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38 सालों के बाद धूल में मिल गया NASA का 'मंगल मिशन', अमेरिकी वैज्ञानिकों में निराशा की लहर

नासा का करीब 38 साल पुराना मंगल मिशन धूल में मिल गया है और मंगल से आए उल्कापिंड से कुछ ऐसे सबूत मिले हैं, जिनसे नासा वैज्ञानिकों में गहरी निराशा है।

वॉशिंगटन, जनवरी 15: 38 सालों की कठिन मेहनत के बाद भी नासा का मंगल ग्रह पर जीवन खोजने से संबंधित एक मिशन फेल हो गया है और नासा के दर्जनों वैज्ञानिकों की अथाह मेहनत धूल में मिल गई है। मंगल ग्रह से आए एक उल्कापिंड, जिसने 1990 के दशक में अमेरिका में कोहराम मचा दिया था और जिसको लेकर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन तक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए दावे कर दिए थे, अब उस उल्कापिंड को लेकर बहुत बड़ी निराशा नासा वैज्ञानिकों के हाथ लगी है।

मंगल ग्रह पर जीवन से संबंधित था मिशन

मंगल ग्रह पर जीवन से संबंधित था मिशन

साल 1984 में अंटार्कटिका में एक चट्टान का टुकड़ा खोजा गया था और वैज्ञानिकों ने जांच में पाया था कि, पत्थर का वो टुकड़ा असल में एक उल्कापिंड है, जो मंगल ग्रह से आया था। मंगल ग्रह से आए उस उल्कापिंड को लेकर कुछ ऐसे सबूत मिले थे, जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को मंगल ग्रह पर जीवन होने को लेकर उत्साहित कर दिया था। साल 1996 में नासा के वैज्ञानिकों एक ग्रुप ने दावा किया था कि, पत्थर के उस टुकड़े में बैक्टीरिया और सूक्ष्म जीवाश्म मिले हैं, जिसके बाद पूरी इस बात की संभावना काफी ज्यादा बढ़ गई थी, कि क्या मंगल ग्रह पर जीवन मौजूद है और तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए मंगल ग्रह पर जीवन होने की संभावना जताई थी, लेकिन अब उल्कापिंड को लेकर बेहद निराशा करने वाले सबूत हाथ लगे हैं।

ब्रह्मांड का बना था सबसे बड़ा आश्चर्य

ब्रह्मांड का बना था सबसे बड़ा आश्चर्य

मंगल ग्रह के उस उल्कापिंड ने 1996 में पूरी धरती के लोगों की उत्सुकता काफी ज्यादा बढ़ा दी थी और हर कोई मंगल ग्रह के बारे में ज्यादा से ज्यादा बातें जानना चाहत था। अमेरिकी राष्ट्रपति ने उसे 'हमारे ब्रह्मांड की सबसे आश्चर्यजनक चीज' कहा था। इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन ने अमेरिकी अंतरिक्ष प्रोग्राम को दी जाने वाली फंडिंग को भी सही ठहराया था। लेकिन, लगातार चल रहे रिसर्च के बाद अब उस उल्कापिंड से बेहद निराश करने वाले सबूत मिले है और अब नासा के वैज्ञानिकों ने उस छोटे से उल्कापिंड को लेकर रिसर्च में पाया है कि, पत्थर के उस छोटे से टुकड़े से जो कार्बन युक्त यौगिक मिला था, वो असल में लंबे समय तक चट्टान में बहने वाले नमकीन और चमकदार पानी का परिणाम है।

नासा पर कई वैज्ञानिकों ने उठाए सवाल

नासा पर कई वैज्ञानिकों ने उठाए सवाल

साइंस कम्युनिटी ने लंबे समय से नासा के मूल निष्कर्षों पर सवाल उठाया है, जिसमें जीवन के संकेतों के अलावा कुछ और कार्बनिक यौगिकों का निर्माण किया गया है। इस नए अध्ययन के लिए एक टीम ने नई तकनीकों का उपयोग करके उल्कापिंड में खनिजों का विश्लेषण किया, जिससे पता चला कि वे सर्पिन जैसे खनिजों से जुड़े थे। यह एक गहरे हरे रंग का खनिज है, जिसे कभी-कभी सांप की खाल की तरह देखा जा सकता है, और एक बार गीले वातावरण से जुड़ा होता है, जैसा कि प्रारंभिक मंगल ग्रह के पहली बार बनने पर होता।

इंसानी जीवन के नहीं मिले निशान

इंसानी जीवन के नहीं मिले निशान

रिसर्चर्स ने अब कहा है कि, अरबों साल पहले मंगल ग्रह पर मौजूद भूजल, दो चट्टानों की दरार से गुजरे थे, उन्होने कार्बन के छोटे-छोटे गोले बनाए, और उन्हीं गोलों को लेकर 1990 के दशक में कुछ वैज्ञानिकों को लगता था कि, अंटार्कटिका में मिले उल्कापिंड में शायद इंसानी जीवन के कुछ निशान मौजूद हैं और शायद मंगल ग्रह पर कभी जीवन रहा हो। नई रिपोर्ट में कहा गया है कि, चट्टान की दरारों के माध्यम से पानी के गुजरने की एक ही प्रक्रिया पृथ्वी पर हो सकती है और जो मंगल के वातावरण में मीथेन की उपस्थिति को समझाने में मदद कर सकती है।

नासा का मिशन मंगल

नासा का मिशन मंगल

हालांकि, मंगल ग्रह से आए उल्कापिंड को लेकर पिछले 38 सालों से की जा रही खोज अब फेल हो गई है और अब जाकर पता चला है कि, उल्कापिंड में सिर्फ कार्बन हैं और इंसानी जीवन से संबंधित कोई और सबूत नहीं हैं, लेकिन अब नासा मंगल ग्रह पर जीवन की तलाश के लिए अपना रोवर (एक तरह का रोबोट) मंगल ग्रह पर भेज चुका है। नासा के अलावा चीन भी अपना रोवर मंगल ग्रह पर उतार चुका है, जिनसे लगातार मंगल ग्रह की तस्वीरें और अलग अलग जानकारियां मिल रही हैं। वहीं, आने वाले सालों में यूरोप और भारत की अंतरिक्ष एजेंसी भी मंगल ग्रह के लिए अपने मिशनों को लॉंच करेंगी।

बृहस्पति और शनि के लिए मिशन

बृहस्पति और शनि के लिए मिशन

मंगल ग्रह के अलावा आने वाले सालों में बृहस्पति और शनि के लिए भी मिशन लॉंच किए जाएंगे, जिनके जरिए इन ग्रहों के उपग्रहों और वहां पर बर्फ या फिर पानी की खोज की जाएगी। ऐसा माना जाता है कि, इन ग्रहों पर विशाल मात्रा में बर्फ मौजूद है। नासा के वैज्ञानिक स्टील के अनुसार, यह साबित करने का एकमात्र तरीका है कि मंगल पर कभी सूक्ष्मजीवी जीवन था या नहीं, विश्लेषण के लिए जो नमूने नासा का रोवर पृथ्वी पर लाएगा, उसकी जांच से ही अब पता चल पाएगा। नासा के पर्सवेरेंस मार्स रोवर ने पहले ही पृथ्वी पर लौटने के लिए छह नमूने एकत्र किए हैं, जिनमें से लगभग तीन दर्जन नमूनों का उत्पादन होने की उम्मीद है। वे संयुक्त नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी मिशन द्वारा लाल ग्रह की सतह से एकत्र किए जाएंगे, और 2030 तक पृथ्वी पर लौट आएंगे।

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