तालिबान के खिलाफ पहली बार भारत के साथ आया पाकिस्तान! चीन और अमेरिका का भी मिला समर्थन
भारत, अमेरिका और चीन समेत 12 देशों ने संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय देशों के साथ तय किया है कि वो अफगानिस्तान में किसी भी ऐसी सरकार को समर्थन नहीं करेंगे, जो जबरदस्ती हथियारों के दम पर बनाई गई हो।
नई दिल्ली, अगस्त 14: ऐसा पहली बार हुआ है जब तालिबान के खिलाफ पाकिस्तान को कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा हो। लेकिन, भारत ने एक ऐसी चाल चली है, जिसमें ना चाहकर भी पाकिस्तान को फंसना पड़ा है। इतना ही नहीं, भारत के फैसले के साथ चीन और अमेरिका समेत 12 देशों ने भी दिया है। भारत ने तालिबान के खिलाफ सख्त रवैया अपना रखा है और भारत ने साफ कर दिया है कि वो अफगानिस्तान में बनने वाली किसी भी ऐसी सरकार को मान्यता नहीं देगा, जो बंदूक के बूते बनी हो।

भारत के साथ आए 12 देश
भारत, अमेरिका और चीन समेत 12 देशों ने संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय देशों के साथ तय किया है कि वो अफगानिस्तान में किसी भी ऐसी सरकार को मान्यता नहीं देंगे, जो जबरदस्ती हथियारों के दम पर बनाई गई हो। इसके साथ ही यूरोपीय संघ ने तालिबान को चेतावनी दी है कि, अगर वह हिंसा के माध्यम से सत्ता पर कब्जा कर लेता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा अलग कर दिया जाएगा। यूरोपीय संघ की विदेश नीति के प्रमुख जोसेप बोरेल ने कहा कि, "यदि सत्ता, शक्ति द्वारा ली जाती है और एक इस्लामी अमीरात फिर से स्थापित हो जाता है, तो तालिबान को गैर-मान्यता, अलगाव, अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी और अफगानिस्तान में निरंतर संघर्ष और लंबी अस्थिरता की संभावना का सामना करना पड़ेगा।" यानि, यूरोपीय संघ ने साफ कर दिया है कि तालिबान को मान्यता नहीं दी जाएगी।

तालिबान को मान्यता नहीं
आपको बता दें कि बैठक में भारत के अलावा अमेरिका, कतर, यूनाइटेड नेशंस, चीन, उज्बेकिस्तान, पाकिस्तान, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, जर्मनी, नॉर्वे, ताजिकिस्तान, तुर्की और तुर्कमेनिस्तान के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। जिसमें भारत ने कहा था कि सभी सदस्य देश यह सुनिश्चित करे कि काबुल में बनने वाली किसी भी ऐसी सरकार को मान्यता नहीं देंगे, जिसने सत्ता बंदूक की नोक पर हथियाई हो। भारत के इस विचार का अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों ने पूरी तरह समर्थन दिया। इस बैठक के दौरान अफगानिस्तान की खराब स्थिति को लेकर चर्चा की गई थी और इसकी मेजबानी कतर ने की थी। अमेरिका ने इस दौरान कहा कि ''सभी देश इस बात पर सहमत हैं कि अफगानिस्तान में शांति प्रयास की कोशिशों को और तेज करना चाहिए और सभी सदस्य देश इस बात पर भी सहमत हुए हैं कि वो सैन्य बल के जरिए काबुल में जबरदस्ती बनने वाली किसी भी सरकार को मान्यता नहीं देंगे''

