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Iran Anti Women Laws: 9 साल में शादी- गवाही आधी, दुष्कर्म हुआ तो फांसी, खामेनेई के महिला विरोधी कानून- List

Iran Anti Women Laws: ईरान इन दिनों इस सदी के सबसे बुरे दौर को झेल रहा है। सुप्रीम लीडर अली खामेनेई 1 मार्च को मारे जा चुके हैं। बावजूद इसके इजरायल और अमेरिका, तेहरान समेत दूसरे उन सभी शहरों में बम बरसा रहे हैं जहां ईरानी सेना या मंत्रालय का कोई भी दफ्तर हो। जवाब में ईरान ने इजरायल समेत 8 मुस्लिम देशों पर मिसाइलें दागीं। जिनमें कुवैत, कतर, सऊदी अरब, UAE और बहरीन जैसे देश शामिल हैं। लेकिन इसी ईरान में महीनेभर पहले अली खामेनेई की सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन हुए थे, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुईं थी। जो बताता है कि वहां के कानून महिलाओं की आजादी को चुनौती देने वाले हैं। जानेंगे ईरान के महिला विरोधी कानूनों के बारे में।

महिलाओं को कंट्रोल करने वाले कानून

ईरान की कानूनी व्यवस्था इस्लामी शरिया कानून पर आधारित है। इसका मतलब है कि वहां के कानून धर्म की व्याख्या के मुताबिक बनाए जाते हैं। यही व्यवस्था लिंग के आधार पर जिम्मेदारी (पुरुष-महिला की सामाजिक भूमिका), पारिवारिक कानून, आपराधिक जिम्मेदारी, महिलाओं के लिए सख्ते ड्रेस कोड और नागरिक अधिकारों जैसे कई मुद्दों को कंट्रोल करती है।

Iran Anti Women Laws

9 साल में लड़की शादी

ईरान की नागरिक संहिता में शादी के लिए 18 साल की सार्वभौमिक न्यूनतम आयु तय नहीं है। वहां कई मामलों में उम्र को जैविक यौवन (Puberty) से जोड़ा गया है। कानून के मुताबिक, लड़की 9 चांद साल (लगभग 8 साल 9 महीने) और लड़का 15 चांद साल की उम्र में विवाह के योग्य माने जा सकते हैं। यह बात बच्चों के अधिकारों के लिहाज से गंभीर बहस का विषय है। क्योंकि इस उम्र में उनसे समझ और शारीरिक संबंधों की जानकारी की उम्मीद नहीं की जा सकती। ज्यादातर देशों में ये अपराध और 9 साल की बच्ची से कोई संबंध बनाता है तो उसे बलात्कार की श्रेणी में रखकर मुकदमा चलाया जाता है।

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अदालत की मंजूरी से कम उम्र में भी शादी

अगर माता-पिता सहमत हों या कोई जज अनुमति दे दे, तो तय उम्र से कम आयु में भी शादी हो सकती है। ईरान के सांख्यिकी केंद्र के आंकड़ों में सामने आया है कि हाल के सालों में 15 साल से कम उम्र की हजारों लड़कियों की शादी हुई है। इसी उम्र में बड़ी संख्या में बच्चों का जन्म भी दर्ज किया गया है, जिनमें शारीरिक विकृतियां देखी गईं।

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे कानून बच्चों की स्वायत्तता कम करते हैं, उन्हें शोषण के जोखिम में डालते हैं और अंतरराष्ट्रीय मानकों (जहां शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष मानी जाती है) से मेल नहीं खाते।

शादी के पहले सेक्सुअली एक्टिव होने पर फांसी

ईरान में ऐसे कुछ मामले भी सामने आए हैं जब लड़की ने शादी के पहले किसी के साथ संबंध बनाए हों तो उसे सार्वजनिक तौर पर कोड़े मारे गए, जेल हुई और फांसी भी दी गई। 2004 में हुआ अतीफा सहालेह केस इसका उदाहरण है। जब 16 साल की बच्ची को शादी के बिना संबंध बनाने पर सार्वजनिक तौर पर फांसी दी गई थी।

मायने नहीं रखती महिला की गवाही!

ड्रेस कोड और शादी के अलावा भी कई कानूनों में लैंगिक अंतर दिखता है। आपराधिक मामलों में अक्सर महिला की गवाही का मूल्य पुरुष की गवाही का आधा माना जाता है। अगर कोई महिला किसी पर हत्या की कोशिश का भी आरोप लगाए तो उसकी गवाही को तब तक तवज्जो नहीं दी जाती जब तक कोई पुरुष भी इस मामले में एक जैसी गवाही न दे।
हत्या या गैर-इरादतन हत्या के मामलों में "ब्लड मनी" (दियेह) यानी मुआवज़े की राशि महिला पीड़ित के लिए पुरुष पीड़ित की तुलना में आधी तय की जाती है। आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था कानूनी बराबरी के सिद्धांत के खिलाफ जाती है।

