Diplomacy: यूक्रेन युद्ध रूकवाने पीएम मोदी अपनाएंगे भारत की कोरिया रणनीति? जानिए नेहरू ने क्या किया था?
PM Modi Ukraine Visit: क्या भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस महीने के अंत में यूक्रेन का दौरा करने जा रहे हैं?
अगर भारतीय प्रधानमंत्री दौरा कर रहे हैं, तो क्या वह यूक्रेन और रूस के बीच शांति स्थापित करने के पंडित नेहरू की उस स्ट्रैटजी को अपना रहे हैं, जिसे भारत ने कोरियाई युद्ध के दौरान अमेरिका समर्थित दक्षिण कोरिया और कम्युनिस्ट चीन और तत्कालीन सोवियत संघ समर्थित उत्तर कोरिया के बीच युद्धविराम समझौता करवाने के लिए इस्तेमाल किया था?

अगर प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत, रूस और यूक्रेन के बीच मध्यस्थता करने के बारे में वास्तव में गंभीर है, जैसा कि चीन और तुर्की भी कोशिश कर रहे हैं, तो क्या इस काम के लिए नई दिल्ली के पास बीजिंग और अंकारा की तुलना में बेहतर वैश्विक विश्वसनीयता और समर्थन है?
आइने इन तीनों सवालों का जवाब बारी बारी से जानते हैं।
पहले सवाल का जवाब- सबसे पहले ये जान लेना जरूरी है, कि प्रधानमंत्री मोदी के यूक्रेन दौरे को लेकर अभी तक ना ही भारत की तरफ से और ना ही यूक्रेन की तरफ से कोई आधिकारिक घोषणा की गई है। लेकिन, पिछले कुछ दिनों से मीडिया में प्रधानमंत्री के यूक्रेन दौरे को लेकर आई रिपोर्ट्स का खंडन भी नहीं किया गया है, जिससे मजबूत संकेत मिलते हैं, कि प्रधानमंत्री यूक्रेन जा रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि प्रधानमंत्री 23 अगस्त को यूक्रेन जा रहे हैं।
अब दूसरे सवाल पर आते हैं।
चूंकि प्रधानमंत्री मोदी की दौरे की तारीख की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, इसलिए उनके सटीक एजेंडे के बारे में फिलहाल कहना मुश्किल है। उनके एजेंडे के बारे में भारतीय विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस में बता सकते हैं, जैसा की पीएम के किसी भी विदेशी दौरे से पहले किया जाता है।
हालांकि, यह साफ है, कि प्रधानमंत्री की रूस यात्रा ने यूक्रेनी राष्ट्रपति वलोडिमीर जेलेंस्की की भावनाओं को गंभीर रूप से आहत किया था, लेकिन अगर मोदी कीव जाते हैं, तो ये जेलेंस्की की आहत भावनाओं पर मरहम की तरह काम करेगा।
जेलेंस्की को रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत की तटस्थता वाली नीति कभी पसंद नहीं आई है और उन्होंने उम्मीद की है, कि भारत, रूस की आलोचना करे, लेकिन नई दिल्ली ने लगातार कूटनीतिक, राजनीति, आर्थिक और रक्षा वार्ता के जरिए ही तनाव का समाधान निकालने पर जोर दिया है।
हालांकि, ऐतिहासिक संबंध होने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बार बार रूसी अधिकारियों को बताया है, कि यूक्रेन में युद्ध बम, बंदूक और गोलियों के बीच खत्म नहीं हो सकती है, बल्कि इसके लिए "कूटनीति और संवाद" के रास्ते पर ही लौटना होगा।
रूस में भारत की इस नीति की सराहना जरूर की जाती है, लेकिन लागू नहीं किया है, दूसरी तरफ भारत ने लगातार यूक्रेन को मानवीय सहायता भेजी है। और बताया जाता है, कि मोदी ने जेलेंस्की को आश्वासन दिया है, कि भारत युद्ध को खत्म करने में मदद करने के लिए "हर संभव प्रयास" करेगा, जब उन्होंने इस साल इटली में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान जेलेंस्की से मुलाकात की थी।

