अमेरिका के दो दुश्मनों के साथ मिलकर भारत ने बनाया अहम इकोनॉमिक कॉरिडोर, जानें क्या है INSTC?
यूक्रेन पर रूसी आक्रमण से पहले ये होता था, कि रूस से सामान मंगवाने के लिए भारत जर्मनी के रास्तों का इस्तेमाल किया करता था, जो भारत के लिए महंगा पड़ता था। लेकिन, पिछले महीने बड़ी सहमति बनी है।
नई दिल्ली, जुलाई 27: जून महीने में अमेरिका समेत पूरा यूरोप ये सोचकर टेंशन में रहा, कि लाल सागर को घेरकर यूक्रेनी अनाज के निर्यात पर रूस नाकेबंदी लगा सकता है, लेकिन रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था, और वो बात थी, एक अलग व्यापार मार्ग का निर्माण करना। कैस्पियन सागर से संबंध रखने वाले राष्ट्रों के नेताओं को संबोधित करते हुए रूसी राष्ट्रपति ने इसे "वास्तव में महत्वाकांक्षी परियोजना" बताई, जो "क्षेत्र के परिवहन और रसद आपूर्ति में सुधार" के लिए मॉस्को के अहम प्रयास को केन्द्र में रखता है।

क्या है INSTC?
आईएनएसटीसी का पूरा नाम इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर है और ये कॉरिडोर 7200 किलोमीटर का गलियारा है और इस रूट में रूस के दो सबसे अच्छे दोस्त आते हैं, ईरान और भारत। आईएनएसटीसी कॉरिडोर ईरान के रास्ते से रूस और भारत को जोड़ने वाले रेलमार्गों, राजमार्गों और समुद्री मार्गों का 7,200 किलोमीटर लंबा नेटवर्क है। और अब रूसी राष्ट्रपति ने पश्चिमी देशों को उन्हीं की भाषा में जवाब देने के लिए इसे फिर से एक्टिव कर दिया है। हालांकि, विश्लेषकों के अनुसार, यह पुरानी शराब आखिरकार मॉस्को, तेहरान और नई दिल्ली द्वारा बिना लाइसेंस के तैयार किया गया है। रूस पर लगाए गये सख्त पश्चिमी प्रतिबंधों की वजह से रूस का कई देशों के साथ संपर्क बाधित हो गया है और कई देश पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ भी नहीं जा सकते हैं, जिनमें खुद भारत भी शामिल है, लेकिन आईएनएसटीसी इन प्रतिबंधों से अछूता है और मास्को के लिए एक ऐसा संगम रास्ता बन गया है, जिसके जरिए रूस काफी आसानी से व्यापार कर सकता है।

आईएनएसटीसी से सामान मंगवा रहा भारत
यूक्रेन पर रूसी आक्रमण से पहले ये होता था, कि रूस से सामान मंगवाने के लिए भारत जर्मनी के रास्तों का इस्तेमाल किया करता था, जो भारत के लिए महंगा पड़ता था। लेकिन, पिछले महीने आईएनएसटीसी मार्ग का इस्तेमाल करने को लेकर रूस भारत और ईरान में सहमति बन गई और जून महीने में पहली बार आईएनएसटीसी कॉरिडोर का इस्तेमाल करते हुए भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर बंदर अब्बास के बंदरगाह के माध्यम से आईएनएसटीसी का उपयोग करके रूस से सामान मंगवाया। अरब सागर के बंदरगाह न्हावा शेवा से होकर गुजरने वाले आईएनएसटीसी मार्ग के जरिए भारत ने रूस से जून महीने में 39 कंटेनरों से भरे शिप को मंगवाया। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय की पूर्व सलाहकार वैशाली बसु शर्मा ने अलजजीरा से कहा कि, यह तो बस शुरुआत है। इस महीने की शुरुआत में, पूर्व सोवियत देशों और बाल्टिक्स में सबसे बड़े मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर RZD लॉजिस्टिक्स ने INSTC के साथ एक नई कंटेनर ट्रेन सेवा शुरू की है। और 2030 तक, INSTC कॉरिडोर में हर साल लगभग 25 मिलियन टन माल ढुलाई की क्षमता होने की उम्मीद है, जो यूरेशिया, दक्षिण एशिया और खाड़ी देशों के बीच कुल कंटेनर यातायात का 75 प्रतिशत होगा।

