अमेरिका का डबल गेम: पाकिस्तान के साथ मिलकर जब बांग्लादेश को बर्बाद करने की रची गई साजिश
माना जाता है कि वॉयस ऑफ अमेरिका ने बांग्लादेश के संस्थापक और महान नेता शेख मुजीबुर रहमान की मौत की खबर को वास्तव में मारे जाने से एक घंटे पहले ही प्रसारित कर दिया था।
नई दिल्ली, अगस्त 22: 15 अगस्त 1975 को बांग्लादेश के संस्थापक और 'राष्ट्रपिता' बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या कर दी गई और अवामी लीग सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया गया। तख्तापलट की ये कोशिश बांग्लादेशी सेना के एक छोटे से हिस्से ने की थी, जिसमें कुछ मेजर्स शामिल था, लेकिन इस तख्तापलट के पीछे मास्टरमाइंड दो देश थे, एक अमेरिका और दूसरा पाकिस्तान। अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए, जो कई देशों की सरकारों को गिराने के लिए कुख्यात है, उसने इस बार बांग्लादेश की सरकार को गिराने के लिए पाकिस्तान की कुख्यात आईएसआई के साथ हाथ मिला लिया था और मकसद था, नये नये एक स्वतंत्र हुए एक देश को अस्थिर करना, क्योंकि उसे भारत का समर्थन हासिल था। इस कोशिश में बांग्लादेश की सेना के साथ थे तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री जियाउर रहमान, जो आदेशों का पालन कर रहे थे।

अमेरिका का डबल गेम
माना जाता है कि वॉयस ऑफ अमेरिका ने बांग्लादेश के संस्थापक और महान नेता शेख मुजीबुर रहमान की मौत की खबर को वास्तव में मारे जाने से एक घंटे पहले ही प्रसारित कर दिया था। लेखक, लॉरेंस लाइफ्सचुल्ट्ज़, जिन्होंने बांग्लादेश: द अनफिनिश्ड रिवोल्यूशन नाम की किताब लिखी है, उन्होंने सीआईए के घिनौने खेल से पर्दा हटाया है और बताया है, कि किस तरह से अमेरिका ने अपने पिट्ठू पाकिस्तान के साथ मिलकर एक नये-नवेले देश की शांति को खत्म करने की कोशिश की थी। उन्होंने अपनी किताब में सीआईए के साथ साथ आईएसआई की गंभीर भूमिका का भी जिक्र किया है, जो अपने देश के टूटने के बाद बौखलाया हुआ था और चूंकी बांग्लादेश के साथ भारत खड़ा था, लिहाजा सीआईए चाहता था, कि वो बांग्लादेश को अराजकता की स्थिति में धकेल दे, ताकि ये साबित किया जाए, कि उसका भविष्य पाकिस्तान के ही साथ था। उन्होंने अपनी किताब में दावा किया है, कि तख्तापलट का दिन भी आईएसआई ने ही चुना था।

आधी रात में नरसंहार
विडंबना ये थी, कि मध्यरात्रि को अंजाम दिए गये इस नरसंहार का मकसद बांग्लादेश को उस घिनौने रास्ते पर धकेलना था, जहां से देश का सेक्युलर स्टेटस हमेशा के लिए खत्म हो जाए और सैन्य सरकार बांग्लादेश को उस रास्ते पर ले जाना चाह रही थी, जहां से देश की धर्मनिरपेक्षता को खत्म कर दिया जाए और संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से "इस्लाम" स्थापित कर दिया। हालांकि, पाकिस्तान के सैन्य शासकों के विपरीत, बांग्लादेश के दो सैन्य तानाशाहों ने अपने नियंत्रण को मजबूत करने और अपनी विरासत सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक दलों की स्थापना कर ली। जिया ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की स्थापना की और उसने पाकिस्तान समर्थक जमात-ए-इस्लामी को वैध ठहरा दिया, जिसे बाद में उनकी पत्नी खालिदा जिया ने अपना सहयोगी बना लिया। वहीं, इरशाद की 'जातियो पार्टी' ने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए अवामी लीग और इस्लामी विपक्ष दोनों के साथ संगीतमय रिश्ता कायम कर लिया, लेकिन बीएनपी के विपरीत कभी भी सत्ता में नहीं आ सकी।

इंसाफ से दूर मुजीब के हत्यारे
हालांकि, एक विडंबना ये भी है, कि मुबीज के कई हत्यारे अभी भी इंसाफ के कटघरे से बचे हुए हैं और अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में छिपे हुए हैं। वहीं, पिछले एक दशक से देश की सरकार चला रहीं शेख हसीना उन्हें बांग्लादेश वापस लाने में नाकाम रही हैं। वहीं, मुजीब के पोते साजीब वाजेद ने कई बार अमेरिकी सरकार से अपने दादा के कातिलों को प्रत्यर्पित करने की गुहार लगाई है, लेकिन अमेरिका ने उन्हें प्रत्यर्पित करने से इनकाप कर दिया।