पिछले महीने पीएम मोदी की रूस यात्रा के अंत में जारी संयुक्त बयान में कहा गया है, कि भारत और रूस दोनों पक्षों ने "दोनों पक्षों के बीच बातचीत और कूटनीति के माध्यम से यूक्रेन के आसपास संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान की अनिवार्यता पर प्रकाश डाला। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के आधार पर संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के प्रस्तावों की सराहना की"।
अब तीसरे सवाल पर आते हैं, कि युद्ध को खत्म करने के लिए भारत क्या कर सकता है? कोरियाई युद्ध के दौरान देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने क्या स्ट्रैटजी अपनाई थी?
कई मायनों में यूक्रेन में जारी युद्ध की विशेषताएं कोरियाई युद्ध से मिलती-जुलती हैं। वह युद्ध 1950 में कोरियाई प्रायद्वीप के उत्तरी आधे हिस्से पर आक्रमण के साथ शुरू हुआ, जिस पर कम्युनिस्टों का नियंत्रण था, और दक्षिणी आधे हिस्से पर, अमेरिका द्वारा समर्थित पश्चिम-समर्थक कोरियाई लोग रहते थे।
युद्ध शुरू होने से पहले, जब तनाव चरम पर पहुंच चुका था, उस वक्त भारत ने 1948 में 'peaceful and highly representative elections' यानि, शांतिपूर्ण तरीके से ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधियों के चुनाव आयोजित करवाने के लिए कोरिया पर बने United Nations Temporary Commission on Korea (UNTCOK) का नेतृत्व किया था। और भारत की इसी कोशिश की वजह से पहली बार कोरिया में एक लोकतांत्रिक सरकार चुनी गई थी। हालांकि, ये सरकार कोरिया के दक्षिणी हिस्से में चुनी गई थी, जिसे आज हम लोग दक्षिण कोरिया के तौर पर जानते हैं।
लेकिन, 1950 में युद्ध शुरू हो गया है और 1951 में चीन के युद्ध में भाग लेने और उत्तर कोरिया को रूस की मदद शुरू होने के बाद, ऐसा माहौल बन गया, कि कोरिया में युद्ध अब कभी खत्म नहीं होने वाला है।
दक्षिण कोरिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सिंगमैन री, जिन्हें आज की तारीख का जेलेंस्की कहा जा सकता है, वो इस बात पर अड़े हुए थे, कि हमलावरों को हराना ही होगा और जिस तरह से जेलेंस्की लगातार पश्चिमी देशों से हथियार मांगते रहते हैं, वो भी पश्चिमी देशों से लगातार आवश्यक सैन्य और आर्थिक मदद मांग रहे थे।
लेकिन, 1951 में युद्ध उस वक्त एक तरह से सीजफायर जोन में फंस गया, जब अमेरिका और चीन की सेनाएं पहाड़ों में फंस गई, जिसे अब डीमिलिटराइज्ड जोन (DMZ) कहा जाता है।
और फिर कोरियाई प्रायद्वीप में चल रहा ये युद्ध, अमेरिका के अंदर एक गंभीर राजनीतिक मुद्दा बन गया, जैसा की आज यूक्रेन युद्ध को लेकर बना हुआ है।
तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन, जो डेमोक्रेटिक पार्टी के थे, उनपर रिपब्लिकन पार्टी इतनी ज्यादा हमलावर हो गई थी, कि उन्होंने हार के डर से 1952 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में दोबारा नहीं लड़ने का फैसला किया। और कोरियाई युद्ध ने अमेरिका की घरेलू राजनीति को इतना प्रभावित किया, कि राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी हार गई और रिपब्लिकन पार्टी के ड्वाइट आइजनहावर ने चुनाव जीत लिया।

तो क्या जो बाइडेन के नेतृत्व वाली डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए भी इस साल 5 नवंबर को होने वाला राष्ट्रपति चुनाव अशुभ होने वाला है?
ये वो वक्त था, जब भारत, पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में भारत 'गुटनिरपेक्ष आंदोलन' का अगुवा बन रहा था, और उसने इस युद्ध में मध्यस्थता करनी शुरू की।
पंडित नेहरू के नेतृत्व में भारत ने उस वक्त अमेरिका, चीन और तत्कालीन सोवियत संघ के नेताओं से लगातार बातचीत की, और युद्ध खत्म करने के लिए प्रस्ताव रखा। हालांकि, उनके प्रस्ताव से तत्काल युद्धविराम नहीं हो पाया, लेकिन 1952 में यूनाइटेड नेशंस में भारत का 'युद्धबंदियों की अदलाबदली (POW)' का प्रस्ताव पास हो गया और भारत को यूनाइटेड नेशंस में 'Neutral Nations Repatriation Committee (NNRC)' यानि, तटस्थ राष्ट्र प्रत्यावर्तन समिति की अध्यक्षता के लिए चुना गया, जिसने 90 दिनों तक युद्धबंदियों को कामयाबी के साथ अपने पास रखा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि इस NNRC की कामयाबी ने 27 जुलाई 1953 को युद्धरत पक्षों के बीच युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर करने और उसके बाद कोरियाई DMZ की स्थापना के लिए रास्ता तैयार कर दी। हालांति, 1953 में हुए इस समझौते ने टेक्निकली इस युद्ध को खत्म नहीं किया था, लेकिन युद्धविराम को जरूर लागू कर दिया, जिसने कोरियाई प्रायद्वीप पर अभी तक शांति कायम कर रखी है।
क्या मोदी अपनाएंगे नेहरू की नीति?
तो क्या प्रधानमंत्री मोदी की नेतृत्व वाली भारत सरकार यूक्रेन युद्ध को रोकने के लिए क्या कोरिया वाली नीति अपनाएगी और क्या, मॉस्को और कीव, दोनों युद्ध रोकने के लिए किसी नतीजे पर पहुंच सकते हैं?
एक्सपर्ट्स का मानना है, कि शुरूआत में भारत, दोनों पक्षों को मानवीय मदद, कैदियों की अदला-बदली, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की सुरक्षा, क्लस्टर बमों के इस्तेमाल पर रोक और गहन युद्ध क्षेत्रों से नागरिकों को निकालने पर राजी कर सकता है। और अगर ये कामयाबी के साथ होता है, तो दोनों पक्षों के बीच विश्वास की भी बहाली होगी, जिससे रूसी और यूक्रेनी सेनाएं DMZ बनाने के लिए तैयार हो सकती हैं और अपन अपने ठिकानों से कई किलोमीटर पीछे हट सकती हैं।
जिसके बाद ये युद्ध उस स्थिति में पहुंच सकती है, जैसा टेस्ला के CEO एलन मस्क ने सुझाया था, कि विवादित क्षेत्रों में शांतिपूर्ण नतीजा निकालने के लिए यूनाइटेड नेशंस के नेतृत्व में जनमत संग्रह करवाया जाए और जनमत संग्रह होने तक यूएन के शांति सैनिकों को पूरे क्षेत्र में तैनात किया जाए।
लिहाजा, अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये हैं, कि क्या इस मध्यस्थता में शामिल दो और देशों, चीन और तुर्की की तुलना में भारत की विश्वसनीयता कितनी है?