'INSTC कॉरिडोर पर गंभीर है मॉस्को'
अलजजीरा से बात करते हुए डेजान शिरा एंड के संस्थापक, जो एशियाई व्यापार और निवेश परामर्श संस्था है, क्रिस डेवोनशायर एलिस ने कहा कि, "ये पूर्व में निर्माण किए गये नए मार्ग हैं, और मॉस्को इन्हें लागू करने के बारे में बहुत गंभीर है, खासकर यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के बने रहने की संभावनाओं के बीच, और यूक्रेन संघर्ष खत्म होने के बाद भी रूस इसे बनाए रखेगा, ऐसी उम्मीद है।" INSTC के पीछे का तर्क सरल है। उन्होंने कहा कि, ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए, तो रूस से भारत तक सामान पहुंचने के लिए कोई साधारण मार्ग नहीं है, बल्कि भारत से रूस तक माल को पहुंचने के लिए अरब सागर, लाल सागर और भूमध्य सागर को पार करना पड़ता है और फिर पश्चिमी यूरोप के चारों ओर गुजरना पड़ता है और फिर अंत में जर्मनी के सेंट पीटर्सबर्ग पहुंचने के लिए बाल्टिक सागर से गुजरना पड़ता है। लेकिन, भारत अगर आईएनएसटीसी का इस्तेमाल करता है, जो मध्य एशिया, कैस्पियन सागर, ईरान और अंत में अरब सागर होते हुए ये कॉरिडोर गुजरती है और 7200 किलोमीटर का रास्ता बनाती है, जिससे भारत को काफी फायदा पहुंचता है। पहले वाले रास्ते में भारत तक सामान पहुंचने में 40 से 60 दिनों का वक्त लगता था, मगर इस नये कॉरिडोर से सामान पहुंचने में सिर्फ 25-30 दिन ही लगेंगे और माल ढुलाई में लागत करीब 30 प्रतिशत तक कम हो जाएगी, जो एक बड़ा फायदा है।

भारत के लिए INSTC का रणनीतिक महत्व भी
भारत के लिए INSTC कॉरिडोर रणनीतिक महत्व भी रखता है, क्योंकि यह कट्टर दुश्मन पाकिस्तान को सीधे तौर पर दरकिनार करते हुए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच प्रदान करता है। साल 2016 में भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तेहरान यात्रा के दौरान ईरान के चाबहार बंदरगाह पर बर्थ विकसित करने के लिए 85 मिलियन डॉलर निवेश और 150 मिलियन डॉलर का सॉफ्ट लोन ईरान को देने की घोषणा की थी। नई दिल्ली चाहता है कि आईएनएसटीसी में चाबहार को भी शामिल कर लिया जाए और अगर ऐसा होता है, तो ईरान के चाबहार पोर्ट, जिसे भारत ने बनाया है, वो एक महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग बन जाएगा, जिससे आने वाले वक्त में भारत को काफी ज्यादा फायदा होगा।

तेजी से बदल रही हैं प्राथमिकताएं
अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों का कहना है कि इस आकर्षण के बावजूद, आईएनएसटीसी अब तक रूस और भारत के लिए प्राथमिकता नहीं थी, क्योंकि अभी तक रूस के लिए यूरोप ही सबसे बड़ा व्यापारिक फोकस था और यूरोपीय संघ ने 2020 में रूस के व्यापार में एक तिहाई से अधिक का योगदान दिया था। वहीं, नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर यूरोपियन स्टडीज के प्रोफेसर गुलशन सचदेवा ने अल जज़ीरा को बताया कि, "रूस की अधिकांश आपूर्ति श्रृंखला यूरोप को पूरा करने के लिए बनाई गई है।" भारत ने भी पिछले दो दशकों में बड़े पैमाने पर पश्चिमी देश, चीन और दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार के विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया है। ईरान पर पश्चिमी प्रतिबंधों ने INSTC में निवेश की संभावना को काफी जटिल बना रखा है, लेकिन अब परिस्थितियां काफी बदल गई हैं और पश्चिमी प्रतिबंधों ने यूरोपीय रास्ते रूस के लिए बंद कर दिए हैं, लिहाजा अब रूस की प्राथमिकतां भी तेजी से बदल रही हैं। सचदेवा ने कहा कि पिछले कई सालों से भारत-रूस द्विपक्षीय व्यापार का लगभग स्थिर स्तर बना हुआ है, जो सालाना आठ अरब डॉलर से 11 अरब डॉलर के बीच मंडरा रहा है, लेकिन INSTC की वजह से अब इस व्यापार में तेजी से इजाफा होगा।

