अमेरिकी प्रतिबंध ने गिराई रूसी कच्चे तेल पर गाज, दर्जनों टैंकर्स ने समंदर में डाले लंगर, अब भारत क्या करेगा?
US Sanction on Russian Crude Oil: जो बाइडेन ने अपना कार्यकाल खत्म करते करते दुनिया के तेल बाजार में हड़कंप ला दिया है और अपने कार्यकाल के आखिरी हफ्तों में उन्होंने रूसी कच्चे तेल पर जो नये प्रतिबंध लगाए हैं, उनकी वजह से भारत और चीन जैसे देशों पर काफी गंभीर असर पड़ सकता है।
वहीं, ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार को जहाज ट्रैकिंग डेटा से जानकारी मिली है, कि 10 जनवरी को संयुक्त राज्य अमेरिका की तरफ से नए प्रतिबंधों की घोषणा के बाद से, कम से कम 65 तेल टैंकरों ने चीन और रूस के तटों सहित कई स्थानों पर लंगर डाल दिया है। दिक्कत ये आ गई है, कि अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से अब कोई इसे खरीदने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है।

समंदर में 65 से ज्यादा जहाजों ने क्यों डाले लंगर? (Dozens of oil tankers drop anchor after US Sanction on Russian Oil)
मरीनट्रैफिक और एलएसईजी जहाज ट्रैकिंग डेटा की तरफ से मिल रिपोर्ट से आधार पर समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने विश्लेषण करते हुए जानकारी दी है, कि उनमें से पांच टैंकरों ने चीनी बंदरगाहों के पास लंगर डाल दिए हैं, जबकि सात अन्य जहाजों ने सिंगापुर के पास लंगर डाल दिया है, वहीं, बाकी के जहाज बाल्टिक सागर और सुदूर पूर्व में रूस के पास रुक गये हैं।
आपको बता दें, कि अमेरिकी ट्रेजरी ने रूस की दो प्रमुख कच्चे तेल का उत्पादन करने वाली कंपनियां, गैजप्रोम नेफ्ट और सर्गुटनेफ्टेगाज के साथ-साथ रूसी तेल ले जाने वाले 183 जहाजों पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों का मकसद रूसी कच्चे तेल को वैश्विक बाजारों में पहुंचने से रोकना है। बाइडेन प्रशासन का मुख्य मकसद, भारत और चीन जैसे देशों को, जो सबसे ज्यादा कच्चा रूसी तेल खरीदते हैं, उन्हें रूसी तेल बाजार से दूर रखना है, ताकि उन पैसों का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में ना हो पा पाए।
अमेरिका की तरफ से लगाए गये प्रतिबंधों के बाद, जैसे ही इन जहाजों ने समंदर में लंगर डाले हैं, ठीक वैसे ही उन जहाजों पर भी दबाव बढ़ गया है, जो अभी भी रूसी कच्चे तेल की सप्लाई करते हैं, या फिर ऐसे जहाज, जो पहले से ही प्रतिबंधों में जकड़े जा चुके हैं।
सोमवार को जहाज ट्रैकिंग डेटा से पता चला है, कि कम से कम 25 तेल टैंकर जहाजों ने ईरानी बंदरगाहों औ स्वेज नहर के पास अलग अलग जगहों पर लंगर डाल दिए हैं। वहीं, कई बंदरगाह ऐसे भी हैं, जिन्होंने इन जहाजों को आने से मना कर दिया है, ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों का असर उनपर ना हो, जिससे तनाव और भी ज्यादा बढ़ गया है। कारोबारियों ने पिछले हफ्ते कहा था, कि शेडोंग पोर्ट ग्रुप ने अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद, टैंकरों को अपने बंदरगाहों पर आने से प्रतिबंधित कर दिया है।
एक्सपर्ट्स का मानना है, वैश्विक तेल टैंकर बेड़े का लगभग 10% अमेरिकी प्रतिबंधों के अधीन था।
जेफरीज के एक्सपर्ट उमर नोक्टा ने सोमवार को एक नोट में कहा है, कि "इन प्रतिबंधों का प्रभाव टैंकर बाजार के लिए सहायक होना चाहिए, क्योंकि व्यापक बेड़े में जहाज की आपूर्ति कम हो रही है, लेकिन वास्तविक संभावित ताकत तब आएगी, जब अन्य निर्यातक खोए हुए वॉल्यूम की भरपाई करेंगे।"
बाजार अनुमानों के मुताबिक, सुपरटैंकरों की औसत दैनिक इनकम सोमवार को पिछले दिन की तुलना में 10% से ज्यादा बढ़कर लगभग 26,000 डॉलर हो गई है। प्रतिबंधों की घोषणा के बाद शुक्रवार को कुछ चार्टरर्स ने जहाजों की आपूर्ति में कमी की ओर इशारा करते हुए जहाजों को प्रतिबंधों से सुरक्षित करने की कोशिश की है। जहाज कंपनियां नहीं चाहती हैं, कि उनके खिलाफ भी अमेरिकी प्रतिबंध लगे। व्यापार विश्लेषण मंच केप्लर ने सोमवार को कहा, "रूस के बाहर से भारत और चीन को निर्यात की बढ़ती मांग से गैर-प्रतिबंधित टैंकर की मांग बढ़ेगी।"
