कुर्सी गंवाई, देश डुबोया... महिंदा राजपक्षे और परिवार ने श्रीलंका को कैसे बना दिया चीन का उपनिवेश?
श्रीलंका की सत्ता ज्यादातर वक्त राजपक्षे परिवार के पास ही रही है और 2015 से पहले महिन्द्रा राजपक्षे जब राष्ट्रपति हुआ करते थे, तो भारत विरोधी बयान की वजह से अकसर सुर्खियां बटोरते रहते थे
कोलंबो, मई 10: साल 2015, महिंदा राजपक्षे का लगातार तीसरी बार श्रीलंका का राष्ट्रपति बनने का सपना टूट चुका था और वो एक अमेरिकी न्यूज चैनल को इंटरव्यू देने बैठे थे। सवाल था, कि आखिर वो चुनाव कैसे हार गये। महिंदा राजपक्षे ने जो जवाब दिया, वो ऐतिहासिक हो गया। महिंदा राजपक्षे कहते हैं, कि उन्हें हटाने के पीछे भारत सरकार की साजिश है और भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ ने उन्हें हराया है। महिंजा राजपक्षे का ये बयान साफ जताता है, कि भारत को लेकर उनके विचार क्या था।

चीन से राजपक्षे परिवार का अगाध प्रेम
अब इसे भ्रष्टाचार कहें या कुछ और... लेकिन, राजपक्षे परिवार के शासनकाल में श्रीलंका लगातार चीन की गोद में खेलता गया और अंत में चीन को करीब 5 अरब अमेरिकी डॉलर चुकाने में नाकाम रहने के बाद श्रीलंका की आर्थिक स्थिति बर्बादी के कगार पर पहुंच गई। और महिंदा राजपक्षे देश के सबसे बड़े विलेन बन चुके हैं। अब आशंका इस बात की है, कि इस साल के अंत तक श्रीलंका दिवालिया हो जाएगा। वहीं, एक वक्त चीन की गोदी में खेलने को तैयार रहने वाले श्रीलंका ने जब शी जिनपिंग से कर्ज जाल में छूट देने की मांग की, तो किसी भी तरह की छूट देने से चीन ने साफ इनकार कर दिया।

नायक बनने की कोशिश
साल 2019 में गोतबया राजपक्षे ने देश की सत्ता फिर से संभाली थी और उन्होंने दिखाने की कोशिश की, सरकार देश को राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक प्रगति पर बढ़ाना चाहती है। लेकिन, गोतबया राजपक्षे के सत्ता संभालने के तीन साल बाद देश दिवालिया होने के कगार पर है। श्रीलंका की अर्थव्यवस्था धूल में मिल चुकी है और श्रीलंका के राजनीतिक एक्सपर्ट्स का कहना है, कि श्रीलंका में बहुत जल्द मानवीय त्रासदी शुरू हो जाएगी, जहां लोग भूख से मरने लगेंगे। इस साल जनवरी महीने में चीन के विदेश मंत्री वांग यी श्रीलंका के दौरे पर गये थे, जहां उन्होंने भारत को नसीहत देते हुए कहा था, कि चीन और श्रीलंका की दोस्ती के बीच 'तीसरे पक्ष' को दखल नहीं देना चाहिए। चीनी विदेश मंत्री का ये बयान बताने के लिए काफी था, कि श्रीलंका के अंदर चीन किस हद तक घुस चुका है।

चीन का उप-निवेश बना श्रीलंका?
चीन किसी भी हाल में हिंद महासागर में घुसना चाहता था और इसके लिए उसने अंधाधुंध कर्ज बांटने शुरू किए। जब महिंदा राजपक्षे साल 2005 में पहली बार श्रीलंका के राष्ट्रपति बने, तो चीन ने श्रीलंका के अंदर पांव पसारने शुरू किए और महिंदा राजपक्षे के दूसरे कार्यकाल में चीन श्रीलंका के अंदर घुस आया। भारत के लिए श्रीलंका में चीन का घुसना परेशान करने वाला था और भारत ने इसको लेकर श्रीलंका को समझाने की कोशिश की, लेकिन चीन प्रेम में मतवाले हो चुके महिंदा राजपक्षे ने भारत की एक नहीं सुनी। महिंदा राजपक्षे ने चीन से अंधाधुंध लोन लेना शुरू कर दिया।