भारत-रूस व्यापार में 272% का उछाल
पिछले कुछ महीने से INSTC कॉरिडोर को लेकर रूस में भी मांग काफी तेजी से बढ़ी और भारत के साथ व्यापार भी। अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल और मई महीने में रूस से भारत के आयात में लगभग 272 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और दोनों देशों के बीच का व्यापार जो अभी तक 8-11 अरब डॉलर के बीच रहता था, वो सिर्फ दो महीने में ही 5 अरब डॉलर को पार कर दिया गया है। हालांकि, इसमें भारत ने सबसे ज्यादा कच्चे तेल का आयात रूस से किया है, जो भारत को कम कीमत पर मिल रही है। इसके साथ ही भारत ने रूसी ऊर्वरकों का आयात भी 800 प्रतिशत बढ़ा दिया है। सचदेवा ने कहा कि, व्यापार में तेज वृद्धि आईएनएसटीसी के लिए अवधारणा के प्रमाण के रूप में कार्य करती है। उन्होंने कहा कि, "राजनीतिक और आर्थिक रूप से तीनों देशों ने मिलकर आखिरकार INSTC के लिए गठबंधन कर ही लिया है'।

अमेरिका का प्रेशर
हालांकि, आईएनएसटीसी कॉरिडोर के लिए बने इस गठबंधन पर अमेरिका का काफी ज्यादा प्रेशर है और विशेषज्ञों ने कहा कि, नई दिल्ली, पहले से ही रूसी तेल के बढ़ते आयात को लेकर वाशिंगटन और ब्रसेल्स के साथ तनावपूर्ण स्थिति में है और अगर भारत आईएनएसटीसी पर भी गठबंधन में शामिल हो रहा है, तो पश्चिमी देशों का काफी ज्यादा दबाव भारत की तरफ आएगा। हालांकि, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक शर्मा ने सुझाव दिया कि, पश्चिम से भारत पर जितना दबाव बनाया जा गया है, अब भारत उनसे थक गया है। उन्होंने कहा कि, अतीत में भारत ने अमेरिका के अनुरोध पर ईरान और वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दिया था, लेकिन अब पता चल रहा है, कि अमेरिका खुद वेनेजुएला का तेल यूरोप तक पहुंचने की अनुमति दे रहा है। शर्मा ने अल जज़ीरा को बताया कि, भारत और रूस के बीच बढ़े हुए व्यापार और आईएनएसटीसी पर ध्यान केंद्रित करने से पता चलता है कि "उभरती अर्थव्यवस्थाएं अंततः विकसित देशों द्वारा बनाई गई वित्तीय संरचनाओं के आधिपत्य को तोड़ रही हैं।"

अमेरिका का कितना प्रेशर भारत पर आएगा?
ऑस्ट्रियन इंस्टीट्यूट फॉर यूरोपियन एंड सिक्योरिटी पॉलिसी की निदेशक वेलिना त्चाकारोवा ने अलजजीरा से कहा कि, इस बात की भी सीमाएं हैं कि वाशिंगटन भारत पर कितना दबाव बना सकता है। उन्होंने अल जज़ीरा से कहा कि, "अमेरिका को ड्रैगनबियर [गहन चीन-रूस गठबंधन का एक संदर्भ] का सामना करते हुए भारत की ज्यादा जरूरत है, जबकि भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का सामना करने के लिए वाशिंगटन की आवश्यकता है।" उन्होंने कहा कि, अन्य चुनौतियां भी बनी रहती हैं। रूस और ईरान पर लगे प्रतिबंध आईएनएसटीसी में निवेश को जोखिम भरा बना रहे हैं। वहीं, वैशाली बसु शर्मा ने कहा कि, इस कॉरिडोर को अभी भी कई स्वतंत्र रूप से संचालित रेल, सड़क और समुद्री परियोजनाओं का एक पैचवर्क है, जिसमें एक भी ऑपरेटर प्रभारी नहीं है। फिर भी, डेवोनशायर-एलिस ने कहा कि,अन्य घटनाक्रम बताते हैं कि INSTC अब न केवल रूस, भारत और ईरान के लिए, बल्कि कई अन्य देशों के लिए भी एक प्राथमिकता है और इस गलियारे को लेकर जॉर्जिया, अजरबैजान, कजाकिस्तान और तुर्की ने इस वर्ष के लिए हस्ताक्षर किए हैं।












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