ऑस्ट्रेलिया में सरकार और फ़ेसबुक के बीच जंग में कौन हारा, कौन जीता?

ऑस्ट्रेलिया में सरकार और फ़ेसबुक के बीच जंग में कौन हारा, कौन जीता?

ऑस्ट्रेलिया में सरकार और अमेरिकी टेक कंपनी फेसबुक के बीच पिछले काफ़ी वक़्त से जारी जंग अब ख़त्म हो चुकी है.

ऑस्ट्रेलिया की संसद ने एक नया क़ानून पास किया है जिसके अनुसार फ़ेसबुक और गूगल जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म पर ख़बरें दिखाने के लिए मीडिया कंपनियों को उनकी ख़बरों के एवज़ में भुगतान करना होगा. दुनिया में पहली बार किसी देश ने इस तरह का क़ानून बनाया है.

सरकार का कहना है कि नए क़ानून के तहत अब मीडिया कंपनियों को उस कंटेन्ट के लिए पैसा मिलेगा जो उन्होंने बनाया है.

इससे पहले देश में इस बात को लेकर तीखी बहस जारी थी कि फ़ेसबुक और गूगल जैसी कंपनियां, मीडिया कंपनियां के कंटेन्ट को मुफ्त में परोस कर उनकी आय पर हमला कर रही हैं.

बीते सप्ताह ने फ़ेसबुक ने कहा था कि वो ऑस्ट्रेलिया में यूज़र्स के लिए अब न्यूज़ कंटेन्ट नहीं दिखाएगा. लेकिन सरकार के साथ हुई बातचीत के बाद अब फ़ेसबुक ने इस मामले में ऑस्ट्रेलियाई मीडिया कपनियों के साथ समझौते करने और उनमें निवेश करने के लिए तैयार हो गया है.

ऐसे में सवाल ये बनता है कि ऑस्ट्रेलिया और फ़ेसबुक के बीच इस महायुद्ध में किसकी जीत हुई और दुनिया पर इसका क्या असर पड़ेगा?

जीत और हार के मुद्दे पर ऑस्ट्रेलिया में फे़सबुक के पूर्व प्रमुख स्टीफेन स्कीलर की राय स्पष्ट है.

स्कीलर ने बीबीसी रेडियो 4 के साथ बातचीत में स्वीकार किया है कि "मैं कहूंगा कि यहां पर फे़सबुक ने पहले ही हार मान ली. मुझे लगता है कि इसमें कोई शक़ नहीं है कि इसे लेकर वैश्विक स्तर पर विरोध काफ़ी कड़ा था. और मुझे लगता है कि फे़सबुक ने संभवत: ये महसूस किया कि दुनिया भर में सरकारें उनकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा कड़ा रुख अख़्तियार कर रही हैं."

ऑस्ट्रेलिया
Reuters
ऑस्ट्रेलिया

माइक्रोसॉफ़्ट ने किया हस्तक्षेप

ऑस्ट्रेलिया सरकार को इस मामले में दुनिया की अन्य सरकारों का समर्थन मिल रहा था जो कि ये चाहती थीं कि इस मामले में फ़ेसबुक संस्थापक मार्क ज़करबर्ग एक कदम पीछे लें.

दुनिया की एक बड़ी टेक कंपनी, जो कभी खुद भी नियामकों की नज़र में आ चुकी है, भी इस मुद्दे पर सरकार के समर्थन में थी. लगभग एक महीने पहले माइक्रोसॉफ़्ट ने नए क़ानून के प्रति खुलकर अपना समर्थन ज़ाहिर किया था.

माइक्रोसॉफ़्ट के अध्यक्ष ब्रेड स्मिथ लिखते हैं, "ये क़ानून टेक गेटकीपर्स (विशालकाय टेक कंपनियां) और स्वतंत्र समाचार संगठनों के बीच समझौतों को अनिवार्य करके तकनीक और पत्रकारिता के बीच आर्थिक असंतुलन का निवारण करेंगे."

आलोचक ये कह सकते हैं कि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि माइक्रोसॉफ़्ट ने एक ऐसे क़ानून का समर्थन किया है जो कि उसके दो सबसे बड़े प्रतिद्वंदियों को प्रभावित करेगा.

क्योंकि जब गूगल धमकी दे रहा था कि वह ऑस्ट्रेलिया में अपनी सेवाएं बंद कर देगा तो माइक्रोसॉफ़्ट ने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री से कहा था कि वह अपने सर्च इंजन बिंग की मदद से 'गूगल के जाने से होने वाली कमी' पूरी करने के लिए तैयार है.

इसके साथ ही माइक्रोसॉफ़्ट ने कहा था कि वह न्यूज़ इंडस्ट्री में भी योगदान देने के लिए तैयार है. लेकिन कंपनी के एक प्रवक्ता ने कहा है कि माइक्रोसॉफ़्ट का रुख हमेशा सैद्धांतिक आधार पर रहा है.

