लगातार गिर रहा है भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, क्या अर्थव्यवस्था के सिकुड़ने के संकेत हैं?
भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक, पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले भारत पर विदेशी कर्ज में 47.1 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है और इस वित्तीय वर्ष में भारत पर कुल विदेशी कर्ज बढ़कर 620.7 अरब डॉलर हो गया है।
नई दिल्ली, जुलाई 09: वैश्विक मंदी की आहट के बीच एक जुलाई को खत्म हुए हफ्ते में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 5 अरब डॉलर खत्म हो गया है, जो एक अच्छी खबर नहीं कही जा सकती है और इसके पीछे की वजह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने स्थानीय इक्विटी से निवेश वापस लेना है, जिसकी वजह से पहली बार ऐसा हुआ है, कि डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 79 के आंकड़े को पार कर गया है। अर्थशास्त्रियों ने कहा कि, भारतीय रिजर्व बैंक ने 6 जुलाई को पूंजी प्रवाह को आकर्षित करने के कदमों के साथ रुपये की गिरावट रोकने की कोशिश की, लेकिन विदेशी मुद्रा मांग और आपूर्ति असंतुलन के उपाय करने में अभी और वक्त लगेगा।
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विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार कमी
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि, 1 जुलाई को भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार 588.314 अरब डॉलर था। इसमें से विदेशी मुद्रा संपत्ति 524.745 अरब डॉलर थी, जबकि सोने में रखे गए भंडार का मूल्य 40.422 अरब डॉलर था। शेष राशि को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास स्पेशल ड्रॉविंग राइट्स और रिजर्व के रूप में रखा जाता है। भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार में पिछले साल 3 सितंबर के बाद से लगातार कमी हो रही है और 3 सितंबर 2021 को भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार में 642.453 अरब डॉलर की राशि जमा थी, जिसमें अभी तक 55 अरब डॉलर की गिरावट आ चुकी है। वहीं, भारत के केंद्रीय बैंक ने फरवरी से अब तक मुद्रा की रक्षा के लिए 46 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए हैं।

'आरबीआई के उपायों का असर देर से'
इस साल 22 जून तक भारत का एफपीआई ऑउटफ्लो 28.5 अरब डॉलर था, जो वैश्विक आर्थिक मंदी की आहट के बीच दुनिया के दूसरे उभरते बाजारों के अनुरूप ही था। वहीं, बार्कलेज ने कहा है कि, ऋण पूंजी को आकर्षित करने के लिए आरबीआई के उपाय मौलिक रूप से अच्छे हैं, लेकिन इसका असर होने में कुछ समय लग सकता है क्योंकि रुपये पर दबाव मुख्य रूप से बड़े चालू खाते के घाटे से आ रहा है, न कि केवल पूंजी के ऑउटफ्लो से। इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, बार्कलेज के अर्थशास्त्री राहुल बाजोरिया ने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा था कि, "विदेशी मुद् भंडार पर मौलिक दबाव कुछ समय के लिए बना रह सकता है, शायद तब तक जब तक हम कमोडिटी की कीमतें में कोई सुधार ना देंखें'।

रुपये का गिरना रह सकता है जारी
भारतीय करेंसी रुपया, जो रिकॉर्ड स्तर 80 के करीब है, उसके आने वाले वक्त में भी उसके सुधरने के संकेत नहीं दिख रहे हैं और विदेशी कर्ज के भुगतान की वजह से आने वाले वक्त में रुपये का फिसलना और भी तेज रफ्तार से जारी रह सकता है। भारत के सामने मुसीबत सिर्फ इतना नहीं है, कि विदेशी कर्ज काफी ज्यादा हो चुका है, इसके साथ ही भारत के व्यापार घाटे में भी जून महीने में भारी इजाफा हो गया है और इस वजह से भी रुपये पर प्रेशर बढ़ा है।