चीन प्रेम बना विनाशकारी
राजपक्षे परिवार ने अज्ञात शर्तों पर चीन से भारी कर्ज लेना जारी रखा और उस वक्त भी श्रीलंका लोन लेता रहा, जब देश की अर्थव्यवस्था ढलान पर आ चुकी थी। वहीं, दिसंबर 2019 में श्रीलंका के पास 7.6 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था, जो अक्टूबर 2021 में गिरकर 2.3 अरब डॉलर हो गया। इसके बाद भी श्रीलंका की राजपक्षे सरकार, जो अत्यधिक कट्टर राष्ट्रवादी है, उसने आईएमएफ से मदद नहीं मांगी। राजपक्षे सरकार ने आईएमएफ के सुधारवादी उपायों को ना सिर्फ ठुकरा दिया, बल्कि आईएमएफ से मदद मांगने को राजपक्षे सरकार ने देश की संप्रभुता से समझौता बताया, जबकि दूसरी तरह राजपक्षे सरकार चीन से अरबों कर्ज लेकर देश की जमीन और समुद्री क्षेत्र को चीन के पास गिरवी रख रही थी। श्रीलंका की राजपक्षे सरकार ने चीन के साथ करेंसी स्वैप करना शुरू कर दिया, लेकिन इससे श्रीलंका की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया और देश बर्बादी के मुहाने पर आ गया।

भारत को कोसने वाला परिवार
श्रीलंका की सत्ता ज्यादातर वक्त राजपक्षे परिवार के पास ही रही है और 2015 से पहले महिन्द्रा राजपक्षे जब राष्ट्रपति हुआ करते थे, तो भारत विरोधी बयान की वजह से अकसर सुर्खियां बटोरते रहते थे और ऐसा माना जाता है कि, श्रीलंका की एक बड़ी आबादी के बीच महिन्द्रा राजपक्षे ने भारत विरोधी भावनाएं भड़काने की कोशिश में कामयाबी भी पा ली और इस दौरान वो महिन्द्रा राजपक्षे चीन के साथ लगातार चिपकने की कोशिश करते रहे। भारत विरोधी रथ पर सवार महिन्द्रा राजपक्षे चीन के इतने करीब चले आए, कि शायद अब श्रीलंका के पास अपना कुछ नहीं बचा है और अगर श्रीलंका ने चीन को कर्ज के पैसे नहीं लौटाए, तो बाकी श्रीलंका का भी वही हाल हो सकता है, तो हंबनटोटा का हुआ है। हंबनटोटा बंदरगाह 99 सालों के लिए चीन के पास श्रीलंका को गिरवी रखनी पड़ी है।

श्रीलंका में कॉलोनी बनाएगा चीन!
राजपक्षे परिवार का चीन प्रेम इतना ज्यादा बढ़ गया था कि, सरकार ने संसद में बकायदा देश की संप्रुभता को गिरवी रखकर कोलंबो पोर्ट सिटी इकोनॉमिक बिल पास किया, जिसके प्रावधानों के मुताबिक, चीन को ये अधिकार दिया गया कि वो कोलंबो में एक पोर्ट सिटी की स्थापना के साथ साथ अपना कॉलोनी भी बना सकता है। इस कॉलोनी में करेंसी भी चीन की ही चलेगी और श्रीलंका सरकार का वहां कोई दखल नहीं होगा। यानि, श्रीलंका ने अपनी जमीन चीन के ही हवाले कर दिया और खुद एक उपनिवेश बन गया। भारत के लिए ये चिंता की बात इसलिए है, क्योंकि भारत के दक्षिणी छोर से यह जगह सिर्फ 300 किलोमीटर की दूरी पर है और माना जा रहा है, कि जल्द ही चीन यहां पर अपने कॉलोनी का निर्माण कार्य शुरू कर सकता है।

रॉ पर लगाए थे संगीन इल्जाम
साल 2014 में भारत में नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन चुके थे और साल 2015 के मार्च में महिंदा राजपक्षे राष्ट्रपति चुनाव हार जाते हैं। जिसके बाद वो भारत की खुफिया एजेंसी रॉ और अमेरिका पर चुनाव हरवाने का आरोप लगाना शुरू कर देते हैं। महिंदा राजपक्षे ने बगैर कोई सबूत पेश किए कहा था कि, उनकी चुनावी हार के पीछे रॉ और अमेरिका की साजिश है। भारत के साथ साथ महिंदा राजपक्षे ने नॉर्वे और यूरोपीय देशों पर भी अपनी हार का ठीकरा फोड़ दिया था। महिंदा राजपक्षे ने साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट को दिए गये इंटरव्यू में भारत के खिलाफ इतने संगीन आरोप लगा दिए थे। वहीं, भारत सरकार की तरफ से तमाम आरोपों को खारिज कर दिया गया था। इतना ही नहीं, महिंदा राजपक्षे लगातार भारत के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाते रहे और चीन की बाहों में बलखाते रहे। लेकिन, वो भूल गये थे... वो ड्रैगन को दोस्त बनाना चाहते हैं, जो किसी का नहीं है और इसी ड्रैगन प्रेम ने महिंदा राजपक्षे को कहीं का नहीं छोड़ा और आज श्रीलंका गृहयुद्घ के मुहाने पर खड़ा है और महिंदा राजपक्षे की राजनीति उस आग में जलती हुई नजर आ रही है।












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