वहीं, फे़सबुक ने कहा है कि वह क़ानून में किए गए सुधार के बाद सहज स्थिति में है. फे़सबुक मानता है कि इन सुधारों के बाद ऑस्ट्रेलियाई सरकार फे़सबुक और निजी कंपनियों के बीच समझौतों की शर्तें तय करने की स्थिति में नहीं होगी.

फे़सबुक से जुड़े एक अधिकारी ने बताया, "इसकी वजह से हमें उन शर्तों, जिनका कोई मतलब हो, पर व्यापारिक समझौते करने की क्षमता मिल गई है, और हम यही चाहते थे."

अब फे़सबुक ऑस्ट्रेलिया में अख़बार छापने वाली कंपनियों के साथ समझौते करने के लिए तैयार हो गया है. लेकिन क्या दुनिया की दूसरी सरकारों को इस मामले से प्रेरणा लेनी चाहिए. ऑस्ट्रेलिया का मामला इस बात का उदाहरण है कि टेक कंपनियों को न्यूज़ कंपनियों को आर्थिक भुगतान करने के लिए विवश किया जा सकता है.

माइक्रोसॉफ़्ट के अध्यक्ष ब्रेड स्मिथ
Reuters
माइक्रोसॉफ़्ट के अध्यक्ष ब्रेड स्मिथ

क्या कहते हैं जानकार?

सिलिकॉन वैली में वेंचर कैपिटलिस्ट रहे टेक कंसलटेंट बेनेडिक्ट इवांस इससे सहमत नहीं हैं. इवांस ऑस्ट्रेलियाई क़ानून के धुर आलोचक रहे हैं.

इवांस कहते हैं कि ये एक बुरी तरह बनाया गया क़ानून है जिसमें अवास्तविक तत्व हैं. इसमें एक मांग थी कि गूगल सर्च एल्गोरिद्म, जो कि लगातार बदली जाती है, में किसी भी तरह का बदलाव लाने से पहले 14 दिन का नोटिस दें.

वह कहते हैं कि गूगल ने इस क़ानून के सामने जल्दी हथियार डाल दिए. लेकिन "फे़सबुक अपने सिद्धांत पर खड़ी रही. उसने भी काम ख़राब कर दिया जब उसने न्यूज़ को रोकने की जगह हर चीज़ को रोक दिया. ऑस्ट्रेलिया ने एक क़ानून बनाया था जिसे पालन किया जाना भौतिक रूप से संभव नहीं था और अब कहा है कि चूंकि ये काम सफल रहा है, ऐसे में हम ये किसी पर लागू नहीं कर रहे हैं."

वह ये मानते हैं कि न्यूज़पेपर्स को आर्थिक मदद देने के लिए टेक कंपनियों से वसूली का सिद्धांत यहां से आगे फैलेगा.

वह कहते हैं, "इस मामले में चुनौती ये है कि आप ये मान रहे हैं कि ये टैक्स नहीं है, सब्सिडी नहीं है. आप ये मान रहे हैं कि ये एक व्यापारिक समझौता है. जबकि ऐसा नहीं है."

रुपर्ट मर्डोक
Reuters
रुपर्ट मर्डोक

कड़े कदमों की ज़रूरत

इस मामले में आख़िरकार ये होने की संभावना है कि फे़सबुक और गूगल दुनियाभर में न्यूज़ के एवज़ में कंपनियों के साथ समझौते करेंगी.

लेकिन समस्या ये है कि इससे संभवत: पहले से संघर्ष कर रहे क्षेत्रीय समाचार कंपनियों को फायदा पहुंचने की जगह बड़ी कंपनियों को लाभ मिलेगा, जिनमें रुपर्ट मर्डोक का न्यूज़ कॉर्प जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं. और इससे ऑनलाइन एडवर्टाइज़िंग के क्षेत्र में फे़सबुक और गूगल के प्रभुत्व पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

ऐसे में सवाल उठता है कि इसका समाधान क्या है?

ऑस्ट्रेलिया में फे़सबुक की कमान संभाल चुके स्कीलर कहते हैं कि ये समय बड़े कदम उठाकर टेक कंपनियों को टुकड़ों में बांटने का है.

वे कहते हैं, "मैं अब ये मानने लगा हूं कि इन प्लेटफॉर्म का स्तर, आकार और प्रभाव, विशेषत: हमारे मन पर, ज़हन पर और एक नागरिक एवं ग्राहक के रूप में की जाने वाली हर गतिविधि, पर बहुत ज़्यादा है. ऐसे में इन्हें कुछ लोगों, बेहद नियंत्रित कंपनियों जैसे फे़सबुक, के भरोसे छोड़ दिया जाना तबाही के लिए इतंज़ाम करने जैसा है."

हालांकि, फे़सबुक ऑस्ट्रेलिया में पब्लिक रिलेशन वॉर हार चुकी है. लेकिन उसे कोई व्यापक नुकसान नहीं हुआ है.

लेकिन ग़ैर-ज़िम्मेदारी से शक्ति प्रदर्शन करके फे़सबुक ने मार्क ज़करबर्ग के बनाए साम्राज्य के विघटन की संभावनाएं थोड़ी सी बढ़ा दी हैं.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+