Iran America war: खत्म होगा AI का अमेरिकी दबदबा? ईरान ने पेश किया BI, क्या है ये बला और कितना है खतरनाक?

Iran America war: दुनिया इस समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की रेस में आगे बढ़ रही है, लेकिन ईरान ने अब इससे भी एक कदम आगे निकलने का दावा किया है। ईरानी साइंटिस्ट का कहना है कि उन्होंने बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस (BI) यानी जैविक बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है। यह तकनीक लैब में तैयार किए गए जीवित इंसानी न्यूरॉन्स (तंत्रिका कोशिकाओं) पर आधारित है। इस नई तकनीक को ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस (OI) कहा जा रहा है। अगर यह दावा सही साबित होता है, तो यह कंप्यूटिंग की दुनिया में बड़ा बदलाव ला सकता है।

क्या है ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस?

आज के कंप्यूटर सिलिकॉन चिप्स, कोडिंग और डिजिटल डेटा पर काम करते हैं। लेकिन ईरान का दावा है कि उसका नया सिस्टम जीवित इंसानी कोशिकाओं के नेटवर्क से चलता है। यानी इसमें ट्रेडिशनल कंप्यूटर चिप की जगह लैब में तैयार किए गए न्यूरॉन्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसी वजह से इसे 'जिंदा कंप्यूटर' भी कहा जा रहा है। इस तकनीक के सामने आने के बाद ईरान भी उन देशों की सूची में शामिल होने का दावा कर रहा है, जहां अब तक अमेरिका और पश्चिमी देश इस क्षेत्र में आगे माने जाते रहे हैं।

Iran America war

इंसानी दिमाग की तरह खुद सीख सकता है सिस्टम

ईरान की ब्रेन रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी टीम के मुख्य वैज्ञानिक अताउल्लाह पोर-अब्बासी के मुताबिक, साइंटिस्ट ने ऐसी स्वदेशी तकनीक विकसित की है, जिससे लैब में न्यूरॉन्स को जीवित रखा और विकसित किया जा सकता है। उनका दावा है कि ये कोशिकाएं इंसानी दिमाग की तरह काम करती हैं। सबसे खास बात यह है कि इस सिस्टम को किसी कोडिंग या पहले से लिखे गए प्रोग्राम की जरूरत नहीं पड़ती। यह अपने अनुभवों से खुद सीख सकता है, नई परिस्थितियों के हिसाब से खुद को बदल सकता है और चीजों को याद भी रख सकता है। यानी इसकी कार्यप्रणाली किसी छोटे बच्चे के सीखने की प्रक्रिया जैसी बताई जा रही है।

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सुपरकंप्यूटर से तेज और लाखों गुना कम बिजली की जरूरत

ईरानी साइंटिस्ट का दावा है कि यह जैविक प्रोसेसर एक साथ कई काम करने यानी पैरेलल प्रोसेसिंग में मौजूदा सुपरकंप्यूटर से भी ज्यादा प्रभावी हो सकता है। इंसानी दिमाग की तरह यह एक समय में कई तरह की जानकारी का विश्लेषण कर सकता है। ऊर्जा की खपत भी इसकी सबसे बड़ी खासियत बताई जा रही है। दावा है कि जहां एक सुपरकंप्यूटर को चलाने के लिए बहुत ज्यादा बिजली और बड़े कूलिंग सिस्टम की जरूरत होती है, वहीं यह जैविक प्रोसेसर करीब 10 लाख गुना कम बिजली में काम कर सकता है। यह जीवित कोशिकाओं की नैचुरल बॉयोलॉजिकल एनर्जी पर चलता है।

दुनिया क्यों हुई सतर्क?

ईरान के इस दावे के बाद सुरक्षा विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के बीच नई बहस शुरू हो गई है। वैज्ञानिक अताउल्लाह पोर-अब्बासी के मुताबिक, ईरान के एक ज्ञान-आधारित उद्यम ने इस तकनीक का शुरुआती लाइव प्रोटोटाइप भी तैयार कर लिया है। हालांकि इसे आम उपयोग वाले उपकरणों तक पहुंचने में अभी समय लगेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भविष्य में इस तकनीक का गलत इस्तेमाल हुआ, तो इससे ऐसे रोबोट बनाए जा सकते हैं जो इंसानों की तरह सोच सकें और खुद फैसले ले सकें। यही वजह है कि कई सुरक्षा विश्लेषक इसे संभावित सैन्य चुनौती के रूप में भी देख रहे हैं।

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फायदे भी बड़े, लेकिन खतरे भी कम नहीं

अगर यह तकनीक सफल होती है, तो इसका इस्तेमाल चिकित्सा, दिमाग से जुड़ी बीमारियों के इलाज, दवा खोज, रोबोटिक्स और जटिल डेटा विश्लेषण जैसे क्षेत्रों में बड़े बदलाव ला सकता है। वहीं दूसरी तरफ, वैज्ञानिक मानते हैं कि इतनी शक्तिशाली तकनीक के लिए सख्त अंतरराष्ट्रीय नियम और निगरानी भी जरूरी होगी, ताकि इसका दुरुपयोग न हो। फिलहाल ईरान का यह दावा दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि इस तकनीक की वास्तविक क्षमता और स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि भविष्य में होने वाले शोध और परीक्षणों के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो पाएगी।

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