मजबूरी में साथ आया पाकिस्तान
वहीं, तालिबान को अंदर ही अंदर जल्द समर्थन देने की कोशिश में लगे पाकिस्तान ने ऊपर से इस बैठक के दौरान भारत के विचारों का समर्थन किया है और पाकिस्तान की तरफ से भी कहा गया कि वो तालिबान को उस सूरत में समर्थन नहीं देंगे अगर वो काबुल की चुनी सरकार को बर्खास्त कर सत्ता पर कब्जा करता है। दरअसल, इस बैठक में यूरोपीय संघ के अलावा यूनाइटेड नेशंस भी शामिल है, लिहाजा पाकिस्तान के सामने दो बड़े डर हैं। यूरोपीयस संघ अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका पर नजर रखे हुए है और माना जा रहा है कि तालिबान का साथ देने की वजह से यूरोपीय संघ पाकिस्तान का स्पेशल व्यापारिक दर्जा खत्म कर दे, वहीं एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में पहले से ही मौजूद पाकिस्तान को अब ब्लैक लिस्ट में जाने का डर है, लिहाजा अब तक पाकिस्तान खुलकर तालिबान का समर्थन नहीं कर पाया है।

यूरोपीयन यूनियन ने की निंदा
यूरोपीय संघ की विदेश नीति के प्रमुख जोसेप बोरेल ने कहा कि, "यूरोपीय संघ का लक्ष्य अफगान लोगों के लिए अपनी साझेदारी और समर्थन जारी रखना है। हालांकि, समर्थन शांतिपूर्ण और समावेशी समझौते और महिलाओं, युवाओं और अल्पसंख्यकों सहित सभी अफगानों के मौलिक अधिकारों के सम्मान पर आधारित होगा।" उन्होंने जोर देकर कहा कि "यह महत्वपूर्ण है कि पिछले दो दशकों में महिलाओं और लड़कियों द्वारा किए गए महत्वपूर्ण लाभ को ध्यान में रखा जाए, जिसमें हर बालिका तक शिक्षा की पहुंच भी शामिल है"। इसके साथ ही यूरोपीय यूनियन ने तालिबान के द्वारा की जा रही हिंसा की काफी निंदा की है।

पलट जाएगा चीन-पाकिस्तान ?
हालांकि, क्षेत्रीय सम्मेलन में पाकिस्तान और चीन ने भले ही कहा हो कि तालिबान को मान्यता नहीं देंगे, लेकिन चीन से मिल रही रिपोर्ट के मुताबिक चीन ने तय कर लिया है कि काबुल पर कब्जा होते ही वो तालिबान को मान्यता दे देगा। वहीं, बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान भी तालिबान को मान्यता देने की कोशिश में है और दोनों देश उस वक्त का इंतजार कर रहे हैं जब तालिबान काबुल कर लेता। चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी और तालिबानी नेताओं के बीच पिछले महीने बीजिंग में मुलाकात हुई थी और माना जा रहा है कि उसी बैठक में तालिबान और चीन के बीच समझौता हुआ है। वहीं, बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में इस बात की जल्दी है कि वो कब तालिबान को मान्यता दे दे। लिहाजा, इस बैठक में पाकिस्तान और चीन ने भले ही भरोसा दिया हो कि वो तालिबान को मान्यता नहीं देगा, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि चीन-पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।

लगातार बढ़ता तालिबान
अफगानिस्तान में तालिबान का कहर लगातार जारी है। तालिबान ने अफगानिस्तान के दूसरे सबसे बड़े शहर कंधार समेत और अब सूबे की राजधानी हेरात पर कब्जा कर लिया है। ऐसे में अब अफगानिस्तान सरकार के कब्जे में सिर्फ राजधानी काबुल और कुछ अन्य हिस्से ही बचे हैं। तालिबान के प्रवक्ता ने ट्वीट करके दावा किया है कि कंधार को पूरी तरह से जीत लिया गया है, मुजाहिदीन शहर में मार्टर्स स्क्वायर पहुंच गए हैं। वहीं अमेरिका ने ऐलान किया है कि वह अपने सैनिकों को अफगानिस्तान भेजेगा और अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अमेरिकी दूतावास में फंसे लोगों को बाहर निकालेगा। पेंटागन के प्रेस सेक्रेटरी जॉन किर्बी ने बताया कि 3 बटालियन काबुल एयरपोर्ट पर अगले 24-48 घंटों के भीतर पहुंचेगी, जिसमे तकरीबन 3000 सैनिक होंगे। यह अस्थायी मिशन है और इसका लक्ष्य छोटा है, हमारे कमांडर्स को अपनी रक्षा का अधिकार है और उनपर किसी भी तरह के हमले का पुख्ता जवाब दिया जाएगा।












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