ओपेक प्लस के फ़ैसले के बाद रूस से तेल ख़रीदने पर भारत की दो टूक
रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण दुनिया में कौन किस से तेल और गैस ख़रीदेगा इसको लेकर लगातार बहस तेज़ है लेकिन इसी बीच भारत ने साफ़ कर दिया है कि उसे जहाँ से तेल मिलेगा वो वहाँ से तेल ख़रीदेगा.
केंद्रीय तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने शुक्रवार को कहा कि भारत सरकार की यह नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वो अपने नागरिकों को ऊर्जा मुहैया कराए और इसके लिए वो जहाँ से चाहे वहाँ से तेल ख़रीदे.
रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा प्रणाली पर काफ़ी गहरा असर पड़ा है, जिसके कारण सप्लाई में रुकावट आई है और ऊर्जा की मांग बड़ी है.
पूरी दुनिया में इसके कारण ऊर्जा के दाम बढ़े हैं जिससे इसके उपभोक्ताओं, व्यापार और यहाँ तक की कई राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाओं तक पर ख़ासा असर पड़ा है.
वहीं, दुनिया के तेल निर्यातक देशों के समूह ओपेक प्लस ने अब ऐसा फ़ैसला लिया है, जिससे दुनिया में तेल के दाम और तेज़ी से बढ़ सकते हैं.
ओपेक के 13 देशों और प्लस समूह के 10 देशों जिसे मिलाकर ओपेक प्लस बनता है. उसने प्रतिदिन 20 लाख बैरल तेल का उत्पादन घटाने का फ़ैसला लिया है.
ओपेक में प्लस देशों का नेतृत्व रूस करता है, जिसके बाद इस संगठन पर अमेरिका ने रूस के एजेंडे को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया है. नवंबर से ओपेक प्लस समूह तेल उत्पादन को घटा देगा. ओपेक देशों में सऊदी अरब का दबदबा है और कहा जा रहा है कि सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान और रूसी राष्ट्रपति पुतिन इस मामले में एक लाइन पर आ गए हैं.
इसे अमेरिका के लिए झटका भी माना जा रहा है. अमेरिका ने सऊदी अरब को मनाने की कोशिश की थी कि वह तेल का उत्पादन बढ़ाए. इसी क्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सऊदी अरब का दौरा भी किया था. हरदीप सिंह पुरी ने कहा है कि अगर तेल उत्पादक देश उपने उत्पादन को लेकर स्वतंत्र रूप से फ़ैसला कर सकते हैं तो भारत भी तेल ख़रीदने के मामले में अपने हितों के हिसाब से फ़ैसला कर सकता है.
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भारत ने क्या दिया जवाब
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोप ने रूस पर ख़ासे प्रतिबंध लगाए हैं और वो चाहते हैं कि उसकी तरह बाक़ी देश भी रूस से अपने तेल के व्यापार को घटाएं.
हालांकि, इसी बीच अप्रैल से लेकर अब तक भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात 50 फ़ीसदी बढ़ा है और भारत अब अपने कुल तेल का 10 फ़ीसदी तेल रूस से ले रहा है. यूक्रेन युद्ध से पहले भारत रूस से अपनी ज़रूरत का कुल सिर्फ़ 0.2 फ़ीसदी तेल लेता था.
वहीं, अमेरिका के दौरे पर गए केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने अमेरिकी ऊर्जा सचिव जेनफ़िर ग्रानहोम से द्विपक्षीय मुलाक़ात के बात पत्रकारों से कहा कि भारत अपनी ज़रूरत का तेल जहाँ से होगा वहाँ से ख़रीदेगा.
दरअसल, उनसे एक पत्रकार ने सवाल पूछा था कि क्या भारत को किसी ने रूस से तेल ख़रीदने से रोका है?
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इस सवाल के जवाब में उन्होंने पत्रकारों से कहा कि सरकार की यह नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वो अपनी जनता को ऊर्जा मुहैया कराए.
उन्होंने कहा, "जहां से मिलेगा भारत वहां से तेल ख़रीदेगा, इसका साधारण सा कारण यह है कि इस तरह की चर्चा को भारत की उपभोक्ता तक नहीं ले जाया जा सकता है."
"अगर आप अपनी नीति को लेकर साफ़ हैं जिसका मतलब है कि आप ऊर्जा सुरक्षा और सस्ती ऊर्जा में विश्वास रखते हैं तो आप वहाँ से ख़रीदोगे जिस स्रोत से आप ऊर्जा ख़रीद सकते हो."
केंद्रीय मंत्री पुरी ने कहा, "भारत 50 लाख बैरल तेल रोज़ उपभोग करता है और यह बढ़ रहा है. तो हमें किसी ने (ख़रीदने से) मना नहीं किया है... इसको लेकर आपस में एक समझ है. अगर किसी जियो-पॉलिटिकल स्थिति को लेकर कोई समस्या है तो सरकार उस पर बात कर सकती है और वो बातचीत होगी."
