Balochistan Crisis: बलूचिस्तान में गृहयुद्ध जैसे हालात, क्या 1971 की तरह फिर होने वाला है पाक का बंटवारा?
Pakistan Army failure in Balochistan: पाकिस्तान एक बार फिर अपने इतिहास के सबसे गंभीर और निर्णायक दौर से गुजरता नजर आ रहा है। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का नेशनल असेंबली में बलूचिस्तान की सुरक्षा स्थिति पर दिया गया राज्य की कमजोर होती पकड़ का संकेत माना जा रहा है। जिस तरह 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हुआ था, उसी तरह अब बलूचिस्तान को लेकर अलगाव की आशंकाएं तेज हो गई हैं।
लगातार बढ़ते विद्रोही हमले, आधुनिक हथियारों से लैस बलूच गुट और सेना की सीमित क्षमता ने हालात को और जटिल बना दिया है। संसाधनों की कमी और आंतरिक अस्थिरता के बीच बलूचिस्तान पर घटता नियंत्रण पाकिस्तान की क्षेत्रीय अखंडता के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि इतिहास के दोहराव की आशंका खुलकर सामने आने लगी है।

इतने बड़े क्षेत्र की सुरक्षा करना चुनौती
ख्वाजा आसिफ ने संसद में स्पष्ट किया कि बलूचिस्तान पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा है। इतने विशाल और दुर्गम इलाके की सुरक्षा करना सेना के लिए एक बड़ी भौगोलिक चुनौती बन गया है। रक्षा मंत्री के अनुसार, किसी शहर की सुरक्षा करना आसान है, लेकिन मीलों तक फैले निर्जन पहाड़ों और रेगिस्तानों में हर जगह गश्त करना और नियंत्रण बनाए रखना व्यावहारिक रूप से असंभव होता जा रहा है। भारी तैनाती के बावजूद सेना पूरे क्षेत्र को कवर नहीं कर पा रही है।
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विद्रोहियों के पास आधुनिक हथियार
रक्षा मंत्री का सबसे चौंकाने वाला खुलासा विद्रोहियों के पास मौजूद अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों को लेकर था। उन्होंने माना कि बलूच लड़ाके पाकिस्तानी सैनिकों की तुलना में अधिक उन्नत और महंगे हथियारों का उपयोग कर रहे हैं। विद्रोहियों के पास 20 लाख रुपये तक की राइफलें, हजारों डॉलर के थर्मल इमेजिंग और लेजर सिस्टम के साथ-साथ उच्च श्रेणी का कॉम्बैट गियर मौजूद है। यह पाकिस्तानी सेना के मनोबल और उनकी पारंपरिक युद्ध रणनीति के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बनकर उभरी है।
सेना की परिचालन सीमाएं
ख्वाजा आसिफ ने यह भी स्वीकार किया कि सेना शारीरिक और संसाधनों की कमी से जूझ रही है। उन्होंने कहा कि सैनिक अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन संसाधनों की एक सीमा होती है। विद्रोहियों के पास न केवल बेहतर हथियार हैं, बल्कि वे स्थानीय भूगोल का फायदा उठाकर 'हिट एंड रन' की रणनीति अपना रहे हैं। सेना के लिए इतने बड़े प्रांत में चौबीसों घंटे हर संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखना कठिन हो गया है, जिससे विद्रोहियों को हमले करने के नए अवसर मिल रहे हैं।
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सुरक्षा व्यवस्था पर गहराता संकट
यह बयान पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में गहरी दरार को उजागर करता है। रक्षा मंत्री की खुली स्वीकारोक्ति साफ संकेत देती है कि बलूचिस्तान में केवल सैन्य बल के सहारे नियंत्रण बनाए रखना अब संभव नहीं रह गया है। विद्रोहियों के बेहतर हथियारों से लैस होने की बात यह दर्शाती है कि पाकिस्तान की रणनीति और संसाधन दोनों ही कमजोर पड़ चुके हैं। इस बयान ने पाकिस्तानी सेना की ताकत को लेकर किए जाने वाले बड़े-बड़े दावों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।












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