम मुनीर आज पाकिस्तान के इतिहास के सबसे शक्तिशाली सैन्य शासक के रूप में उभरे हैं। पाकिस्तान के संविधान में हुए 27वें संशोधन ने उन्हें देश का पहला चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज बना दिया है, जिसके तहत वे तीनों सशस्त्र बलों, न्यूक्लियर फोर्सेस और सेना के प्रमुख के रूप में असीमित कार्यकाल के साथ कार्यरत हैं।

यह पद उन्हें नागरिक राजनीति से ऊपर एक आजीवन सैन्य तानाशाह के रूप में स्थापित करता है। उन्होंने अपने द्वारा घोषित "कठोर राज्य" (Hard State) की अवधारणा के अंतर्गत पाकिस्तान की राजनीति, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति पर पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लिया है।

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ऐतिहासिक तानाशाहों की श्रेणी में शामिल हुए मुनीर

मुनीर अब फील्ड मार्शल अयूब खान, जनरल याह्या खान, जनरल ज़िया-उल-हक और जनरल परवेज़ मुशर्रफ जैसे शासकों की पंक्ति में आ गए हैं - जिन्होंने लोकतांत्रिक नेताओं की तुलना में अधिक समय तक देश पर शासन किया।
"ऑपरेशन सिंदूर" के छह महीनों में, उन्होंने पाकिस्तान की विदेशी नीति को स्थिर किया, अमेरिका, चीन और सऊदी अरब जैसे बाहरी साझेदारों के साथ संबंधों को पुनर्जीवित किया, और डोनाल्ड ट्रंप तथा रियाद दोनों को खुश करने में सफल रहे।

"भारत को लहूलुहान करने" की नई रणनीत

हाल ही में 10 नवंबर को नई दिल्ली में एक संदिग्ध जैश-ए-मोहम्मद आतंकवादी सेल का भंडाफोड़ हुआ, जिससे भारत में आतंकी हमलों को फैलाने की पाकिस्तान की नई साजिश का संकेत मिला।

यह सेल देश के कई हिस्सों में हमले करने की योजना बना रहा था। सुरक्षा विश्लेषक मेजर माणिक जॉली (सेवानिवृत्त) के अनुसार, यह एक "हब एंड स्पोक मॉडल" के तहत काम कर रहा था, जिसमें फरीदाबाद मॉड्यूल पूरे भारत में फैले आतंकवादी नेटवर्क का हिस्सा प्रतीत होता है।

मुशर्रफ के रास्ते पर मुनीर

असीम मुनीर अब जनरल परवेज़ मुशर्रफ की उस रणनीति को दोहरा रहे हैं, जिसे उन्होंने "हज़ार कट से मौत" कहा था। मुशर्रफ ने परमाणु हथियारों के संतुलन का लाभ उठाते हुए पारंपरिक युद्ध की सीमाओं के नीचे आतंकवादी कार्रवाइयों की गुंजाइश बनाई। उन्होंने परमाणु हथियारों की ढाल और आतंकवाद की तलवार को मिलाकर "न्यूक्लियर वेपन-एनेबल्ड टेररिज्म (NWET)" की अवधारणा को जन्म दिया।

"काउंटरवैल्यू टेररिज्म" का सिद्धांत

परमाणु सिद्धांत में शहरों और नागरिकों को निशाना बनाने को "काउंटरवैल्यू टार्गेटिंग" कहा जाता है। मुशर्रफ के दौर में पाकिस्तानी सेना ने इसी सिद्धांत को "काउंटरवैल्यू टेररिज्म" के रूप में अपनाया, जिसके तहत दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में सैकड़ों निर्दोष नागरिकों की हत्या की गई।

2000 के दशक की शुरुआत में लाल किला हमला (22 दिसंबर 2000) इसकी पहली कड़ी था - जिसमें दो भारतीय सैनिकों की हत्या हुई थी। यह हमला उस समय हुआ जब मुशर्रफ ने नवाज़ शरीफ को सत्ता से बेदखल कर दिया था।

