Bangladesh Hindu: 'क्रांतिकारी' कमला हैरिस ने बांग्लादेश में हिंदुओं के नरसंहार पर क्यों साधी चुप्पी?

Bangladesh Hindu: बड़े-बड़े धुरंधर क्रांतिकारी और मानवाधिकार के चैंपियन की इन दिनों कान में रूई और मुंह में पान डालकर बैठे हुए हैं, क्योंकि बांग्लादेश में हिंदुओं का नरसंहार हो रहा है और भला हिंदुओं के खिलाफ होने वाली किसी हिंसा पर बोलकर अपनी 'सेक्युलर' छवि को वो कैसे धो डालें।

चाहे भारत हो या ब्रिटेन हो या फिर अमेरिका ही क्यों ना हो, किसी भी देश के उदारवादी और खुद को सेक्युलर बताने वाले नेताओं या मानवाधिकार के मसीहाओं के मुंह से आप बांग्लादेश के हिंदुओं को लेकर एक शब्द भी नहीं सुनेंगे और इसी कड़ी में 'हाफ इंडियन' कमला हैरिस भी हैं, जिनका पसंदीदा टॉपिक मानवाधिकार (माइनस हिंदू) रहा है।

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कमला हैरिस, जो इन दिनों अपने प्रेसिडेंशियल कैम्पेन को जोर-शोर से चला रही हैं, उन्होंने बांग्लादेशी हिंदुओं के खिलाफ होने वाली हिंसा पर चुप्पी साध रखी है, मानो कुछ हो ही नहीं रहा हो। जबकि ये वही कमला हैरिस हैं, जिन्हें जब भी सुविधाजनक लगा, उन्होंने "पहली भारतीय-अमेरिकी सीनेटर" होने का दिखावा किया।

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हिंसा, चुप क्यों हैं कमला हैरिस?

अमेरिका में कुछ दिनों से कमला हैरिस के मूल को लेकर जोरदार बहस चल रहा और डोनाल्ड ट्रंप ने भी उनके मूल को लेकर सवाल उठाया है और पूछा है, कि वो साफ करें, कि उनका मूल क्या है?

लेकिन, कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है, कि उनकी पहचान जरूरत के हिसाब से बदलती रह सकती है। और ओबामा की तरह, (हालांकि कमला हैरिस वैसे भी अमेरिकी पहचान की राजनीति के गणित में फिट नहीं बैठती हैं), बहुत से जमैका और भारतीय प्रवासियों की तरह, वह एक उच्च-उपलब्धि वाले अल्पसंख्यक समूह की सदस्य हैं, जिनके कुछ पारिवारिक संबंध हैं, लेकिन सामाजिक वर्ग से परे और शायद अपने मूल देश से किसी भी चीज से संबंधित होने की बहुत कम समझ है।

मिंडी कलिंग के साथ एक कूकिंग शो में कमला हैरिल के खाना पकाने के अंदाज से यह पता चलता है, कि वह कितनी भारतीय हैं? उन्होंने बड़े होते हुए कुछ चीजें सीखीं, ज्यादातर खाने की चीजें, और कुछ शब्द और कुछ प्यारी यादें, लेकिन पहचान, विश्वास या प्रतिबद्धता की कोई वास्तविक भावना उनमें नहीं है।

बांग्लादेश में, मार्क्सवादियों और इस्लामवादियों ने आखिरकार इस्लामिक क्रांति कर ही दी है, जिसे इंटरनेशनल मीडिया ने भी बढ़ा चढ़ाकर पेश किया, जिसने बांग्लादेश में जिहादियों के शासन को कामय कर दिया है और हिंदुओं की रक्षा करने वाली शेख हसीना के शासन को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है।

बांग्लादेश में जो कुछ हुआ है, उसे इस्लामिक क्रांति ही कहना सही होगा, जिसमें बांग्लादेशी स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान इस्लामवादियों (जिनमें कुछ अमेरिका भाग गए और राजनीतिक खिलाड़ी बन गए) द्वारा किए गए नरसंहारों की हल्की-फुल्की प्रतिध्वनियां हैं।

सभी इस्लामी आंदोलनों की तरह, बांग्लादेश में हुए इस आंदोलन का भी प्राथमिक लक्ष्य गैर-मुसलमानों, खासकर हिंदुओं का नरसंहार करना है।

मीडिया ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों को नजरअंदाज कर दिया है, ठीक वैसे ही जैसे उसने पहले इंडोनेशिया में इस्लामिस्टों की तरफ से चीनियों के नरसंहार को और नाइजीरिया में ईसाइयों के नरसंहार को नजरअंदाज किया है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने तो उन्हें "बदला" बताकर उचित ठहराया है, क्योंकि न्यूयॉर्क टाइम्स का मानना है, कि गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर हमला करने वाले बांग्लादेश के मुस्लिम बहुसंख्यक अभी भी उत्पीड़ित हैं।

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कमला हैरिस लगातार इस बात पर टिप्पणी करती रही हैं, कि इस्लामी आतंकवादियों के खिलाफ़ इजराइल की रक्षा कितनी भयानक है, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों के बारे में उन्होंने पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति, जो भारतीय मूल के हैं, उन्होंने अब जाकर हिंसा को खत्म करने का आग्रह करते हुए एक बयान दिया है।

एक और अमेरिकी सांसद हकीम जेफ्रीस ने दावा किया कि, "मैं पिछले कुछ हफ्तों में बांग्लादेश में हुई हिंसा, हताहतों और मानवाधिकारों के हनन से बहुत चिंतित और दुखी हूं और पीड़ितों के परिवारों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करता हूं, जिसमें बांग्लादेशी-अमेरिकी समुदाय भी शामिल है, जो ब्रुकलिन को अपना घर कहता है।"

इसके अलावा उन्होंने हमलों की जांच करवाने का आह्वान किया है और जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने की मांग की है, लेकिन बाइडेन प्रशासन ने भी बांग्लादेश की तरफ से मुंह घुमा रखा है। बाइडेन प्रशासन को शेख हसीना के कार्यकाल में मानवाधिकार जैसी बातें याद थीं, लेकिन अब वो गूंगा बन चुका है, क्योंकि इस बार निशाने पर हिंदू हैं, हिंदुओं के मानवाधिकार जैसी कोई बात नहीं होती है।

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