विदेशी कर्ज ने बढ़ाई परेशानी
भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक, पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले भारत पर विदेशी कर्ज में 47.1 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है और इस वित्तीय वर्ष में भारत पर कुल विदेशी कर्ज बढ़कर 620.7 अरब डॉलर हो गया है। हालांकि, पिछले वित्तीय वर्ष से तुलना करें, तो विदेशी कर्ज हमारी कुल जीडीपी का 19.9 प्रतिशत रह गया था, जो उससे पिछले वित्त वर्ष यानि 2020-21 में 21.2 प्रतिशत था। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के ऊपर दीर्घकालिक कर्ज (मूल परिपक्वता एक साल से ज्यादा) 499.1 अरब डॉलर हो गया है, जो मार्च 2021 की तुलना में 26.5 अरब डॉलर ज्यादा है। जबकि, इस वित्तीय वर्ष में भारत पर अल्पकालिक कर्ज में 19.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो एक साल पहले 17.6 प्रतिशत था। लेकिन, अल्पकालिक कर्ज ने ही भारत सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर दी है, क्योंकि भारत को इस साल ही अल्पकालिक ऋण का भुगतान करना है।

भारत को कितना विदेशी कर्ज चुकाना है?
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि, भारत पर जो कुल करीब 621 अरब डॉलर का कर्ज है, उसका करीब 40 प्रतिशत हिस्सा, यानि 267 अरब डॉलर का विदेशी ऋण भारत सरकार को अगले 9 महीने में चुकाने हैं और भारत के लिए ये एक बहुत बड़ी चुनौती है। यह पुनर्भुगतान भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के लगभग 44% के बराबर है। यानि, भारत अगर इस कर्ज को चुकाता है, तो भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार काफी तेजी से नीचे आ जाएगा और भारत में दैनिक सामानों की कीमत में भारी इजाफा हो सकता है। वहीं, करेंसी टेंडर्स का कहना है कि, कई कॉरपोरेट्स ने अमेरिकी डॉलर में मूल्यवर्ग के ऋण को चुकाने के लिए या तो नए सिरे से ऋण लिया है, या संचित निर्यात आय के साथ समझौता किया होगा, लेकिन इन फंडों को चुकाने की कम समय अवधि रुपये पर दबाव डाल सकती है।

तो रुपये के गिरने की रफ्तार भी होगी तेज...
डीबीएस बैंक इंडिया के प्रबंध निदेशक आशीष वैद्य ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि, "मौजूदा स्थानीय मैक्रो सेटअप मुख्य रूप से तेल आयात के कारण रिकॉर्ड चालू खाता घाटे से प्रेरित है।" उन्होंने कहा कि, "इसके साथ-साथ, उच्च अमेरिकी रेट ट्रेजेक्टरी और जोखिम लेने की भावना भी घटी है, जिसकी वजह से अमेरिकी डॉलर मजबूत हो रहा है और भारतीय रुपये पर इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है। आशीष वैद्य ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि, 'विदेशी कर्ज की मैच्योरिटी पूरा होने की वजह से भारतीय रुपये पर प्रेशर और भी ज्यादा बढ़ जाएगा'। उन्होंने कहा कि, 'अगले तीन से 6 महीनों के बीच स्थिति खराब हो सकती है और बाजार में अस्थिरता पैदा हो सकती है, हालांकि, उसके बाद इसमें सुधार का दिखना शुरू हो जाएगा'

व्यापार घाटे में भी भारत ने बनाया रिकॉर्ड
ताजा आंकड़ों से पता चला है कि, भारत का व्यापार घाटा सिर्फ जून महीने में बढ़कर रिकॉर्ड 25.63 अरब डॉलर हो गया है, जो भारत सरकार के लिए बड़ा टेंशन है, क्योंकि भारत सरकार की कोशिश लगातार व्यापार घाटे को पाटने की रही है, ताकि देश का निर्यात बढ़ाने के साथ साथ विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाया जाए, लेकिन इस पहल में सरकार को बड़ा झटका लगा है। रिकॉर्ड व्यापार घाटे के पीछे की सबसे बड़ी वजह पेट्रोलियम, कोयले और सोने के आयात में भारी बढ़ोतरी को बताया जा रहा है, वहीं जून महीने में भारत के निर्यात में भारी गिरावट भी दर्ज की गई है, जिससे रुपये में और गिरावट आई है और बड़े करेंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) के बारे में चिंता बढ़ गई है। सोमवार को जारी भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों से पता चला है कि, जून में भारत का व्यापारिक निर्यात 16.8% बढ़कर 37.9 अरब डॉलर हो गया है, जो मई के मुकाबले 20.5% से कम था, जबकि भारत के आयात में 51% का उछाल आया है और जून महीने में भारत का आयात बढ़कर 63.58 अरब डॉलर हो गया है। वहीं, पिछले साल से तुलना करें, तो साल 2021 के जून महीने में भारत का व्यापार घाटा 9.61 अरब डॉलर था।
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