बार-बार रेप, जांघों पर घोंपे सूजे, खौलते तेल में डुबोया-फांसी से पहले 200 लड़कियों की मौत का सच
Iran Islamic Revolution 1979: साल 1979 में ईरान में शाह की सत्ता से विदाई हुई कट्टरपंथियों वाली इस्लामिक क्रांति के बाद महिलाओं पर सबसे ज्यादा अत्याचार हुई। उनके साथ न सिर्फ रेप हुए बल्कि उन्हें फांसी देने से पहले उनका रेप सिर्फ इस बात के लिए किया गया ताकि उन्हें मरने के बाद जन्नत नसीब न हो और न ही अल्लाह उन्हें अपनी शरण में जगह दें। ये ईरान की इस्लामिक क्रांति का वो चेहरा था जिसे वहां की महिलाओं ने बाहर लाया।
पीड़िता की जुबानी
अपनी फांसी से ठीक पहले ईरान की एविन जेल में बंद अकरम नईमी, जिन्हें लोग मदर नईमी के नाम से जानते थे, उन्होंने अपने बयान में कहा था, 'मैं अपने लिए दुखी नहीं हूं, मुझे उन लड़कियों की चिंता है जिनके साथ फांसी से पहले बलात्कार किया जाता है।" वह उन वर्जिन लड़कियों को जानती थीं जिन्हें पहले यौन हिंसा का शिकार बनाया गया और फिर मार दिया गया। कुछ हफ्तों बाद, मदर नईमी को खुद फायरिंग स्क्वाड के सामने खड़ा कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने एविन जेल के तत्कालीन वार्डन असदुल्लाह लाजेवर्दी के साथ शारीरिक संबंध बनाने से इनकार कर दिया था।

जेल में दोस्त संग हुई आंखों देखी गवाही
पीपल्स मुजाहिदीन ऑर्गनाइजेशन की समर्थक शिरीन नारिमन अपनी पूर्व जेल साथी अकरम नईमी को याद करती हैं। जनवरी 1982 में, महिला सेल ब्लॉक 242 की प्रभारी फरज़ानेह नौरबख्श ने पीए सिस्टम पर घोषणा की और आदेश दिया कि मदर नईमी को सेल ब्लॉक में लाया जाए। नारिमन बताती हैं कि मदर नईमी चल भी नहीं पा रही थीं और दूसरी कैदियों को उन्हें सीढ़ियों से नीचे उतारना पड़ा।
यातना के शारीरिक निशान
जब मदर नईमी की चादर हटाई गई, तो उनके पैर बेहद लाल और सूजे हुए थे, जैसे उन्हें गर्म तेल में डुबोया गया हो। उनके पैरों पर मोटे मार्कर से उनका पूरा नाम और एक तारीख लिखी हुई थी। यह साफ संकेत था कि उन्हें फांसी से पहले गंभीर शारीरिक यातनाएं दी गई थीं। जिसमें उनके साथ कई बार रेप होना भी शामिल था।
1980 के दशक की भयावह सच्चाई
मानवाधिकार संगठन जस्टिस फॉर ईरान ने ईरानी जेलों में वर्जिन लड़कियों के साथ फांसी से पहले हुए संगठित बलात्कार पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट के अनुसार, 20 जून 1981 से 21 दिसंबर 1981 के बीच सिर्फ छह महीनों में 2,241 लोगों को फांसी दी गई, जिनमें 223 महिलाएं थीं।
इन 223 महिलाओं में से 34 महिलाएं यानी लगभग 15% 18 साल से कम उम्र की थीं, जबकि 120 महिलाएं यानी करीब 54% की उम्र 18 से 29 साल के बीच थी। ये आंकड़े बताते हैं कि ईरानी जेलों में युवा लड़कियां किस हद तक राज्य हिंसा का शिकार बनीं। हालांकि असल संख्या आंकड़ों से कई गुना ज्यादा बताई जाती है।
बिना अपराध के सजा
इस्लामिक रिपब्लिक में फांसी के खिलाफ आवाज उठाने वाले गिने-चुने लोगों में से एक थे हुसैन-अली मोंटाजेरी, जो उस समय अयातुल्लाह खुमैनी के नामित उत्तराधिकारी थे। नवंबर 1986 में उन्होंने खुमैनी को पत्र लिखकर पूछा, 'क्या आपको पता है कि आपकी जेलों में युवा लड़कियों के साथ जबरन यौन शोषण किया गया है?"
