भारत ने चेन्नई के बाद कोचीन शिपयार्ड का दरवाजा भी अमेरिकी युद्धपोतों के लिए खोला, समझिए क्या है स्ट्रैटजी
US Navy Warships Indian Shipyard: भारत ने अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत की मरम्मत और रखरखाव के लिए अपना दूसरा शिपयार्ड भी खोल दिया है। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL), जो भारत के दूसरे स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण करेगा, वो अब अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों की मरम्मत का काम भी करेगा।
इससे पहले भारत सरकार ने पिछले साल अमेरिकी नौसेना के लिए चेन्नई में लार्सन एंड टुब्रो (L&T) शिपयार्ड के साथ पांच साल के मास्टर शिपयार्ड मरम्मत समझौते (MSRA) पर हस्ताक्षर किए थे। जिसके तहत चेन्नई शिपयार्ड में अब अमेरिकी युद्धपोतों की मरम्मत हो सकती है और अब दूसरे शिपयार्ड का भी दरवाजा भारत ने खोल दिया है।

कोचीन शिपयार्ड पर अमेरिकी युद्धपोतों की मरम्मत
भारत के पूर्वी तट पर चेन्नई के पास कट्टुपल्ली में एल एंड टी शिपयार्ड सैन्य सीलिफ्ट कमांड जहाजों की यात्रा के दौरान मरम्मत का काम कर रहा है और यहां पर पिछले साल से ही अमेरिकी नौसेना के जहाजों की मरम्मत का काम शुरू हो चुका है।
CSL के साथ किया गया नवीनतम समझौता, अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों को भारत के पूर्वी और पश्चिमी दोनों तटों पर मरम्मत करने के लिए एक शिपयार्ड मुहैया करता है। 6 अप्रैल को सीएसएल ने घोषणा की है, कि उसने यूनाइटेड स्टेट्स नेवी के साथ मास्टर शिपयार्ड रिपेयर एग्रीमेंट (MSRA) पर हस्ताक्षर किए हैं।
MSRA एक गैर-वित्तीय समझौता है और CSL में मिलिट्री सीलिफ्ट कमांड के तहत अमेरिकी नौसेना के जहाजों की मरम्मत की सुविधा प्रदान करेगा।
CSL पहले से ही भारत के युद्धपोतों आईएनएस विराट और आईएनएस विक्रमादित्य के साथ साथ भारतीय नौसेना के भारतीय स्वदेशी एयकरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत का रखरखाव और मरम्मत करता रहा है। यह शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के टैंकरों और थोक वाहकों की मरम्मत भी करता है।
मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि भारत की कोशिश CSL को समुद्री केन्द्र के तौर पर विकसित करने की है, जहां समुद्री जहाजों की मरम्मत और रखरखाव का काम किया जा सके।
यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में भारत के रिटायर्ड पूर्व एडमिरल एबी सिंह, जिन्होंने पश्चिमी नौसेना कमान की जिम्मेदारी संभाली है, उन्होंने कहा है, कि "अन्य सक्षम एजेंसियां कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (सीएसएल) और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) हैं, लेकिन इन दोनों की समुद्री गहराई सीमित है।"
वाइस एडमिरल सिंह ने कहा, कि केरल में विकसित होने वाले आगामी विझिंजम इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट डीपवाटर मल्टीपर्पज सीपोर्ट की वजह से सीएसएल और एमडीएल व्यवहार्य प्रस्ताव बन सकते हैं।
विदेशी जहाजों के लिए सेंटर बन रहा भारत
अमेरिका और ब्रिटिश जहाजों के मरम्मत का काम अब भारत के शिपियार्ड्स में हो सकते हैं, जो भारत की चीन को लेकर रणनीति को दर्शाता है। डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है, कि इस स्ट्रैटजी से लगातार चीन और ब्रिटेन के युद्धपोत भारतीय समुद्रों में विचरण करते रह सकते हैं, जो भारत और सहयोगी देशों की शक्ति को प्रदर्शित करता है।
CSL ने भारत के पहले एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण किया है, जिसे 2022 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। भारतीय नौसेना ने पहले ही रक्षा मंत्रालय को एक प्रस्ताव प्रस्तुत कर दूसरे स्वदेशी विमान वाहक के उत्पादन और खरीद के लिए मंजूरी मांगी है, जिसके निर्माण का प्रस्ताव कोच्चि CSL में करने की कोशिश है।
जहाज की मरम्मत के लिए चेन्नई एक अच्छी जगह है, क्योंकि एलएंडटी शिपयार्ड में बंदरगाह बुनियादी ढांचा (अमेरिकी जहाजों के लिए गहराई की बड़ी आवश्यकता के कारण) और एक सक्षम इकाई (एलएंडटी) दोनों उपलब्ध हैं। यूएस नेवी का पहला युद्धपोत, यूएसएनएस साल्वोर, स्टील की मरम्मत के लिए पहले ही शिपयार्ड में पहुंच चुका है।