और अगर बात विश्वसनीयता की है, तो यह सिर्फ रूस और यूक्रेन की ही बात नहीं होगी, बल्कि ये वैश्विक समुदाय और खास तौर पर अमेरिका के नेतृत्व वाली पश्चिमी दुनिया के समर्थन का भी सवाल है, क्योंकि वो अमेरिका और पश्चिमी दुनिया की है, जो यूक्रेन को अरबों डॉलर की आर्थिक और सैन्य सहायता देकर यूक्रेन में युद्ध को जारी रखे हुआ है।
बात अगर तुर्की की करें, तो मध्य पूर्व में नाजुक स्थिति को भड़काने और दुनिया के कई हिस्सों में कट्टरपंथी इस्लाम को बढ़ावा देने वाले रुख ने तुर्की की हालिया भूमिका को दुनिया में "गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार" के रूप में देखा जा रहा है।
वहीं, चीन ने हाल ही में यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा की मेजबानी की थी और युद्धविराम को लेकर कुछ प्रस्ताव रखे थे, जिनका रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी समर्थन किया था। लेकिन, चीन का खुद का रूख ही स्पष्ट नहीं है और उसके पास पश्चिम का समर्थन भी नहीं है। पश्चिम का मानना है, कि वो चीन ही है, जिसके समर्थन ने रूस को लगातार युद्ध लड़ने के लिए सक्षम बनाए रखा है, लिहाजा मध्यस्थ के तौर पर बीजिंग की भूमिका को लेकर वैश्विक समुदाय में विश्वास नहीं है।
वहीं, चीन जिस तरह से आधुनिक समय में खुद आक्रमणकारी देश के तौर पर सामने आया है, उसने पहले ही उसको लेकर दुनिया में अविश्वास भर रखा है।
लिहाजा वो भारत ही है, जिसके पास मध्यस्थता के लिए समर्थन हासिल हो सकती है और जिसे बतौर मध्यस्थ स्वीकार्यता मिल सकती है।
भारत के पास रूस और अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिम देश, दोनों ही गंभीरता से लेते हैं। प्रधानमंत्री मोदी को राष्ट्रपति पुतिन का समर्थन हासिल है। हालांकि, अमेरिका को भारत की "रणनीतिक स्वायत्तता" और रूस के साथ बने लगातार मजबूत संबंध पंसद नहीं आए होंगे, लेकिन हकीकत ये है, कि चीन के साथ प्रतिद्वंदिता ने अमेरिका को भारत के साथ बने रहने के लिए मजबूर किया है।
लिहाजा, तुर्की और चीन की तुलना में भारत, अमेरिका और रूस, दोनों के लिए ही ज्यादा खुला है और यह भारत ही है, जिसने हमेशा एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में अपनी शक्ति का अहसास कराया है। यह भारत ही है, जो सभी देशों की क्षेत्रीय संप्रभुता का सम्मान करता है और नियम-आधारित शासन और "सभी के लिए सुरक्षा और विकास" की वकालत करता है।
लिहाजा, भारत वो वैश्विक खिलाड़ी बन सकता है, जो दोनों देशों के बीच युद्धविराम को संभव बना सकता है। लेकिन, क्या मोदी सरकार उस भूमिका को निभाने के लिए तैयार है, वो अगर मोदी यूक्रेन का दौरा करते हैं, तो उस दौरे के नतीजे से सामने आ जाएंगी।












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