परिवार और काम से जुड़े फैसले

घरेलू कानूनों में पति को परिवार के निवास और पत्नी के रोजगार जैसे मामलों में अंतिम निर्णय का अधिकार होता है। पत्नी चाहकर भी कई बार इन फैसलों को अस्वीकार नहीं कर सकती। अगर पति मना कर दे तो पत्नी काम नहीं कर सकती। ह्यूमन राइट्स ग्रुप का कहना है कि तलाक, बच्चों की हिरासत और विरासत जैसे मामलों में भी महिलाएं कमजोर स्थिति में रहती हैं। उनके लिए मुआवजे का भी कोई खास प्रावधान नहीं है।

महिलाओं के खिलाफ प्रताड़ना को उकसाते कानून

ईरानी संसद ने कभी महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए एक मसौदा कानून पर बहस की थी। इसका मकसद पीड़ितों को बेहतर सुरक्षा और सेवाएं देना था। लेकिन कट्टरपंथी विरोध के बाद यह विधेयक वापस ले लिया गया। इससे घरेलू हिंसा, वैवाहिक बलात्कार और बाल विवाह जैसे मुद्दों पर कानूनी सुरक्षा अधूरी रह गई। ह्यूमन राइट्स कमीशन का कहना है कि कुछ प्रकार के दुर्व्यवहार को शरिया की व्याख्या के तहत मान्यता देने में झिझक दिखाई देती है।

हिजाब- कानूनी पाबंदी

ईरान में हिजाब यानी सिर ढकना सिर्फ एक सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि कानूनी अनिवार्यता है। हाल ही में संसद और गार्जियन काउंसिल की मंजूरी के बाद "हिजाब और पवित्रता" कानून लागू किया गया। ये अनिवार्यता 2022 के महसा अमीनी केस के बाद थोपी गई। 2022 में जब महसा के हिजाब से बाल दिखने लगे तो ईरान की मोरल पुलिस ने उसकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। दोबारा कोई महला ऐसा न करे, उसके लिए अली खामेनेई ये कानून लेकर आए थे।

इस कानून के तहत अगर कोई महिला या लड़की सार्वजनिक जगह पर सिर न ढके या "सादगी" के नियमों का पालन न करे तो उसे जुर्माना, जेल, यात्रा प्रतिबंध और सामाजिक दंड (सबके सामने कोड़े मारे जाना) का सामना करना पड़ सकता है।

15 साल तक की जेल और डिजिटल निगरानी

इन नियमों के अनुसार, बाल या शरीर को "उचित तरीके" से न ढकने पर जुर्माना और जेल दोनों हो सकते हैं। सज़ा मामूली नहीं है। कुछ मामलों में 15 साल तक की कैद, यात्रा पर रोक और ऑनलाइन गतिविधियों पर पाबंदी भी लग सकती है।
यह कानून सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर कथित नग्नता, अभद्रता या कानून के मुताबिक कपड़े न होने या ऐसे कपड़ों को प्रमोट करने पर भी कार्रवाई हो सकती है। अगर किसी पोस्ट या तस्वीर को सिर न ढकने को बढ़ावा देने वाला माना गया, तो वह भी अपराध बन सकता है।

पुलिस और एजेंसियों को बड़ी ताकत

इन नियमों को लागू करने के लिए पुलिस, सुरक्षा बल और खुफिया एजेंसियों को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। इतना ही नहीं, अगर किसी दुकान, मॉल या निजी व्यवसाय ने ड्रेस कोड का पालन नहीं कराया तो उसे भी जुर्माना या बंद करने जैसी कार्रवाई झेलनी पड़ सकती है।

मानवाधिकार समूहों का कहना है कि यह कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजी जीवन के अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। इसके प्रवर्तन में डिजिटल निगरानी और लोगों से शिकायत करवाने की व्यवस्था भी शामिल है।

महसा अमीनी और 'महिला, जीवन, स्वतंत्रता' आंदोलन

2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। उन्हें कथित तौर पर हिजाब नियम तोड़ने के आरोप में हिरासत में लिया गया था। इन प्रदर्शनों को महिला, जीवन, स्वतंत्रता आंदोलन के नाम से जाना गया। इसने थोपे गए ड्रेस कोड और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ व्यापक जन असंतोष को सामने लाया।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया जैसे BBC, Reuters और Al Jazeera ने इन विरोधों और सरकारी कार्रवाईयों पर विस्तृत रिपोर्टिंग की। गिरफ्तारियां, जुर्माने और निगरानी जैसे कदमों की खबरें लगातार सामने आती रही हैं।

अंतरराष्ट्रीय आलोचना और बहस

Amnesty International और Human Rights Watch जैसे संगठनों ने ईरान पर महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ सिस्टमेटिक भेदभाव का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि ये कानून अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समझौतों के तहत ईरान की जिम्मेदारियों से मेल नहीं खाते। दूसरी ओर, इन कानूनों के समर्थक तर्क देते हैं कि वे इस्लामी सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिए जरूरी हैं।

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अली खामेनेई और विवादित कानूनों का कनेक्शन

ईरान में हर फैसले के पीछे सुप्रीम लीडर की रजामंदी जरूरी होती है। अगर वह किसी कानून को हटा दे तो कोई संसद उसे लागू नहीं कर सकती। साथ ही, कोई कानून अगर सुप्रीम लीडर बनाना चाहे तो कोई उसे रोक नहीं सकता। अली खामेनेई पर पिछले 36 सालों से महिलाओं के खिलाफ इस तरह के कानूनों को हवा देने के आरोप लगते रहे हैं।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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