कैसे अमेरिका-पाक लॉबी ने बांग्लादेश को परेशान किया
15 अगस्त 1975 को मुजीबुर रहमान और उनके परिवार की भीषण हत्या में बांग्लादेश के पहले तानाशाह जिया-उर-रहमान, जो बीएनपी के संस्थापक भी हैं, उनकी भूमिका की पर्याप्त जांच नहीं की गई। वहीं, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी को भी कभी भी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने कटघरे में खड़ा नहीं किया। और सीआईए की जांच तो खैर की ही गहीं गई। लॉरेंस लाइफ्सचुल्ट्ज़ ने कहा कि, उस हत्याकांड के पीछे के लोग ज़िया के समर्थन के बिना स्वतंत्र रूप से इधर-उधर नहीं जा सकते थे। और ज़िया अमेरिकी समर्थन के बिना हत्यारों को देश से बाहर निकावलने में सक्षम नहीं हो पाते। लाइफस्चुल्ट्ज़ कहते हैं, "मेरे विचार से, इन सभी की और जांच किए जाने की आवश्यकता है।" वहीं, एक अन्य अनुभवी पत्रकार मार्क टुली, जिन्होंने बीबीसी के लिए बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम को कवर किया, उन्होंने बांग्लादेश के 1975 के बाद के परिदृश्य की एक झलक पेश की। उन्होंने कहा कि, बांग्लादएश में अलग अलग धाराएं थीं, एक धारा पश्चिमी अर्थव्यवस्था समर्थक, एक कट्टरपंथी, एक भारत समर्थक, एक भारत विरोधी और एक बड़ी धारा था, इस्लामी।

हत्याकांड के बाद क्या हुआ?
पाकिस्तान से स्वतंत्रता हासिल करने के चार वर्षों के भीतर मुजीब की हत्या कर दी गई और लगने लगा, कि बांग्लादेश में भी उसी तरह की सरकार का गठन होने वाला है, जिस तरह की सरकारों का निर्माण पाकिस्तान में होता है। पाकिस्तान में भी बार बार सैन्य शासक होते रहते हैं, जिन्होंने पाकिस्तान को पूरी तरह से कट्टर, धर्मांध, इस्लामी शासन की स्थापना की और लोकतांत्रिक राजनीति की नींव को पूरी तरह से खोखला कर दिया। और मुजीब की हत्या के बाद ऐसा लगने लगा, कि बांग्लादेश भी पाकिस्तान मॉडल की तरफ बढ़ निकला है। 1975 में बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की निर्मम हत्या से लेकर 1977 में देश के पहले सैन्य तानाशाह जनरल जिया के उदय तक, लोकतांत्रिक संस्थानों और लोकतांत्रिक नेताओं के मरने का सिलसिला जारी रहा। और फिर सैन्य शासक जिया ने देश की संसद में एक "क्षतिपूर्ति अध्यादेश" के अधिनियमन पेश किया, ताकि मुजीब के हत्यारे को देश से सुरक्षित बाहर निकाला जा सके और इसके लिए सैन्य तानाशाह को अमेरिका और पाकिस्तान का गुप्त समर्थन मिला था।

क्या था "क्षतिपूर्ति अध्यादेश"?
9 जुलाई 1979 को बांग्लादेश के पहले सैन्य तानाशाह जनरल जियाउर रहमान ने कुख्यात "क्षतिपूर्ति अध्यादेश" को पारित करने के लिए देश की संसद का इस्तेमाल किया। काला कानून देश के संस्थापक पिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान के कुख्यात हत्यारों को कानूनी कवच प्रदान करने के एकमात्र उद्देश्य से पारित किया गया था। इस "क्षतिपूर्ति अध्यादेश" ने सुनिश्चित किया, कि बंगबंधु और उनके परिवार की भीषण हत्या के लिए जिम्मेदार सैन्य अधिकारियों को कोई सजा नहीं दी जाएगी। इस अध्यादेश ने एक तरह से तख्तापलट को वैध ठहरा दिया। बहुत से विशेषज्ञों के अनुसार, जनरल जिया तख्तापलट के पीछे का रिमोट कंट्रोल था, जिसने लिबरेशन वॉर की शानदार विरासत पर से पर्दा उठाया और फिर से पाकिस्तानीकरण के युग की शुरुआत की। इन हत्यारों में से अधिकांश को विदेशों में बांग्लादेश मिशनों में वरिष्ठ राजनयिकों के रूप में नियुक्त किया गया था और कुछ हत्यारे देश के सांसद बन गये। वहीं, इस नरसंहार के वक्त शेख हसीना और उनकी बहन शेख रहाना बांग्लादेश में नहीं थी, लिहाजा वो दोनों बच गईं और बाद में शेख हसीना ने अपने पिता की विरासत को संभालने का काम किया।