मोंटाजेरी ने यह भी सवाल उठाया कि पूछताछ के दौरान महिलाओं के खिलाफ भद्दी और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया जाता है। सच बोलने की कीमत उन्हें भारी पड़ी-उन्हें उत्तराधिकारी पद से हटा दिया गया और कई सालों तक घर में नजरबंद रखा गया। उनकी मौत भी इसी नजरबंदी के दौरान हो गई।
सबूत जो झुठलाए नहीं जा सके
इस्लामिक सरकार ने जब आरोपों से इनकार कर दिया तो जस्टिस फॉर ईरान की निदेशक और महिला अधिकार कार्यकर्ता शादी सद्री ने कहा कि यह सरकारी इनकार है, लेकिन रिकॉर्ड, गवाहियां और सबूत साफ दिखाते हैं कि ये अपराध हुए थे। क्योंकि कई महिलाएं जो छोटे-मोटे अपराध में सजा काट रही थीं उन्होंने बाहर आने के बाद जब ईरान छोड़ा तो अपने बयान दर्ज करवाए। संयुक्त राष्ट्र की महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर विशेष रिपोर्ट ने भी इन दावों की पुष्टि की है।
कैदियों की आखिरी कोशिश
रिपोर्ट में दर्ज गवाहियों के अनुसार, कुछ कैदियों को जब वसीयत लिखने के लिए पेन दिया गया, तो उन्होंने अपने कपड़ों या शरीर पर लिख दिया कि उनके साथ बलात्कार किया गया। यह जानकारी इलाहे डेकनामा (शिराज) और सीमा मोत्तलेबी (मशहद) ने दी।
परिवारों को मिला 'दहेज'
कई मामलों में फांसी के बाद, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का एक सदस्य पीड़ित परिवार के घर आया और प्रतीकात्मक रूप से कैंडी का डिब्बा या सिक्के देकर चला गया। यह एक क्रूर मजाक था कि उनकी बेटी के साथ क्या किया गया।
खुमैनी का बयान- आयते नहीं पढ़ते?
मानवाधिकार कार्यकर्ता इरिज मेसदाघी जिन्होंने 1981 से 1991 तक देश भर की विभिन्न जेलों में बिताया, अपनी पुस्तक 'हेल ऑन अर्थ: ग़ेज़ेलहेसार जेल' लिखते हैं कि खुमैनी ने कहा था, 'आप सजा पर कुरान की आयतें क्यों नहीं पढ़ते?" मतलब साफ था कि यदि फांसी देने से पहले यदि वर्जिन लड़कियों का रेप किया जाएगा तो उन्हें जन्नत नसीब नहीं होगी और न ही अल्लाह उन्हें अपने पास जगह देंगे। यह दिखाता है कि किस तरह धर्म का इस्तेमाल हिंसा को सही ठहराने के लिए किया गया।
आखिर में सरकार ने कबूला सच
जब संसद अध्यक्ष मेहदी करौबी ने जांच की मांग की, तो तत्कालीन उपाध्यक्ष माजिद अंसारी ने माना कि ये घटनाएं सच थीं और एक से ज्यादा बार हुई थीं। लेकिन सरकार ने इसके बारे में कभी खुलकर जानकारी नहीं दी कि असर में जेल के भीतर क्या हुआ था। बावजूद इसके सच बाहर आया।
आंकड़े क्यों नहीं मिल सकते
शादी सद्री बताती हैं कि सही संख्या बताना असंभव है क्योंकि रिवोल्यूशनरी कोर्ट्स के रिकॉर्ड तक पहुंच नहीं है, और अधिकांश पीड़ित जीवित नहीं बचे और जो बचे हैं वे अब गुमनामी में बची-कुची जिंदगी काट रहे हैं। वहीं जब सद्री से पूछा कि क्या जस्टिस फॉर ईरान यह अनुमान लगा सकता है कि फांसी से पहले कितनी महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था। उन्होंने कहा कि यह असंभव है: 'कोई भी मानवाधिकार समूह आपको आंकड़े या अनुमान नहीं दे सकता, जब तक कि उसे रिवोल्यूशनरी कोर्ट्स के अभिलेखागार तक पहुंच न मिले।'
यौन हिंसाओं का खुला खेल
फिर भी जांच से साफ होता है कि यह हिंसा नियमित और योजनाबद्ध थी, खासकर एविन, मशहद, शिराज और रश्त की जेलों में। यहां पहले बच्चियों को बड़ी उम्र की महिला कैदियों से अलग किया जाता। फिर अलग बैरक में अधिकारी स्तर के लोग अपनी-अपनी पसंद की बच्ची का चुनाव करते और उनके साथ अजीब-अजीब किस्म से शारीरिक संबंध बनाए जाते। जब अधिकारियों को मन भर जाता तो सिपाहियों को मौका मिलता। यहां तक कि जेल में काम करने वाले कुछ सफाई कर्मचारी भी इस अत्याचार में शामिल थे। जब सभी का मन भर जाता तो अंत में उन्हें सजा-ए-मौत दे दी जाती।
बच्चों तक नहीं बख्शा गया
कुछ महिला कैदियों के छोटे बच्चे भी जेल में बंद रहे। समीह तग़वायी नाम की बच्ची को 9 साल की उम्र में गिरफ्तार किया गया और 5 साल तक पूछताछ झेलनी पड़ी। बाद में उसे जबरन शादी के लिए मजबूर किया गया और 25 साल की उम्र में कैंसर से उसकी मौत हो गई। मरने से पहले उसने भी अपने बयान इन घटनाओं को लेकर दर्ज करवाए थे।
संयुक्त राष्ट्र की मान्यता
अब पहली बार संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि 1980 के दशक में ईरान की जेलों में कुंवारी लड़कियों के साथ फांसी से पहले बलात्कार किया गया। शादी सद्री का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत इन अपराधों के दोषियों पर दूसरे देशों में मुकदमा चलाया जा सकता है। यह संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।
एक दर्दनाक याद
1980 का दशक ईरान की सामूहिक स्मृति में आज भी एक खूनी और दर्दनाक अध्याय है-एक ऐसा सच, जिसे दबाने की कोशिश की गई, लेकिन जो आज भी जिंदा है।
इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।












Click it and Unblock the Notifications