नेपाल ने रचा इतिहास: 32 सीटों वाले PM प्रचंड को 99 फीसदी सांसदों ने दिया समर्थन, विपक्षियों ने भी दिया वोट
संसद में पीएम पुष्प कमल दहल को समर्थन में 268 वोट मिले हैं। उन्हें 270 वोटों में से सिर्फ 2 वोट नहीं मिला। प्रचंड को नेपाल की प्रतिनिधि सभा में 99 फीसदी से भी अधिक सदस्यों का समर्थन मिला है।

File Image: PTI
नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने मंगलवार को देश की संसद में विश्वास मत जीत लिया है। नेपाल की संसद में प्रधानमंत्री पद के लिए विश्वासत मत पर वोटिंग हुई थी। पुष्प कमल दहल को समर्थन में 268 वोट मिले हैं। उन्हें 270 वोटों में से सिर्फ 2 वोट नहीं मिला। प्रचंड को नेपाल की प्रतिनिधि सभा में 99 फीसदी से भी अधिक सदस्यों का समर्थन मिला है इसलिए इसे देश के राजनीतिक इतिहास का एक दुर्लभ मामला बताया जा रहा है।
प्रचंड की पार्टी को मिली थी 39 सीटें
ऐसा उदाहरण अभी तक शायद ही किसी लोकतांत्रिक देश में मिला है। आपको बता दें कि नेपाली संसद की 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में नेपाली कांग्रेस के 89 सांसद हैं, जबकि यूएमएल के 79 सांसद हैं। जबकि प्रचंड की पार्टी के पास 32 सांसद हैं। प्रचंड को सदन में स्पष्ट बहुमत के लिए 138 मतों की जरूरत थी जबकि सरकार बनाने के दौरान उन्होंने 169 सांसदों के समर्थन का दावा किया था। ऐसे में उन्हें 99 और वोट मिले जिससे जाहिर होता है कि उन्हें विपक्षियों का भी समर्थन मिला है। रिपोर्ट के मुताबिक पीपुल्स फ्रंट नेपाल और नेपाल वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी को छोड़कर सभी राजनीतिक दलों ने प्रधानमंत्री दहल के समर्थन में मतदान किया है।
विपक्षी पार्टी ने भी दिया समर्थन
इससे पहले पीएम रहे शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस, केपी शर्मा ओली की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी-यूएमएल और प्रचंड की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी- माओवादी के साथ-साथ बाकी पार्टियों ने भी पीएम दहल का समर्थन किया है। प्रतिनिधि सभा में विश्वास मत हासिल करने के से पहले पीएम प्रचंड ने कहा था कि वह अस्वीकृति, अनादर और प्रतिशोध की राजनीति के बजाय आम सहमति, सहयोग और आपसी विश्वास की राजनीति को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
तीसरी बार पीएम बने प्रचंड
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी केंद्र के 68 वर्षीय नेता ने 26 दिसंबर को तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। इससे पहले वे 2008 से 2009 और 2016 से 2017 में प्रधानमंत्री बने थे। नेपाल में नवंबर में हुए आम चुनावों के बाद किसी भी राजनीतिक दल को बहुमत नहीं मिला था। हालांकि इस रेस में पहले जरूर शेर बहादुर देउबा का नाम आगे चल रहा था, लेकिन आखिर में पुष्प कमल दहल ने सत्ताधारी माओइस्ट सेंटर को समर्थन देने से इनकार कर दिया और गठबंधन भी छोड़ दिया था।
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