Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

Israel Pak Deal: 'भाड़े पर जाएगी पाकिस्तानी आर्मी’! आसिम मुनीर बने दलाल, पाकिस्तानी पत्रकार ने किया बड़ा दावा

Israel Pak Deal: एक पाकिस्तानी पत्रकार के दावे ने देश की राजनीति और सेना को एक नए विवाद में घेर दिया है। पत्रकार का कहना है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने गाजा में सैनिक तैनाती के लिए इजरायल से प्रति सैनिक 10,000 डॉलर की मांग की है। यह दावा इस सवाल को जन्म देता है कि क्या पाकिस्तान की सेना की कार्रवाई मानवीय भावना से अलग पैसों के लालच के लिए है?

सेना की "कीमत" तय करने का आरोप

अगर यह दावा सच है, तो यह बेहद चौंकाने वाला है कि किसी देश की सेना ने अपने सैनिकों की आर्थिक कीमत तय की। इस पूरी कहानी की शुरुआत तब हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा के लिए 20-सूत्रीय शांति योजना पेश की। इस योजना के अंतर्गत एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (ISF) बनाने की बात हुई थी, जो गाजा में शांति व्यवस्था बनाए रखने और पुनर्निर्माण में मदद करेगा। इसलिए आसिम मुनीर के खिलाफ सोशल मीडिया पर दलाल जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

Israel Pak Deal

ISF का मुख्य काम था -
• फिलिस्तीनी पुलिस बलों को सहयोग देना,
• इजरायल और मिस्र के साथ सीमाओं की सुरक्षा करना,
• गाजा में हथियारों की तस्करी को रोकना।

इस योजना में स्पष्ट किया गया था कि इस बल में कोई अमेरिकी सैनिक नहीं होगा, बल्कि इसमें अरब देशों और अन्य साझेदार देशों की भागीदारी होगी।

पाकिस्तान ने दी भागीदारी की सहमति

इसी योजना के तहत पाकिस्तान ने भी गाजा शांति सेना में शामिल होने की इच्छा जताई।
अक्टूबर के अंत में, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने ऐलान किया कि देश अपने सैनिकों को गाजा भेजेगा। उन्होंने जियो न्यूज से कहा, "अगर पाकिस्तान इसमें भाग लेता है, तो हमें गर्व होगा।" रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान 20,000 सैनिकों को गाजा भेजने की तैयारी कर रहा है।

गुप्त बैठकों से खुला नया मोर्चा

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह फैसला पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की इजरायल की मोसाद और अमेरिका की CIA के अधिकारियों से हुई गुप्त बैठकों के बाद लिया गया। सूत्रों ने ये भी बताया कि गाजा में पाकिस्तानी सैनिकों को हमास के बचे कुछ ढांचे और हथियारों को खत्म करने और अमेरिका से मिले निर्देशों के तहत स्थिरता बनाए रखने का काम सौंपा जाएगा।

असल में, इसे "मानवीय मिशन" के रूप में पेश किया जा रहा है, लेकिन असल उद्देश्य हमास को कमजोर करना और इजरायल-गाजा सीमा पर बफर जोन बनाना है।

पाकिस्तान और इजरायल के बीच अनोखा सहयोग

यह पहली बार होगा जब पाकिस्तान इजरायली सुरक्षा मिशन में किसी भी तरह से शामिल होगा।
यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि पाकिस्तान ने आज तक इजरायल को मान्यता नहीं दी है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान और पश्चिम एशिया में नई कूटनीतिक संरचना की शुरुआत हो सकती है।

10,000 डॉलर प्रति सैनिक का विवाद

इसी बीच, प्रसिद्ध पाकिस्तानी पत्रकार असमा शिराज़ी के एक दावे ने माहौल और गरमा दिया।
उन्होंने कहा कि आसिम मुनीर ने इजरायल से प्रति सैनिक 10,000 डॉलर मांगे, जबकि इजरायल ने केवल 100 डॉलर प्रति सैनिक (लगभग ₹8,860) की पेशकश की। अगर यह दावा सही है, तो पाकिस्तान ने 20,000 सैनिकों के लिए 200 मिलियन डॉलर (लगभग ₹1,770 करोड़) की मांग की थी।यह दावा पाकिस्तान की "मुस्लिम देशों के हितों के रक्षक" वाली छवि पर गंभीर सवाल उठाता है।

पाकिस्तान की "किराए की सेना" की पुरानी कहानी

कई विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान द्वारा अपने सैनिकों के लिए आर्थिक सौदा करना कोई नई बात नहीं है। देश का इतिहास बताता है कि पाकिस्तान की सेना कई बार "किराए की सेना" के रूप में काम करती रही है।

• अफगानिस्तान युद्ध (2001-2014): पाकिस्तान ने अमेरिका से अरबों डॉलर लिए ताकि वह तालिबान के खिलाफ लड़ सके।

• सऊदी अरब की मदद (1979): जब मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर आतंकियों ने कब्जा किया, तो सऊदी अरब ने पाकिस्तान से मदद मांगी। इस्लामाबाद ने अपने कमांडो भेजे, और बदले में तेल और वित्तीय सहायता प्राप्त की।

• कतर विश्व कप 2022: पाकिस्तान ने कतर में सैनिक तैनात किए, और उसी समय 2 अरब डॉलर का द्विपक्षीय वित्तीय पैकेज मिला - जिससे कई विश्लेषकों ने इसे "quid pro quo" यानी सेवा के बदले भुगतान कहा।

जनता में गुस्सा और सवाल

इस पूरे विवाद ने पाकिस्तान के नागरिकों में भी गुस्सा पैदा किया। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि क्या उनकी सेना अब "किराए पर उपलब्ध" है? देश के भीतर यह बहस चल पड़ी है कि सेना का असली मकसद राष्ट्रीय सुरक्षा है या विदेशी फंडिंग?

रणनीतिक पूंजी या बिकाऊ ताकत?

वरिष्ठ भारतीय पत्रकार शेखर गुप्ता ने The Print में लिखा - "पाकिस्तानी सेना और उसकी रणनीतिक पूंजी हमेशा किराए पर उपलब्ध रही है- चाहे वह नकदी, तेल या रणनीतिक लाभ के लिए हो।" यह बयान पाकिस्तान के सैन्य मॉडल पर गहरा सवाल खड़ा करता है कि- क्या यह वास्तव में एक राष्ट्रीय संस्था है, या फिर राजनीतिक-सैन्य व्यापार मॉडल बन चुकी है?

भरोस के लायक नहीं है पाक

यह पूरा विवाद पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता पर गहरा धब्बा है। यदि यह दावा सच साबित होता है, तो यह दिखाता है कि पाकिस्तान अब अपनी विदेश नीति को आर्थिक सौदेबाजी में बदल चुका है। जहां एक ओर वह फिलिस्तीनी मुसलमानों के साथ एकजुटता का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर उसी जंग से लाभ कमाने की कोशिश भी कर रहा है, जिसे इस्लाम में भी हराम माना जाता है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+