यहां तक कि, अब ब्रिटेन भी मौके का फायदा उठा रहा है और पहली बार, दो ब्रिटिश जहाज, रॉयल फ्लीट ऑक्जिलरी (आरएफए) आर्गस और आरएफए लाइम बे, आवश्यक रखरखाव के लिए एल एंड टी शिपयार्ड में पहुंचे हैं। यह पहली बार है कि रॉयल नेवी जहाज का भारतीय शिपयार्ड में रखरखाव किया जाएगा, जिसके लिए साल 2022 में यूके और भारत के बीच हस्ताक्षर किए गये थे।

अंडमान को एविएशन हब बना रहा भारत
समुद्री क्षेत्र में भारत और अमेरिका ने बड़े पैमाने पर सहयोग किए हैं और डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है, कि भारत के पास अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को विमानन केंद्र के रूप में विकसित करने की भरपूर संभावना है। ये द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित हैं, जो दक्षिण चीन सागर में चीन की एंट्री का दरवाजा है और इस क्षेत्र पर भारत का कंट्रोल है।
इसके अलावा, अमेरिकी नौसेना को भी इस क्षेत्र में कुछ विमानन लॉजिस्टिक सेंटर्स की जरूरत है। हालांकि, एक आशंका ये भी है, कि भारत की कोशिश फिलहाल अंडमान को एक्सपोज करने की नहीं होगी, लेकिन भविष्य में ओवरफ्लाइट और 'गैस एंड गो' का काम यहां संभव हो सकता है। अमेरिका चांगी, सिंगापुर और मुख्य भूमि भारत में भी ऐसा ही कर रहा है, इसलिए अंडमान एक व्यवहार्य विकल्प है।
चीन को काउंटर करने में कैसे मिलेगी मदद?
साल 2020 में जब अमेरिका और भारत के बीच का तनाव चरम पर था, उस वक्त अमेरिकी नौसेना ने अपनी लंबी दूरी के पनडुब्बी रोधी युद्ध और समुद्री निगरानी विमान, पी-8 पोसीडॉन को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर भेजा था, जहां इसने भारत के रणनीतिक बेस पर पहली बार ईंधन भरी थी। इसके बाद यह अपनी आगे की यात्रा पर चला गया। अमेरिकी जेट का आना, भारत को समर्थन दिखाने की कोशिश थी।
एशिया पैसिफिक क्षेत्र में कम से कम 571 ऐसे द्वीप हैं, जो भारत के लिए लॉन्चिंग पैड के तौर पर काम करते हैं और इन्हें "अकल्पनीय विमान वाहक" भी कहा जाता है। लिहाजा, अब अंडमान निकोबार द्वीप समूहों में भारत ने तेजी के साथ इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास शुरू कर दिया है। साथ ही, इसकी भू-रणनीतिक स्थिति से अमेरिका को इंडो-पैसिफिक में भारत को अपनी पहुंच बढ़ाने में काफी मदद मिलेगी।
इंडो-पैसिफिक में भारत कैसे कर सकता है चीन को ब्लॉक?
अमेरिका समेत पश्चिमी देश, जो इंडो-पैसिफिक में अपना वर्चस्व चाहते हैं, वो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने युद्धपोतों को बनाए रखने के लिए भारत पर निर्भर है। ब्रिटेन के पहले दो युद्धपोत इस क्षेत्र के लिए प्रस्थान करने से पहले रखरखाव के लिए भारत पहुंचे।
चूंकी युद्धपोतों के रखरखाव और मरम्मत में काफी वक्त और काफी ज्यादा पैसा लगता है, लिहाजा अमेरिकी युद्धपोतों का पहले अपने देश जाना और फिर मरम्मत करवाकर वापस आना संभव नहीं हो पाता है। क्योंकि, इस क्षेत्र में अमेरिका को लगातार चीनी नेवी के साथ मुकाबला करना है, ऐसे में अमेरिका के पास भारत के अलावा कोई और विकल्प नहीं मिल पाता है।
हालांकि, चीनी नेवी को काउंटर करने के लिए अमेरिका अपने एशिया के दूसरे सहयोगियों जैसे जापान और दक्षिण के साथ भी बातचीत कर रहा है, ताकि इन देशों में बंद हो चुके शिपयार्डों को फिर से शुरू किया जा सके। इसके अलावा, अमेरिकी फिलीपींस और सिंगापुर से भी बात कर रहा है।
लेकिन, दक्षिण चीन सागर के प्रवेश बिंदु मलक्का जलडमरूमध्य पर बैठा भारत, इस क्षेत्र में पश्चिमी देशों के संचालन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। लिहाजा, डिफेंस एक्सपर्ट्स उम्मीद कर रहे हैं, कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक में सक्रिय अपनी नौसैनिक संपत्तियों को रसद सहायता प्रदान करने के लिए भारत में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए समर्थन बढ़ाएगा। (सभी तस्वीरें- प्रतीकात्मक)
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