इसके अलावा पुरी ने यह भी कहा कि रूस से तेल ख़रीदने को लेकर बहुत सी ग़लत धारणाएं भी हैं.
ख़ास बातें
- रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से तेल न ख़रीदने के पश्चिमी देशों की अपील के बीच भारत ने कहा उसे जहाँ से तेल मिलेगा वो वहाँ से ख़रीदेगा
- अमेरिका के दौरे पर गए केंद्रीय तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि भारत सरकार की यह नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वो अपने नागरिकों को ऊर्जा मुहैया कराए
- भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात 50 फ़ीसदी बढ़ा और भारत अपने कुल तेल का 10 फ़ीसदी तेल रूस से ले रहा है
- ओपेक प्लस देशों ने दिसंबर से 20 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का उत्पादन घटाने का फ़ैसला लिया
- ओपेक प्लस के फ़ैसले पर हरदीप सिंह पुरी ने कहा, "हम परिस्थिति से निपटने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं"
ओपेक प्लस की घोषणा से भारत पर होगा असर?
तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक प्लस ने प्रतिदिन 20 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन कम करने की घोषणा की है, जिसका असर कई देशों पर पड़ सकता है.
इस घोषणा पर केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी से जब सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि 'हम देख रहे हैं कि यह भारत को कैसे प्रभावित करेगा? हम परिस्थिति से निपटने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं.'
साथ ही उन्होंने कहा कि इस फ़ैसले को बेहद सावधानी से परखा जाएगा.
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उन्होंने कहा कि जब दाम ऊंचे जाते हैं तो ऊर्जा सुरक्षा और उसे ख़रीदने का सामर्थ्य बड़ी चिंता होती है लेकिन ऊर्जा के ऊंचे उठते दामों को भारत पहले भी संभालने में सक्षम रहा है.
ओपेक प्लस समूह के तेल का उत्पादन घटाने को लेकर उन्होंने कहा कि 'मैंने पारंपरिक रूप से हमेशा इस पर विचार किया है कि यह उनका अपना संप्रभु अधिकार है कि वो ये फ़ैसला लें कि वो कितना तेल का उत्पादन करते हैं और वो मार्केट में कितना तेल देना चाहते हैं.'
"भारत ओपेक का सदस्य नहीं है. भारत ओपेक के फ़ैसलों को सिर्फ़ मान सकता है. ओपेक प्लस समूह के तेल उत्पादकों के साथ जो हमारी बातचीत हुई और जो हमारी समझ है उसके हिसाब से यह केवल अस्थायी तौर पर है. आगे फ़रवरी में जो कच्चा तेल जारी किया जाएगा वो बाज़ार के लिए काफ़ी होगा और बढ़ती मांग को पूरा कर पाएगा."
जी-7 देशों पर क्या कहा पुरी ने
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी-7 रूसी तेल के दामों पर प्राइस कैप लगाने जा रहा है ताकि रूस अपना तेल सस्ता न कर सके.
जी-7 देशों के प्राइस कैप का फ़ैसला सितंबर में लिया गया है और इस पर अमल दिसंबर से शुरू होगा.
प्राइस कैप से जुड़ा सवाल जब केंद्रीय मंत्री पुरी से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि भारत इस मुद्दे को 'बेहद सावधानी' से देख रहा है और अमेरिकी सरकार के अधिकारियों से इस पर चर्चा हुई है लेकिन यह बातचीत का केंद्रीय बिंदु नहीं है.
उन्होंने कहा कि सरकार इस मुद्दे पर तकनीकी चर्चा भी कर रही है.
ओपेक प्लस देशों की तेल की सप्लाई में कमी की घोषणा के बाद अब भारत उन देशों से कितना तेल ले पाएगा जिनसे पहले से समझौता हो चुका है. इस सवाल पर पुरी ने कहा कि उन्हें इस पर अभी तक कोई स्पष्टता नहीं है.
मई महीने में भारत को रूस से कच्चा तेल 16 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिला था. जून में रूस से भारत को 14 डॉलर प्रति बैरल सस्ता तेल मिला. वहीं अगस्त में छह डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिला.,
आर्थिक मामलों पर लिखने वाले जाने-माने स्तंभकार स्वामीनाथन अय्यर का कहना है कि यूरोप पिछले 50 सालों के सबसे भयावह ऊर्जा संकट से जूझ रहा है और इसका असर भारत पर भी बहुत बुरा पड़ने वाला है.
स्वामीनाथन अय्यर ने लिखा है, ''भारत का व्यापार घाटा एक महीने में 30 अरब डॉलर तक पहुँच गया है. यह रक़म बहुत बड़ी है. हम बहुत मुश्किल घड़ी में प्रवेश कर रहे हैं. केवल यूरोप ही नहीं बल्कि हम भी संकट में समाते जा रहे हैं. अगर 12-13 महीनों तक यही स्थिति रही तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा. ऐसे में भारत को संकट से नहीं बचाया जा सकता है.''
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