बाइडेन के प्रतिबंध से भारत पर क्या असर होगा? (US Sanction on Russian Oil Impact on India)
वहीं, अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद अब भारत और चीन की तेल रिफाइनर कंपनियां, कच्चे तेल की खरीददारी के लिए नये आपूर्तिकर्ताओं की तलाश कर रहे हैं। अभी तक पता चला है, कि जिन 183 तेल टैंकरों पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए हैं, उनमें से ज्यादातर भारत और चीन को ही कच्चे तेल की सप्लाई कर रहे थे। कुछ प्रतिबंधित टैंकरों ने ईरान से भी तेल की सप्लाई की थी।
रिपोर्ट से मुताबिक, भारत की रिफाइनर कंपनियों ने कथित तौर पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद से जिन तेल टैंकरों पर प्रतिबंध लगाया है, उनके साथ काम करना बंद कर दिया है। हालांकि, अभी भी भारत को अगले दो महीने की विंड-डाउन अवधि के दौरान, रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति में व्यवधान की उम्मीद नहीं है। अमेरिका ने 12 मार्च तक कुछ ऊर्जा-संबंधी लेन-देन को फाइनल करने की इजाजत दी है।
सरकार के सूत्रों का हवाला देते हुए, समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने बताया है, कि भारत 10 जनवरी से पहले बुक किए गए रूसी तेल कार्गो को प्रतिबंधों के मापदंडों के मुताबिक बंदरगाहों पर उतारने की अनुमति देगा।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने नाम ना बताने की शर्त पर एक भारतीय अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट दी है, कि "अगले दो महीनों में हमें कोई बड़ी समस्या नहीं होने वाली है, क्योंकि जो जहाज ट्रांजिट में हैं और वे आ जाएंगे। लेकिन, अब आगे बढ़ने के लिए हमें देखना होगा, कि प्राइस कैप 60 डॉलर प्रति बैरल की सीमा से कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर नया डील (रूस के साथ) किस तरह से हो सकता है।"
भारतीय अधिकारी ने कहा, कि "अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए, रूस, भारत को पश्चिमी देशों के जहाजों का इस्तेमाल करने के लिए कच्चे तेल की सप्लाई 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बेचने के लिए और ज्यादा छूट दे सकता है, ताकि जहाजों के बीमा पर असर ना हो।"
अधिकारी ने कहा, "अगर हमें किसी गैर-स्वीकृत इकाई से रूसी कच्चा तेल मिलता है, जो प्राइस कैप (60 डॉलर प्रति बैरल) से नीचे है, तो मुझे यकीन है कि हम इसे देखने में खुश होंगे।" उन्होंने कहा कि भारतीय बैंक रूसी कच्चे तेल के लिए मूल प्रमाण पत्र मांगेंगे, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि लेनदेन में प्रतिबंधित संस्थाएं शामिल न हों।
आपको बता दें, कि G7 देशों ने रूसी कच्चे तेल पर प्राइस कैप लगा रखा है, जिसके तहत अगर कोई तेल रिफाइनिंग कंपनी 60 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा की कीमत पर रूसी कच्चा तेल खरीदता है, तो उसपर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। और भारत समेत सभी देश इसका पालन कर रहे हैं।
जहाज कंपनियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है, कि उनका इंश्योरेंस करने वाली ज्यादातर कंपनियां पश्चिमी देशों की है, इसलिए वो रिस्क नहीं ले सकते।
अमेरिका और चीन के बाद, भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। नई दिल्ली में अधिकारियों का मानना है, कि रूस उन तक पहुंचने के तरीके खोज लेगा। भारत कथित तौर पर रूस की वोस्तोक तेल परियोजना पर नए अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव की भी जांच कर रहा है, जिसमें भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी है।
क्या अमेरिकी प्रतिबंधों से तेल की कीमतों पर असर होगा? (Will US sanctions affect oil prices?)
