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Iran Protest: 1971 में दिया था पाकिस्तान का साथ, अब वापसी देख रहे पहलवी! भारत के लिए बढ़ेगा खतरा?

Iran Protest: ईरान के निर्वासित राजा रेजा पहलवी एक बार फिर चर्चा में हैं। ईरान में सरकार-विरोधी हिंसक प्रदर्शनों के बीच वह अपनी संभावित वापसी की कोशिश कर रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने हाल ही में भारत के साथ करीबी और सहयोगात्मक रिश्ते बनाने की इच्छा जाहिर की है। पहलवी का कहना है कि यदि उनके नेतृत्व में एक लोकतांत्रिक ईरान बनता है, तो वह भारत और ईरान के बीच सदियों पुराने सभ्यतागत, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों को प्राथमिकता देगा।

वाशिंगटन से भारत के लिए दोस्ती का संदेश

वाशिंगटन में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में रेजा पहलवी ने भारत-ईरान संबंधों को याद करते हुए कहा कि ये रिश्ते आधुनिक कूटनीति से भी पहले के हैं। उन्होंने कहा- "भारत और ईरान के संबंध बहुत पुराने हैं। यह सिर्फ आज की राजनीति की बात नहीं, बल्कि कई-कई सालों की सांस्कृतिक विरासत है।" उनका कहना था कि आधुनिक इतिहास में भी दोनों देशों के बीच संबंध काफी मजबूत रहे हैं।

Iran Protest

अपने बयान में क्या बोले शाह पहलवी?

रेजा पहलवी ने साफ किया कि एक लोकतांत्रिक ईरान उन देशों के साथ मजबूत रिश्ते बनाएगा जो संप्रभुता, स्वतंत्रता और समान मूल्यों में विश्वास रखते हैं। उन्होंने कहा- "एक लोकतांत्रिक ईरान किसी भी ऐसे देश के साथ बेहतरीन संबंध बनाने के लिए तैयार रहेगा, जो हमारे साथ अलग-अलग सेक्टर्स में साझेदारी कर सके।" इस बयान को भारत के लिए एक पॉजिटिव मैसेज के रूप में देखा जा रहा है।

'भारत जरूरी है'

रेजा पहलवी ने माना कि आज दुनिया कई गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। उन्होंने खासतौर पर ऊर्जा संकट, जनसंख्या दबाव, जल संकट और संसाधनों की कमी का जिक्र किया। पहलवी का मानना है कि इन समस्याओं से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है, और भारत इसमें एक अहम भूमिका निभा सकता है।

भारत की टेक्नोलॉजी के मुरीद हुए पहलवी

भारत की तकनीकी ताकत की तारीफ करते हुए पहलवी ने कहा कि "जब प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता की बात आती है, तो भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है।" उन्होंने माना कि भारत की तकनीकी क्षमता ईरान को कई अहम क्षेत्रों में आगे बढ़ने में मदद कर सकती है।

रिन्युएबल एनर्जी और नए सेक्टर्स में व्यापार

रेजा पहलवी ने संकेत दिए कि भारत-ईरान सहयोग सिर्फ पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने नवीकरणीय ऊर्जा और उभरती तकनीकों में साझेदारी की संभावना भी जताई। उनका कहना है कि वह चाहते हैं कि ईरानी और भारतीय विशेषज्ञ, उद्यमी और कारोबारी समुदाय मिलकर काम करें, ताकि दोनों देशों को लाभ हो।

भारत के लिए अवसर या खतरा?

रेजा पहलवी की संभावित वापसी भारत के लिए मिले-जुले संकेत लेकर आ रही है। एक तरफ यह तकनीकी और आर्थिक सहयोग के नए अवसर खोल सकती है, वहीं दूसरी ओर कुछ रणनीतिक जोखिम भी मौजूद हैं। खास चिंता इस बात को लेकर है कि पहलवी शासन अमेरिका-समर्थित और पाकिस्तान-परस्त रुख अपना सकता है। साथ ही ईरान के चाबहार पोर्ट को लेकर भी अभी स्थिति असमंजस भरी है। इस पोर्ट पर भारत कई करोड़ निवेश कर चुका है।

पाकिस्तान का करीबी पहलवी परिवार

इतिहास गवाह है कि 1941 से 1979 तक ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रेजा पहलवी ने पाकिस्तान के साथ मजबूत सैन्य, आर्थिक और राजनयिक संबंध बनाए रखे थे। उस दौर में पाकिस्तान को ईरान की सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए एक बफर स्टेट माना जाता था।

1965 और 1971 की जंग में दिया था पाकिस्तान का साथ

शाह मोहम्मद रेजा पहलवी ने 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन किया था। उनके शासनकाल में ईरान ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन किया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत पर आक्रामक होने के आरोप लगाए। लेकिन वर्तमान सुप्रीम लीडर खामेनेई ने हमेशा कश्मीर के मुद्दे पर भारत का समर्थन किया है। इसके अलावा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी वे भारत के खिलाफ नहीं गए।

क्या फिर पाकिस्तान समर्थक होगा ईरान?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रेजा पहलवी सत्ता में आते हैं, तो ईरान का रुख एक बार फिर पाकिस्तान समर्थक हो सकता है। इसके अलावा, अमेरिका के साथ करीबी रिश्ते बनने पर ईरान अमेरिकी सुरक्षा और ऊर्जा नीतियों के दायरे में आ सकता है।

चाबहार: भारत के लिए सिर्फ बंदरगाह नहीं

भारत के लिए चाबहार बंदरगाह सिर्फ एक बिजनेस प्रोजेक्ट नहीं है। यह भारत की कनेक्टिविटी रणनीति का अहम हिस्सा है। चाबहार के जरिए भारत, पाकिस्तान को दरकिनार करता है और अफगानिस्तान समेत मिडिल ईस्ट तक तक सीधी पहुंच बनाता है। इसके अलावा इसी रास्ते भारत अफगान जनता को मानवीय सहायता भेजता है।

अमेरिका-ईरान-पाकिस्तान गठजोड़ का डर

रेजा पहलवी की बहाली यदि पश्चिमी-समर्थित तख्तापलट के जरिए होती है, तो इससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है। कुछ विशेषज्ञों को आशंका है कि इससे अमेरिका-ईरान-पाकिस्तान का नया गठबंधन बन सकता है, जो भारत की रणनीतिक स्थिति को चुनौती दे सकता है।

लोकतंत्र, तकनीक और भारत की नई उम्मीद

हालांकि, रेजा पहलवी खुद को एक लोकतांत्रिक बदलाव के नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। उन्होंने भारत के आईटी और नवीकरणीय ऊर्जा सेक्टर की खुलकर तारीफ की है। उनका दावा है कि वह भारत के साथ रिश्तों का एक नया, ज्यादा खुला और सहयोगात्मक अध्याय शुरू करना चाहते हैं - ऐसा अध्याय जो दोनों देशों के युवाओं और भविष्य के लिए फायदेमंद हो।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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