ग्लोबल साउथ समिट की मेजबानी करेगा भारत, जानिए नेहरू की गुटनिरपेक्षता से कितनी अलग है मोदी की नीति
ग्लोबल साउथ समिट कुछ और नहीं बल्कि तीसरी दुनिया के देशों का जुटान है। तीसरी दुनिया के ये सभी देश किसी न किसी यूरोपीय देशों के गुलाम रहे हैं और अब तक राजनतिक-सांस्कृतिक रूप से हाशिए पर रहे हैं।

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भारत 12-13 जनवरी को 'वॉयस आफ गलोबल साउथ' शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। इस सम्मेलन का मुख्य विषय 'यूनिटी आफ वॉयस, यूनिटी आफ पर्पस' है। भारत ने इस कार्यक्रम में 120 देशों को आमंत्रित किया है। इस वर्चुअल समिट में विकासशील देशों को अपने मुद्दों, चिंताओं और प्राथमिकताओं को रखने का मौका मिलेगा।

पीएम मोदी करेंगे कार्यक्रम की अध्यक्षता
इस सम्मेलन में भारत के किन किन पड़ोसी देशों को आमंत्रित किया गया है, इसकी आधिकारिक जानकारी अभी तक नहीं मिल पाई है। हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि इसमें बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और श्रीलंका के राष्ट्रपति रनिल विक्रमसिंघे समेत दुनिया और बड़े नेता शामिल हो सकते हैं। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता पीएम नरेंद्र मोदी करेंगे। भारत के विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने शुक्रवार को कहा कि इस शिखर सम्मेलन की संकल्पना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘‘सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास'' तथा भारत के ‘वसुधैव कुटुम्बकम' के मंत्र से प्रेरित है।

तीसरी दुनिया के देशों का हो रहा जुटान
ग्लोबल साउथ का आशय व्यापक रूप से एशिया, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका सहित ओशिनियाई देशों के लिए लिया जाता है। दूसरे अर्थों में कहें तो इसमें उत्तरी अमेरिका और यूरोप को छोड़ हर महाद्वीप के देश शामिल होते हैं। हालांकि चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, इजरायल जैसे देशों को इसमें शामिल नहीं किया जाता है। ऐसे में जाहिर है कि ग्लोबल साउथ समिट कुछ और नहीं बल्कि तीसरी दुनिया के देशों का जुटान है। तीसरी दुनिया के ये सभी देश किसी न किसी यूरोपीय देशों के गुलाम रहे हैं और अब तक राजनतिक-सांस्कृतिक रूप से हाशिए पर रहे हैं।

गुटनिरपेक्ष से कितना करीब है ग्लोबल साउथ?
बीबीसी की खबर के मुताबिक ग्लोबल साउथ में वहीं देश शामिल हैं जो गुटनिरपेक्ष संस्था का हिस्सा रहे हैं और भारत यूक्रेन संकट के बाद ग्लोबल साउथ को लेकर उसी लहजे में बात कर रहा है, जो बातें गुटनिरपेक्ष नीति में लंबे समय से कही जाती रही है। हम सभी जानते हैं कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन शीत युद्ध के समय शुरू हुआ था और भारत इसका अहम सदस्य था। यह उन देशों की संस्था है जिन्होंने तय किया था कि वे शीत युद्ध के दौरान किसी भी पावर ब्लॉक के साथ या विरोध में नहीं रहेंगे।

भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक सदस्य
भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल नासिर, युगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णों और घाना के राष्ट्रपति एनक्रूमा ने मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत की थी। इसकी स्थापना 1961 में हुई थी। 2012 तक 120 देश हैं जो कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन का हिस्सा बन चुके हैं। इस संस्था का अहम सदस्य होने के बावजूद भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी अब तक इसके किसी भी आयोजन में शामिल नहीं हुए हैं। 2016 में वेनेजुएला सम्मेलन में भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और 2019 में बाकू समिट में तत्कालीन उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

गुटनिरपेक्ष सम्मेलन से दूर रहे पीएम मोदी
नरेंद्र मोदी ऐसे पहले पूर्णकालिक प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में शामिल होने की परंपरा तोड़ी थी। भले ही भारतीय पीएम ने गुटनिरपेक्ष सम्मेलन को उतना महत्व नहीं दिया हो लेकिन जिस प्रकार यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने अमेरिका और रूस दोनों ही देशों के साथ संबंध साधे रखा, यह दर्शाता है कि पीएम मोदी के दौर में भारत की नीति, गुटनिरपेक्ष की तरह किसी भी देश के साथ खड़े रहने या विरोध करने की नहीं बल्कि सभी के साथ रहकर अपने हितों को साधने की है। ऐसे में ग्लोबल साउथ समिट को मोदी सरकार का गुटनिरपेक्ष सम्मेलन कहा जाए तो इसमें कोई अनोखी बात नहीं है।












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