आतंकवाद के दोहरे खेल में पाकिस्तान

2001 में पाकिस्तान अमेरिका के नेतृत्व वाले "War on Terror" में शामिल हुआ, लेकिन साथ ही भारत के खिलाफ अपने आतंकवादी युद्ध को और तेज़ कर दिया। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और उनके उप-प्रॉक्सी इंडियन मुजाहिदीन के जरिए पाकिस्तान ने भारत में भीषण आतंकी हमले करवाए। जम्मू-कश्मीर में "फिदायीन" हमलों की रणनीति अपनाई गई, जिसमें आत्मघाती बंदूकधारियों ने सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर धावा बोला।

भारत में आतंक का चरम और बड़े हमले

2001 में जम्मू-कश्मीर में 2084 घटनाओं में 4000 से अधिक लोग मारे गए।
इसी वर्ष 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमला हुआ, जिसने भारत और पाकिस्तान को युद्ध के कगार पर ला दिया। मुशर्रफ और जनरल अशफाक परवेज़ कयानी के दौर में मुंबई हमले सबसे बड़े आतंकवादी हमले बने- जुलाई 2006 ट्रेन ब्लास्ट (209 मृतक) और 26/11 मुंबई हमला (166 मौत हुई थीं)।

भारतीय जवाबी रणनीति: अब नहीं कोई न्यूक्लियर ब्लैकमेल

मनमोहन सिंह सरकार के दौर में इन हमलों का जवाब सीमित था, लेकिन मोदी सरकार ने नीति बदल दी।
2016 में उरी आतंकी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक,
2019 में पुलवामा हमले के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक,
और पहलगाम हमले के बाद "ऑपरेशन सिंदूर"- जिसमें पाकिस्तान भर में 30 मिनट के अंदर हवाई अड्डों, विमानों और वायु रक्षा ढांचे को तबाह किया गया। यह 1971 के बाद पाकिस्तान की सेना के लिए सबसे बड़ा एक-दिवसीय नुकसान था।

मोदी का नया सिद्धांत: आतंकवाद= युद्ध

12 मई को प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा की कि भारत अब आतंकवाद को "युद्ध का कृत्य" मानेगा।
राज्य और गैर-राज्य अभिनेताओं के बीच अब कोई फर्क नहीं किया जाएगा और परमाणु ब्लैकमेल को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

चार तानाशाहों की नियति: इतिहास की चेतावनी

रावलपिंडी के जीएचक्यू की दीवारों पर चार तानाशाहों के चित्र लटके हैं- अयूब खान, याह्या खान, जिया-उल-हक और मुशर्रफ। हर एक ने छलांग लगाई, पर अंत में बदनामी और मृत्यु पाई। जिया का विमान 1988 में दुर्घटनाग्रस्त हुआ, मुशर्रफ पर बेनज़ीर भुट्टो की हत्या का आरोप लगा और वे 2019 में दुबई में निर्वासन के दौरान अकेले मरे।

बेनज़ीर ने अपनी आत्मकथा "डॉटर ऑफ द ईस्ट" में लिखा था कि जब उन्होंने जिया का शव देखा, तो "चेहरा साबुत था, लेकिन सिर का पिछला हिस्सा उड़ गया था।" बाद में खुद बेनजीर भुट्टो भी एक आतंकवादी हमले में मारी गई थीं।

असीम मुनीर: वही रास्ता, वही अंजाम?

2025 में असीम मुनीर भी उसी हिंसक रास्ते पर बढ़ रहे हैं। उन्होंने अगस्त में टैम्पा (फ्लोरिडा) में कहा था कि भारत "एक फेरारी" है जबकि पाकिस्तान "बजरी से भरा डंप ट्रक"। आज पाकिस्तान कर्ज में डूबा है, अर्थव्यवस्था चरमरा रही है, और खैबर-पख्तूनख्वा व बलूचिस्तान में दो बड़े विद्रोह चल रहे हैं।

अफगानिस्तान और भारत - दोनों अब पाकिस्तान के खिलाफ एकजुट हैं। पाकिस्तानी सेना के पास अब सिर्फ एक "हथौड़ा" है, इसलिए हर चीज़ उन्हें "कील" नज़र आती है - और इतिहास बताता है, ऐसे तानाशाह अक्सर अपने ही ताबूत में कील ठोकते हैं।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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