NATO Summit Ankara: टूटने वाला है नेटो? अंकारा समिट में खींचतान, क्या है ट्रंप का अल्टीमेटम जिससे बढ़े मतभेद?
NATO Summit Ankara: तुर्किए की राजधानी अंकारा में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) का दो दिवसीय शिखर सम्मेलन एक ऐसे मोड़ पर शुरू हुआ है, जहां पूरे यूरोप की सुरक्षा और भू-राजनीति दांव पर लगी है। यह हाई-प्रोफाइल बैठक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सदस्य देशों पर रक्षा बजट बढ़ाने के अभूतपूर्व दबाव के बीच हो रही है। दूसरी तरफ, अमेरिकी तेवरों से चिंतित यूरोपीय देश नए सैन्य समझौतों की घोषणा कर ट्रंप को शांत करने की रणनीति बना रहे हें। कहा ये भी जा रहा है कि ट्रंप के दबाव के चलते ये संगठन अपना भरोसा और मजबूती खोता जा रहा है।
इस कूटनीतिक रस्साकशी का बैकग्राउंड पिछले साल हेग (The Hague) में तैयार हुआ था, जहां नाटो देशों ने अपनी GDP का 5 प्रतिशत डिफेंस और सिक्योरिटी पर खर्च करने का टारगेट रखा था। इस मास्टर प्लान के तहत साल 2035 तक मूल रक्षा बजट को 3.5% और सुरक्षा आवश्यकताओं को 1.5% तक पहुंचाना है। अंकारा में इस समय इसी कड़े रोड़मैप को जमीन पर उतारने को लेकर माथापच्ची चल रही है।

गैर NATO देशों की ज्यादा बड़ी डिमांड
इस सम्मेलन का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि इसमें नाटो के सभी 32 सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों के अलावा कई गैर-आधिकारिक देशों के प्रभावशाली नेता भी पहुंचे हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की मौजूदगी ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा है। इनके साथ ही ऑस्ट्रेलिया और खाड़ी देशों (Gulf Countries) के रक्षा और विदेश मंत्री भी अंकारा में डेरा डाले हुए हं। जेलेंस्की इस मंच का इस्तेमाल सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम (Patriot Air Defense Systems) की मांग के लिए करने जा रहे हैं। कीव में हाल ही में हुए रूसी ड्रोन हमलों में 11 नागरिकों की मौत के बाद यूक्रेन का डिफेंस सिस्टम गहरे दबाव में है।
सीरियाई राष्ट्रपति- अंकारा में हैं पर समिट में नहीं
इसी बीच, सीरिया के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति अहमद अल-शरा भी अंकारा पहुंचे हैं। हालांकि वे आधिकारिक तौर पर समिट का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन राजनयिक गलियारों में चर्चा है कि ट्रंप के साथ होने वाली उनकी द्विपक्षीय मुलाकात पश्चिम एशिया (West Asia) के समीकरण बदल सकती हे।
ट्रंप का 'नो फ्री राइड' अल्टीमेटम और तुर्किए का नया रसूख
डोनाल्ड ट्रंप अपने पहले कार्यकाल से ही नाटो के अस्तित्व और उसमें अमेरिका के भारी वित्तीय योगदान पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका तर्क है कि अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसे पर यूरोपीय देश "मुफ्त की सुरक्षा" (Free Ride) का आनंद ले रहे हैं। ट्रंप ने जर्मनी के मौजूदा रक्षा बजट को 'हास्यास्पद' तक करार दिया, जिस पर जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने भी बेहद कड़ा रूख अपनाया है।
एक दिलचस्प कूटनीतिक पहलू: ट्रंप ने संकेत दिया कि अगर उनके विश्वसनीय सहयोगी और तुर्किए के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन इस समिट के होस्ट न होते, तो शायद वे इस बैठक से दूरी बना लेते। हाल के वर्षों में तुर्किए ने न केवल अपने रक्षा बजट को सुधारा है, बलकि वह नाटो के भीतर एक प्रमुख हथियार सप्लाई करने वाले देश बनकर उभरा है। यही वजह है कि यह समिट तुर्किए को पश्चिम और मध्य-पूर्व के बीच एक मजबूत मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर रही है।
अमेरिकी सेना की वापसी का डर बनाम जमीनी हकीकत
इस खींचतान के बीच वाशिंगटन ने यूरोपीय देशों पर दबाव दोगुना करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। अमेरिका ने यूरोपीय क्षेत्रों से अपने फाइटर जेट्स, नेवल वॉरशिप और सबमरीनों को एक सीक्वेंस में वापस बुलाने का फैसला किया है। जिसको देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि अमेरिकन एयरफोर्स और नेवी की इस आंशिक वापसी से यूरोप का सुरक्षा संतुलन तात्कालिक रूप से डगमगा सकता हे।
हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि बजट को कागज़ पर बढ़ाना और उसे वास्तविक सैन्य ताकत में तब्दील करना कोई आसान काम नहीं है। यदि यूरोपीय देश आज बड़े पैमाने पर नए रक्षा सौदे करते भी हैं, तो नए हथियारों की डिलीवरी होने और सैनिकों को उनके संचालन की ट्रेनिग देने में कई साल लग जाएंगे। इसलिए, बजट में इस अचानक बढ़ोतरी का ग्राउंड रियलिटी पर तुरंत कोई जादुई असर दिखना मुश्किल है।
टिकेगा या टूटेगा NATO?
अंकारा का यह शिखर सम्मेलन भले ही जमीन पर तुरंत कोई बड़ा सैन्य बदलाव न ला पाए, लेकिन इसका राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश बेहद गहरा है। रक्षा बजट और खर्चों को लेकर जारी इस तीखी जुबानी जंग के बावजूद, नाटो के सदस्य देश दुनिया के सामने अपनी सामूहिक एकजुटता (United Front) प्रदर्शित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। इस वैश्विक संकट के दौर में अंतरराष्ट्रीय मंच पर आपसी दरारों को छिपाकर एकजुट दिखना ही इस पूरी बैठक का तात्कालिक और सबसे बड़ा लक्ष्य है। ऐसे में ये तो नहीं कहा जा सकता कि NATO टूट रहा है लेकिन ये जरूर है कि इसमें मौजूद सदस्यों में मतभेद बढ़ रहे हैं।
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