अमेरिकी प्रतिबंधों का तत्काल असर ये हुआ है, कि 65 से ज्यादा तेल टैंकर्स ने समंदर में लंगर डाल दिए हैं, लेकिन इनका असली असर क्या होगा, इसका पता दो महीने के बाद ही चल पाएगा, जब विंड डाउन अवधि खत्म होगी। हालांकि, उसके बाद भी तेल की सप्लाई कोई बड़ा मुद्दा नहीं होगा। पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) के पास प्रतिदिन 3 मिलियन बैरल की अतिरिक्त क्षमता है, जबकि अमेरिका, कनाडा, ब्राजील और गुयाना जैसे गैर-ओपेक आपूर्तिकर्ता आसानी से तेल की कमी को पूरा कर सकते हैं।
लेकिन, मुख्य मुद्दा कीमत का होगा। लेकिन, एक्सपर्ट्स का मानना है, कि कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा भी ज्यादा दिनों के लिए नहीं होगा। भारतीय रिफाइनर, मध्य पूर्व के आपूर्तिकर्ताओं के साथ आपूर्ति सौदों को अंतिम रूप देने के लिए 2025/26 के लिए वार्षिक अनुबंधों पर बातचीत करने जा रहे हैं। बाजार के आधार पर, वे उनसे अतिरिक्त बैरल मांग सकते हैं।
चार महीनों में सबसे ज्यादा कीमत पर तेल के दाम
सोमवार को कच्चे तेल की कीमतें लगभग 2 प्रतिशत बढ़कर चार महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं, इस उम्मीद के साथ, कि रूसी तेल पर व्यापक अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत और चीन में खरीदार अन्य आपूर्तिकर्ताओं की तलाश करने को मजबूर होंगे।
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि ब्रेंट वायदा 1.25 डॉलर यानि 1.6 प्रतिशत बढ़कर 81.01 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि यूएस वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 2.25 डॉलर या 2.9 प्रतिशत बढ़कर 78.82 डॉलर पर बंद हुआ। यह 26 अगस्त के बाद ब्रेंट का उच्चतम बंद और 12 अगस्त के बाद WTI का उच्चतम बंद था, और इसने दोनों बेंचमार्क को लगातार दूसरे दिन तकनीकी रूप से ओवरबॉट क्षेत्र में रखा।
शुक्रवार को यूएस ट्रेजेडी की तरफ से प्रतिबंधों की घोषणा, रूस के ऊर्जा व्यापार पर अब तक के सबसे आक्रामक प्रतिबंध हैं। यदि डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन भी इन प्रतिबंधों को जारी रखता है, तो माना यही जा रहा है, कि इससे रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति कम हो सकती है, जिसका निश्चित तौर पर असर पड़ सकता है और तेल की कीमतों में इजाफा हो सकता है।
रूस ने सोमवार को कहा है, कि इस कदम से वैश्विक बाजारों में अस्थिरता का खतरा है और मॉस्को उनके प्रभाव को कम करने के लिए हर संभव प्रयास करेगा।
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