शेख हसीना का उदय
पिता मुजीबा का नाम हालांकि शेख हसीना के साथ था, लेकिन उन्हें ज्यादा राजनीतिक विरासत नहीं मिल सकी। लेकिन, साल 1996 में शेख हसीना ने बांग्लादेश की सत्ता में जोरदार वापसी की, लेकिन अगला चुनाव हारने की वजह से उनके पिता को इंसाफ दिलाने का मिशन आगे बढ़ गया। जब साल 1975 में मुजीब उर रहमान की हत्या कर दी गई, तो उस वक्त सैन्य अधिकारी रहे ज़ियाउर रहमान के पास इंटरव्यू लेने के लिए बीबीसी के संवाददाता पहुंचे थे और उन्होंने उन्हें बताया कि, मुजीब की हत्या कर दी गई है, तो जियाउर रहमान ने जवाब देते हुए कहा था, 'तो क्या... वायस प्रेसीडेंट हैं अभी।' ज़ियाउर रहमान की ये क्लासिक टिप्पणी दुनियाभर में सुर्खियां बटोरने लगीं। वहीं, सैन्य तख्तापलट जब सरकार का गठन हुआ, तो एक रिमोट प्रधानमंत्री का निर्माण किया गया, लेकिन उसके बाद जियाउर रहमान जल्द ही देश के सेना प्रमुख बन गये और फिर वो इसी साल देश के राष्ट्रपति भी बन गये। इसका जिक्र 'लिगेसी ऑफ ब्लड' में किया गया है, जो मासेरान्हास की एक प्रसिद्ध किताब है।

देश से धर्मनिरपेक्षता को कर दिया गया खत्म
जियाउर्रहमान के नेतृत्व में बनी सरकार ने देश से धर्मनिरपेक्षता को बंगाली राष्ट्रवाद के मूल मूल्य के रूप में मिटाने के लिए एक बड़ा प्रयास किया। जिसके बाद देश में एंटी-लिबरेशन नैरेटिव आकार लेने लगा और यहां तक बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजादी दिलाने वाले शेख मुजीब उर रहमान के योगदान को भी मिटाने की कोशिश की गई और देश में युद्ध अपराधियों को अपनी आपराधिक गतिविधियों को खुलेआम अंजाम देने की इजाजत दे दी गई। लेखक, लाइफस्चुल्ट्ज ने कहा कि, जियाउर्रहमान ने सैनिकों के विद्रोह के दौरान पाकिस्तान और अन्य लोगों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखा। उन्होंने लिखा कि, "हम एक वास्तविक सैन्य तानाशाही में चले गए जो पाकिस्तान से भी अधिक हिंसक थी।" वहीं, अजॉय दासगुप्ता का कहना है कि, जियाउर्रहमान के संक्षिप्त कार्यकाल के दौरान, पाकिस्तान के साथ पुनर्मिलन की भावना पैदा करने के लिए कई प्रयास किए गए। बांग्लादेश के इतिहास में 7 मार्च 1971 का दिन उस दिन के रूप में दर्ज है जब बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान के ऐतिहासिक भाषण में देश की स्वतंत्रता की घोषणा की थी, लेकिन उसी दिन 1976 में बंगबंधु की हत्या के महीनों बाद, सैन्य शासक जनरल जियाउर रहमान ने पाकिस्तान के 'अर्धचंद्राकार और तारे' ध्वज को वापस करने का एक नापाक प्रयास किया था।

जियाउर्रहमान की भी उसी तरह से मौत
जियाउर्रहमान ने सीआईए और आईएसआई की मदद से तलवार की बदौलत देश की सत्ता चलाई, लेकिन उनकी भी हत्या सैन्य तख्तापलट में ही की गई और उनके मारे जाने के बाद उनकी खूनी विरासत को उसकी पत्नी खालिदा ज़िया और तारिक रहमान ने आगे बढ़ाया, खासकर 2001 और 2006 के बीच, जब पाकिस्तान समर्थक जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन कर इन्होंने सरकार का निर्माण किया। तारिक, जो अब एक भगोड़ा है, वो अभी भी लंदन से बीएनपी चलाता है, को बांग्लादेश की एक अदालत ने अवामी लीग की रैली में 2004 के ग्रेनेड हमले की योजना बनाने के लिए उसे दोषी ठहराया है, जिसमें पार्टी के कई नेता और कार्यकर्ता मारे गए थे। इस हमले का मकसद शेख हसीना को निशाना बनाना था, लेकिन वो बाल बाल बच गईं थीं। शेख हसीना को भारत समर्थक माना जाता है और वो कई बार खुलकर पाकिस्तान की आलोचना कर चुकी है, लिहाजा वो अभी भी आईएसआई और मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर रहती हैं।
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